भारतेन्दु मण्डल के साहित्यकार | Bhartendu Mandal ke Sahityakar

भारतेन्दु हरिश्चंद्र के प्रभाव से उनके इर्द-गिर्द साहित्यकारों का एक खासा मण्डल तैयार हो गया था जिन्हें ‘भारतेन्दु मण्डल’ कहा जाता है। तो आइए अब Bhartendu Mandal ke Sahityakar के संबंध में विस्तार से जानने का प्रयास करें ।

‘भारतेन्दु-मण्डल’ से आशय है- इस युग के कुछ ऐसे रचनाकारों से जो संवेदनात्मक स्तर पर एक-दूसरे के काफी निकट थे एवं एक-दूसरे से काफी जुड़े हुए थे। इस मण्डल के केन्द्र में भारतेन्दु थे और काशी उनकी गतिविधियों का मुख्य केन्द्र था। अधिकतर लेखक काशी और उसके आस-पास के नगरों के थे तथा कुछ ही इस क्षेत्र के बाहर के थे।

इन रचनाकारों में उपाध्याय बदरीनारायण चौधरी ‘प्रेमघन’ (मिर्जापुर), बालकृष्ण भट्ट (इलाहाबाद), दामोदर शास्त्री सप्रे (काशी), काशीनाथ खत्री (इलाहाबाद), रावकृष्ण देवशरण सिंह ‘गोप’ (काशी), लाला निवासदास (दिल्ली), मोहनलाल विष्णु पण्ड्या (काशी), कार्तिक प्रसाद खत्री (काशी), केशवराय भट्ट (पटना), ठाकुर जगमोहन सिंह (काशी), प्रतापनारायण मिश्र (कानपुर), अम्बिकादत्त व्यास (काशी), रामकृष्ण वर्मा (काशी), सुधाकर द्विवेदी (काशी), गोस्वामी राधाचरण (वृन्दावन), लाला सीताराम (इलाहाबाद), राधा कृष्णदास (काशी) आदि का नाम उल्लेखनीय है। इन लेखकों की शैलियों में भी व्यक्तिनिष्ठ विभिन्नता थी। ये सभी Bhartendu Mandal ke Sahityakar कहलाते हैं ।

ये सभी रचनाकार नवजागरण के समान आदशों से प्रेरित थे और कवि-वचन सुधा, हरिश्चंद्र चन्द्रिका, आनन्द कादम्बिनी, हिंदी  प्रदीप और ब्राह्मण जैसी साहित्यिक पत्रिकाओं के जरिए एक-दूसरे से जुड़े थे।

इन रचनाकारों ने कविता, नाटक, उपन्यास, निबंध, आलोचना-साहित्य की इन सभी विधाओं में लिखा। इनमें से उपन्यास, निबंध, आलोचना और पुस्तक समीक्षा की शुरूआत ही इस काल में हुई।

दूसरी ओर, इन्होंने गद्य-भाषा के रूप में खड़ी बोली को अपनाया और इसके कारण खड़ी बोली के लौकिक साहित्यिक परम्परा से इनका सहज ही सम्बन्ध जुड़ा। फलतः मुकरी और पहेलियों की अमीर खुसरों वाली शैलियों का पुनरूद्धार हुआ।

स्पष्ट है कि हिंदी साहित्य को संवेदना और शिल्प दोनों के ही धरातल पर स्वरूपगत विविधता प्रदान करने का श्रेय भारतेन्दु मंडल के लेखकों को जाता है।

इन्होंने गद्य के आविर्भाव को आंदोलन के रूप में परिवर्तित कर दिया जिसके कारण आचार्य रामचन्द्र शुक्ल को आधुनिक काल को गद्य काल कहना पड़ा; फिर भी गद्य में इन्होंने नाटक-लेखन और पत्रकारिता के क्षेत्र में विशेष सक्रियता दिखाई।

भारतेन्दु-मण्डल के तमाम रचनाकार आधुनिकता और राष्ट्रीयता के आदशों से प्रेरित थे और इसकी अभिव्यक्ति उन्होंने अपनी रचनाओं में की है।

 भारतेन्दु-युग नवजागरण चेतना का प्रथम चरण है जहाँ राजभक्ति और देशभक्ति का अन्तर्विरोध विद्यमान है। यह इस युग की ऐतिहासिक सच्चाई थी और इसलिए इससे मुँह चुराने की कोई जरूरत नहीं। भारतेन्दु लिखते हैं-

अंगरेज राज सुख साज सजै सब भारी।

पै धन विवेश चलि जात, इहै अति ख्वारी ॥

यहाँ एक साथ राजभक्ति और देशभक्ति दोनों को अभिव्यक्ति मिली है। इन्होंने यह अनुभव किया कि भारत की दुर्दशा हेतु एक ओर विदेशी सत्ता द्वारा किया जा रहा शोषण जिम्मेदार है-

