नाथ-साहित्य की प्रमुख की विशेषताएँ | Nath Sahitya ki Pramukh Visheshtaen

नाथपंथ के प्रवर्तक गुरु गोरखनाथ थे । नाथों कि संख्या 9 मानी जाती है। बौद्धसिद्ध निरीश्वरवादी थे तो नाथसिद्ध ईश्वरवादी । उनका ईश्वरवाद सगुण ईश्वर के प्रति आस्थावान न होकर निरंजन (दुर्गुण एवं दोष रहित, माया रहित, निर्गुण ब्रह्म, परमात्मा)  के प्रति आस्थावान था।  इन 9 नाथों के नाम ‘गोरक्ष-सिद्धांत-संग्रह’ में उल्लिखित हैं। कृपया Nath Sahitya ki Pramukh Visheshtaen को समझने के लिए इस लेख को पूरा पढ़िए । इसके साथ ही आप नीचे जो वीडियो का लिंक लगा है उसे भी ज़रूर देखें । यह विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए अत्यंत उपयोगी है और इससे आप इस अवधारणा को भली-भाँति समझ पाएंगे इसका मुझे पूरा विश्वास है ।

महायान से वज्रयान, वज्रयान से सहजयान और सहजयान से नाथ-संप्रदाय का विकास हुआ । वज्रयानी सिद्धों के भोगप्रधान योगसाधना की प्रतिक्रियास्वरूप विकसित साहित्य ‘नाथ-साहित्य’ है । इसमें हठयोग-साधना का उपदेश दिया गया है ।  सब नाथों में प्रथम आदिनाथ माने जाते हैं । सम्पूर्ण ‘नाथ-साहित्य’ गुरु गोरखनाथ के साहित्य पर आधारित है । नाथ साहित्य संवाद के रूप में है ।

डॉ.रामकुमार वर्मा के अनुसार,  “नाथपंथ के चरमोत्कर्ष का समय 12 वीं सदी से 14 वीं सदी शताब्दी के अंत तक है – नाथपंथ से ही भक्तिकाल के संतमत का विकास हुआ था, जिसके प्रथम कवि कबीर थे ।” 

गुरु गोरखनाथ भक्ति विरोधी थे । इसीलिए गोस्वामी तुलसीदास ने उनके लिए कहा – गोरख जगायो जोग भगति भगायो लोग । 

गोस्वामी तुलसीदास के ठीक विपरीत कबीर ने गुरु गोरखनाथ को सादर स्मरण किया है ।

आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने गुरु गोरखनाथ के विषय में कहा है, “शंकराचार्य के बाद इतना प्रभावशाली और इतना महिमान्वित भारतवर्ष में दूसरा नहीं हुआ। भारतवर्ष के कोने-कोने में उनके अनुयायी आज भी पाए जाते हैं। भक्ति-आंदोलन के पूर्व सबसे शक्तिशाली धार्मिक आंदोलन गोरखनाथ का भक्तिमार्ग ही था । गोरखनाथ अपने युग के सबसे बड़े नेता थे ।” 

गुरु गोरखनाथ का संप्रदाय ‘नाथ संप्रदाय’ कहा जाता है । इसे ‘सिद्धमत’, ‘सिद्धमार्ग’, ‘योगमार्ग’, ‘योगसंप्रदाय, तथा ‘अवधूत मत’ भी कहा गया है ।  

आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने सिद्धों और नाथों की रचनाओं को साहित्य की कोटि में नहीं गिना है । उनका कहना है, “सिद्धों और योगियों की रचनाएं सांप्रदायिक शिक्षा मात्र हैं, अतः वे शुद्ध साहित्य की कोटि में नहीं आ सकतीं। उन रचनाओं की परंपरा को हम काव्य या साहित्य की कोई धारा नहीं कह सकते।”  

नाथपंथ के जोगी कान की लौ में बड़े-बड़े छेद करके स्फटिक के भारी-भारी कुंडल पहनते है, इससे कनफटे कहलाते हैं ।

नाथ-साहित्य की प्रमुख विशेषताएँ (Nath Sahitya ki Pramukh Visheshtaen)

नाथ साहित्य की प्रमुख विशेषताओं को हम निम्नलिखित बिंदुओं के आधार पर भली-भाँति समझ सकते हैं :

