आरम्भिक हिंदी की व्याकरणिक विशेषताएं | Arambhik Hindi ki Vyakaranik Visheshtaen

व्याकरण की दृष्टि से आरम्भिक हिन्दी की वियोगात्मक प्रक्रिया आगे बढ़ी है। नये-नये व्याकरणिक प्रत्यय, विशेषतः परसर्ग और कृदन्तीय रूप विकसित हुए हैं। बहुत थोड़े सविभक्तिक प्रयोग मिलते हैं। प्रायः निर्विभक्तिक रूप अर्थात् बिना कारकीय चिह्न के सभी कारकों के अर्थ प्राप्त होते हैं। Arambhik Hindi ki Vyakaranik Visheshtaen को भली-भांति समझने के लिए इस लेख को पूरा पढ़िए । इसमें आरम्भिक हिंदी की व्याकरणिक विशेषताओं को मैंने आप लोगों को विस्तार से समझाने का प्रयास किया है ।

संज्ञा और कारक व्यवस्था

संज्ञाओं के सविभक्तिक रूप मिलने लगभग समाप्त हो गए। आरम्भिक हिंदी में परसर्ग का विकास बहुत तेजी से हुआ । कुछ प्रमुख परसर्ग निम्नानुसार हैं:

संज्ञा के परसर्ग

कर्ता : X,

 कर्म : X, कहं, कह, कौ, को, कों, कू

करणअपादान : सउं, सौं, सैं, से, तें, ते, थे, सेती, हुत, हुतें

सम्प्रदान : लागि लग्गि, तण, तईं

सम्बन्ध : क, का, कै, की, कर, केर, केरा, केरी, केरे

अधिकरण : में, मैं, मह, मुँह, माँह, माँझ; पर, पै।

इनके अतिरिक्त तक के लिए ताईं और लौं, पास के लिए पहं या पई, साथ के लिए संगि या साथि, कारण के लिए कारनि उल्लेखनीय सम्बन्धवाचक अव्यय हैं। परे, नियरे, पासि, दूर, बाहिर, अब्धंतरि, सरि, ऊपरि भी मिलते हैं।

निर्विभक्तिक या लुप्तविभक्तिक कारकीय प्रयोग 

इनमें न तो परसर्ग है न विभक्ति-चिह्न; जैसे (कर्ता) चेरी धाई, चेरी धाईं  (बहुवचन), (कर्म) बासन फोरे, मान बढ़ावत, (करण) बिरह तपाइ तपाइ,  (अपादान) तुहि देश निसारउं, (सम्बन्ध) राम कहा सरि, (अधिकरण) कंठ बैठि जो कहई भवानी।

सविभक्तिक प्रयोग 

हि ऐसा विभक्ति-चिह्न है जो सभी कारकों के अर्थ देता है।

उदाहरण :

(कर्म) सतरूपहि विलोकि, (करण) वज्रहि मारि उड़ाइ, (सम्प्रदान) बरहि कन्या दे, (अपादान) राज गरबहि बोले नाहीं, (सम्बन्ध) पंखहि तन सब पांख, (अधिकरण) चरनोदक ले सिरहि चढ़ावा ।

इसी प्रकार न, न्ह, नि, न्हि भी सभी कारकों के लिए प्रयुक्त हुए हैं। 

इसके अलावा करण के लिए  और अधिकरण के लिए विभक्ति-चिह्न शेष हैं।

 वचन

(i) पुंल्लिग बहुवचन के लिए-ए और-न, जैसे-बेटे, बेटन ।

(ii) स्त्रीलिंग बहुवचन के लिए-अन, न्ह, ऐं, आँ; जैसे- सखियन, बीथिन्ह, कलोलें, अखियाँ।

लिंग

प्रायः स्त्रीलिंग शब्द इकारांत हैं; जैसे- आँखि, आगि, औरति। अन्य-बहुरिया, पापिनि, दुलहिनी ।

सर्वनाम

पुरुषवाचक सर्वनाम के तीन भेद हैं : उत्तम पुरुष, मध्यम पुरूष और अन्य पुरूष।

  • उत्तम पुरुष  मैं की अपेक्षा हौं व्यापक है, बाद में मइं, फिर मैं मुज्यु, मोंहि, मोर, मेरो मेरा।

हम; हमार, अम्हार, हमारो, म्हारो, हमारा हमें, हमहि, अम्हणउं

  • मध्यम पुरुष तू, तुहुँ, तै; तुहि, तोहि; तोर, तेरा, तेरो

तुम, तुम्ह; तुमहि, तुझ, तुज्झ तुम्हार, तुम्हारा, तुम्हारो, तिहारे

  • अन्य पुरुष – सो, से, सेइ, ताहि ते, वे, वै
  • संकेतवाचक – वह, ऊ, ओ वाहि, ओह, तासु, ताहि, उस, वे, ते, उन्ह, उन, तिन, यह, एह, ई, ए, एहु; याहि, या, इस, ये, ए, एह, इन, इन्ह, इन्हन
  • प्रश्नवाचक – को, कौन, कवन, कवण; का, काहे, केहि, किन्ह, के, किन्नि का, काह, क्या
  • सम्बन्धसूचक – जे, जो, जेई; जो, जिहि, जा, जिस, जिह, जिन्ह, जिन्हें, जिनहि
  • अनिश्वयवाचक  कोउ, कोई, काहु किसी, किनहिं, किछु, कुछु, कुछ।