अंधाधुंध मच्यौ सब देसा, मानहुँ राजा रहत विदेसा।

तो दूसरी ओर इस दुर्दशा हेतु हम स्वयं भी कम जिम्मेदार नहीं। प्रताप नारायण मिश्र लिखते हैं:

सर्वस लिये जाते अंगरेज, हम केवल लेक्चर के तेज।

इन्होंने भारत-भाई और भारती-भ्रात जैसे भावात्मक संबोधन के जरिये भारतवासियों को एकता के एक सूत्र में पिरोना चाहा, जहाँ जातीयता, क्षेत्रीयता और धर्म के सारे भेद निरस्त हो जाते हैं।

भारतेन्दु ने 1884 के बलिया व्याख्यान में समस्त भारतवासियों को हिन्दू माना, वहीं प्रेमघन का भारती भ्रात, हिन्दू-मुस्लिम, ईसाई, सिख, पारसी और जैन सभी को भारतीयता के एक सूत्र में जोड़ता है-

हिन्दू-मुस्लिम, जैन, पारसी ईसाई सब जात।

सुखी होवें, हिय भरें, प्रेमघन सकल भारती-भ्रात ॥

इनकी दृष्टि महज सामाजिक विषमता तक ही सीमित नहीं रहती है, वरन् ये आर्थिक विषमता पर भी प्रहार करते हैं। बालमुकुन्द गुप्त लिखते हैं-

हे धनियों! क्या दीन जनों की सुनते नहीं हो हाहाकार, जिसका पड़ोसी भूखे मरे, उसके धनिकों को धिक्कार।

ये अपनी भक्ति को भी राष्ट्रीय सामाजिक-सांस्कृतिक संदर्भ से जोड़ते हैं और भक्ति के भीतर की मानवीय धारा को पहचानते हुए अपने उपास्य से राष्ट्र की विपत्ति-ग्रस्त जनता के उद्धार की प्रार्थना करते हैं-

हम आरत भारत वसिन पै, दीन दयाल अब दया कीजै।

यदि राधाचरण गोस्वामी देशभक्ति पर आधारित रचना लेकर आते हैं:

है हाय-हाय दे ध्याय पुकारी कोई। भारत की डूबी नाव उबारी कोई

तो राधा कृष्ण दास की ईश्वर भक्ति उनकी देशभक्ति में समाहित हो गई :

प्रभ हो पुनि भूतल अवतरियो

अपने या प्यारे भारत को पुनि दुख दरिद्र हरियो

इस युग के रचनाकारों ने नाटक के जरिये अपनी राष्ट्रीय सांस्कृतिक चेतना को अभिव्यक्ति दी क्योंकि उनका उद्देश्य जनता में जागृति पैदा करना था और श्रव्य के साथ-साथ दृश्य माध्यम होने के कारण नाटक के जरिये ऐसा करना अपेक्षाकृत आसान था। नाटक के जरिये ये अपनी पहुँच समाज के विशाल अशिक्षित तबके तक बनाते हैं।

आधुनिक सैद्धांतिक और व्यावहारिक हिंदी आलोचना की शुरूआत का श्रेय भी भारतेन्दु-मंडल के रचनाकारों को जाता है।

हिंदी में सैद्धांतिक आलोचना का सूत्रपात भारतेन्दु के ‘नाटक’ नामक निबंध से होता है जिसमें भारतेन्दु ने देशवत्सलता को नाटक का उद्देश्य घोषित किया।

भारतेन्दु मंडल के रचनाकार केवल साहित्यकार ही नहीं थे, बल्कि वे रंगकर्मी भी थे। इन्होंने एक ओर नाटक-रंगमंच संबंध पर जोर दिया, तो दूसरी ओर पारसी रंगमंच के विकल्प के रूप में हिंदी के अव्यावसायिक रंगमंच की नींव डाली।

इनके साहित्य पर नवजागरण चेतना का असर देखा जा सकता है और इसी असर के कारण ये सामाजिक सुधारवाद का संदेश लेकर उपस्थित होते हैं।

यद्यपि भाषाई स्तर पर इन्होंने काव्यभाषा के रूप में ब्रजभाषा को ही अपनाया, लेकिन इनकी आधुनिक चेतना और नवजागरण की अभिव्यक्ति इनके गद्यों में मिलती है, जो खड़ी बोली में है। आगे चलकर यही खड़ी बोली द्विवेदी युग में मानक भाषा के रूप में प्रतिष्ठित होती है।

इन रचनाकारों ने साहित्यिक पत्रिकाओं के जरिये राष्ट्रीय सांस्कृतिक विचार-विमर्श को एक महत्वपूर्ण दिशा दिया। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने इनके योगदान को युगान्तरकारी बतलाते हुए लिखा है कि इन्होंने साहित्य को एक बार फिर से विशाल जनसमूह से जोड़ा।

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