1. नाथ संप्रदाय के साहित्य में ‘ईश्वरवाद की स्वीकृति’ है। नाथों ने सिद्धों की विचारधारा को लेकर और उसमें नवीन विचारों की प्रतिष्ठा कर जीवन को कर्मकांडों के जाल से मुक्त कर सहज रूप देते हुए निरीश्वरवादी शून्य को ईश्वरवादी शून्य में परिणत कर दिया।

सुनि ज माइ सुनि ज बाप। सुंनि निरंजन आपै आप।

सुंनि कै परचै भया सथीर। निहचल जोगी गहर गंभीर।

गोरखबानी

2. नाथ-साहित्य में ‘शून्य की साधना’ पर विशेष बल है। नाथ-साहित्य में शून्य का संबंध नादतत्त्व से स्थापित किया गया है। डॉ. रामकुमार वर्मा लिखते हैं कि “इसी शून्य को कबीर ने आगे चलकर सहस्रदलकमल का शून्य माना है, जहाँ अनहदनाद की सृष्टि होती है और ईश्वर की ज्योति के दर्शन होते हैं……. गोरखनाथ ने इसी शून्यवाद का प्रचार किया। इसके कारण उन्हें योग की साधना को महत्त्व देना पड़ा, जो नाथपंथ का एक आवश्यक अंग है।”

3. नाथ-साहित्य में निवृत्ति ज्ञान योग, वैराग्य-भावना, इंद्रिय-निग्रह प्राण-साधना, मन-साधना, नाड़ी-साधना, कुंडलिनी-इंगला-पिंगला, सुषुम्ना की साधना, षट्चक्र साधना, अनहदनाद, ब्रह्मरंध्र-साधना इत्यादि का वर्णन  विशेष रूप से मिलता है।

4. नाथ-पंथ में गुरु का स्थान सर्वोच्च एवं गौरवपूर्ण है। नाथ संप्रदाय में क्रिया पक्ष का प्रारंभ गुरु मंत्र द्वारा होता है। गुरु ही आत्मब्रह्म से साक्षात्कार कराते हैं, उनके उपदेश से मन और बुद्धि की तृष्णा खत्म होती है और उनसे प्राप्त ज्ञान के प्रकाश में तीनों लोकों का रहस्य प्रकट हो जाता है –

प्रथमे प्रणेउ गुरु के पाया। जिन मोहि आत्मज्ञान लखाया।

सतगुरु सबद कहयां तै बूझया। तिहुँ लोक दीपक मनि सूझ्या ।।

5. नाथ-साहित्य में जहाँ जाति-पाति, बाह्याचार, तीर्थाटन, आडंबर, कर्मकांड, ईश्वर-उपासना के बाह्यविधानों के प्रति विरोध-भाव है, वहीं आचरण की पवित्रता, मन की शुद्धता, शील, ब्रह्मचर्य, आंतरिक शुद्धि, नशीली चीजों का त्याग, अनाचारी जीवन के प्रति वितृष्णा, चित्त-शुद्धि, सदाचार इत्यादि पर विशेष बल है। नाथों ने साधना में नारी का आकर्षण सबसे बड़ी बाधा मानते हुए इसे अनाचार की नींव की संज्ञा दी।

 गोरखबानी में कहा गया है कि-

भोगिया सूते अजहुं न जागे। भोग नहीं रे रोग अभागे।

भोगिया कहै भल भोग हमारा। मनसइ नारि किया तन छारा ।।

नाथपंथियों ने संयम, सदाचार, इंद्रियनिग्रह के द्वारा सहज मार्ग अपनाते हुए जीवन-यापन का जो संदेश दिया, वह स्तुत्य है।

आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने उचित ही कहा है कि “नाथों ने परवर्ती संतों के लिए श्रद्धाचरण प्रधान धर्म की पृष्ठभूमि तैयार कर दी। जिन संत साधकों की रचनाओं से हिंदी-साहित्य गौरवान्वित है, उन्हें बहुत कुछ बनी बनाई मिली थी।”