विशेषण

बहुत, बहुतै, थोरो, केतिक, उच्चा, नीचा, झूठा, अघड।

संख्यावाचक विशेषण स्पष्ट हो रहे हैं-एक, एकु, एक्क, दोउ, दुहु, दुइ, तीनि, चउदह, दूनो, चउगुणा, पहिला, दूसर, दोसर, दूजो, तीजउ, चउथा। उकारांत, आकारांत विशेषणों का स्त्रीलिंग रूप ईकारांत और पुंल्लिग बहुवचन एकारांत हो जाता है, जैसे गाढ़ी, पातली, साँवरी; तीखे, ऊंचे।

क्रिया की कालरचना

एकवचनबहुवचन
उत्तम पुरूषदेखउं, देखौंदेखहि, देखैं
मध्यम पुरूषदेखहि देखइदेखहु, देखौ
अन्य पुरूषदेखहि, देखइदेखहिं, देखई, देखें

देखिया, देखे; देखैला (पूर्वी)

एकवचनबहुवचन
उत्तम पुरूषदेखिसि, देखिहउंदेखिस्यउं, देखिहैं
मध्यम पुरूषदेखिसि, देखिहैदेदेखिसिउ, देखिहौ, देखिहु
अन्य पुरूषदेखिसइ, देखिहिदेखिस्यइं, देखिहैं, देखिहहिं
एकवचनबहुवचन
उत्तम पुरूषआछौ, छउं, हउं, हूंछूँ, छहिं, अहहीं, है
मध्यम पुरूषअछइं, छइ, आहि, हैदेअछउ, छउ, होहु, हौ
अन्य पुरूषआछ, अछ, अहै, हइ, हैआछहिं, छिं, अहहीं, हैं
एकवचनबहुवचन
उत्तम पुरूषहाइहउं, ह्वै, हौंह्वैहैं
मध्यम पुरूषहोइइ, ह्वै, हैह्वैहो
अन्य पुरूषहोइहि, होब, होइगोह्वैहों, होहिंगे।

देखना, देखनो, देखनौ, देखिबौ

तपाइ (तपाकर), लगाइ (लगाकर), देखि करि, देखिकै, आइ, खाइ, खाय, देखि के।

उतारइ, जलावइ, देखावइ, बैठारे, सुनावत, करायो, देखायो, बिछावहिं।

कही जइ, कहीजै, कहीयइ, मारियतु, जानियत, कही न जाइ।

इनकी संख्या और इनके प्रकार बहुत बढ़ गए हैं।

उदाहरण-

कहे जात हैं; चलत न पाए, गएउ हेराइ, देखौ चाहत, सुनि सकत, अकुलाइ उठा, काटि डावउं, उतरि परा, छांड़ि चल्यौ, सुनावन लागै, लिएवं छुड़ाई, चितवत आहिं।

अव्यय

अविकारी या अव्यय उन शब्दों को कहते हैं, जिनमें लिंग, वचन, कारक इत्यादि के कारण कोई परिवर्तन नहीं होता जैसे – क्रिया विशेषण, संबंधवाचक, समुच्चयवाचक, विस्मयादिबोधक।

क्रिया विशेषण 

अजहूँ, आजु, आजहिं, अब, अबहीं, जब जबहिं, जब लगि, जौलौं, जद, जहिया, कब, कदे, कबहुँ, कबहुँक, काल्हि, बहुरि, फुनि, पुनि, पाछै, सदाई, नित, तुरित। इहां, हवाँ इहवाँ, इत, इतै, ऊहाँ, उहवाँ, हाँ, उत, तएँ, तहवाँ, तहीं, जहॅं , जहवाँ, जित, कहाँ, कित, कत, कहवाँ, कितै, कहूँ; अइस, अस, अइसन, जैसन, जइस, जस, तइसन, कस, जिमि, काहे, कै, क्यूँ। न, नाहीं, नहु, नहिन, जनि, मति, बिनु, किच्छे, केतो ।

समुच्चयबोधक

अउ, औ, अरु, अवर, अउर; के, कि, धौ, बरु; जउ, जनु, जनि ।

निष्कर्ष

  • व्याकरणिक कोटियों की दृष्टि से नये-नये प्रत्यय, परसर्ग और कृदंत रूप विकसित हुए। सविभक्तिक प्रयोग बहुत थोड़े हैं, प्रायः निर्विभक्तिक रूप अर्थात बिना कारक-चिह्न के अर्थ प्राप्त होते हैं ।
  • इसी प्रकार ध्वनि व्यवस्था, व्याकरण रूप तथा शब्द-भंडार की दृष्टि से आरम्भिक हिंदी अपभ्रंश, अवहट्ट एवं मध्यकालीन हिंदी के बीच की एक महत्वपूर्ण कड़ी है ।

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