6. इंद्रिय-निग्रह के साथ-साथ नाथ-साहित्य में प्राण-साधना एवं मनः साधना पर विशेष बल दिया गया है। प्राण-साधना से अभिप्राय शरीर के अन्तर्गत प्राण-वायु के नियमित संचालन और कुंभकादि से है। प्राण-साधना में प्रणायाम की सिद्धि होती है, जिससे जप फलीभूत होता है। मनःसाधना से तात्पर्य मन को संसार से खींचकर अन्तःकरण की ओर उन्मुख करने से है। कहने का अभिप्राय यह है कि मन की जो स्वाभाविक गति बाह्य जगत् की ओर है उसे उलटकर अंतर्जगत् की ओर करना ही मन की साधना की कसौटी है। यही उलटने की क्रिया उलटबांसियों का आधार है। वस्तुतः, नाथ संप्रदाय में ईश्वर प्राप्ति की साधना अंतःसाध्य है।

 कलापक्ष की विशेषताएँ

1. आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के अनुसार नाथपंथियों की भाषा सधुक्कड़ी थी, जिसका ढाँचा खड़ीबोली मिश्रित राजस्थानी थी। लक्ष्मीसागर वार्ष्र्णेय के अनुसार – “नाथपंथियों की भाषा पुरानी पश्चिमी हिंदी की बोलियों के एक मिश्रित रूप में थी, जिसने आगे चलकर संत साहित्य (कबीर) की भाषा की नींव डाली।”

2. नाथपंथियों ने मुख्य रूप से 3 शैलियाँ अपनायीं :

  • (i) प्रश्नोत्तर काव्य के माध्यम से सिद्धान्त कथन-शैली,
  • (ii) वैराग्य भाव के गेय पद की शैली,
  •  (iii) उपमानों की विरोधात्मक योजना पर आधारित उलटबांसियों की चमत्कारपूर्ण शैली।

3. छंद की दृष्टि से दोहा और साखी इनके प्रिय छंद थे। नाथ-साहित्य साखी, सबदी, दोहा, सोरठा और चौपाई इत्यादि छंदों में रचित है। कुछ रचनाएँ राग-रागिनी में भी निबद्ध हैं।

4. नाथ-साहित्य का अंगी रस शांत रस है। वैसे, नाथ साहित्य में यत्र-तत्र अद्भुत, श्रृंगार एवं वीभत्स रस की भी झलक मिलती है।

5. उलटबांसियों, रूपकों, प्रतीकों के द्वारा नाथ साहित्य में रहस्यवाद की भी सुंदर अभिव्यंजना हुई है।

निष्कर्ष

1. नाथपंथियों का साहित्य साहित्यिक दृष्टि से महत्व नहीं रखता, परंतु जीवन की स्वाभाविक अनुभूतियों और दशाओं के चित्रण में नाथ-साहित्य का महत्त्व नकार नहीं जा सकता। वज्रयानियों के गर्हित (निंदित) अंश को त्यागकर इन्होंने मानव-जीवन के चारित्रिक अभ्युत्थान में दृढ़योग दिया ।

2. ज्ञान का अलख जगाने के लिए इन्होंने जो पद्धति अपनायी, वह भक्तिकाल के संतों को विरासत में मिली है ।

3. नाथ-साहित्य का वर्ण्य-विषय भावावेग शून्य शुष्क ज्ञान है, जिसमें गुरु को महत्त्व दिया गया है ।

4. इन्होंने आचरण की शुद्धता एवं चारित्रिक दृढ़ता पर बल दिया है तथा इंद्रिय निग्रह ( इंद्रियों और काम इच्छाओं को वश में रखना), नारी से दूर रहने की बात कही है ।

5. गृहस्थ जीवन की उपेक्षा से नीरसता एवं रूखापन आ गया है ।

6. विषय के रूखापन और नीरसता को दूर करने के लिए उन्होंने कई रोचक पद्धतियों को अपनाया है तथा गेयपद, प्रश्नोत्तर शैली द्वारा श्रोताओं को आकृष्ट किया है ।

7. उलटबासियों द्वारा विषय-निरूपण किया है।

8. इंद्रियनिग्रह के बाद प्राणसाधना, फिर मन:साधना पर बल दिया है । मन:साधना के लिए अनेक क्रियाओं का उल्लेख किया है । जैसे – नाड़ी साधना, कुंडलिनी, इला, पिंगला, सुषुम्ना, ब्रह्मरंध्र, षटचक्र, सुरतयोग, अनहदनाद आदि ।

9. पर्यटक होने के कारण इनकी भाषा में अनेक बोलियों व भाषाओं का मेल है, पर पूर्वी हिंदी का प्रभाव अधिक है ।  

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