राम की शक्तिपूजा की व्याख्या भाग 11 | ram ki shaktipuja ki vyakhya | part 11

रावण महिमा श्यामा विभावरी अन्धकार,

यह रुद्र राम पूजन प्रताप तेजः प्रसार।

इस ओर शक्ति शिव की जो दशस्कंध पूजित,

उस ओर रुद्र वन्दन जो रघुनंदन कूजित।

करने को ग्रस्त समस्त व्योम कपि बढ़ा अटल,

लख महानाश शिव अचल हुए क्षण भर चंचल।

श्यामा के पदतल भार धरण हर मंद्र स्वर,

बोले – “सम्बरो, देवि निज तेज नहीं वानर,

यह, नहीं हुआ श्रृंगार युग्म-गत-महावीर,

अर्चना राम की मूर्तिमान अक्षय शरीर।

चिर ब्रह्मचर्यरत ये एकादश रुद्र धन्य,

मर्यादा पुरुषोत्तम के सर्वोत्तम अनन्य।

लीला सहचर दिव्य भावधर इन पर प्रहार,

करने पर होगी देवि तुम्हारी विषम हार।

विद्या का ले आश्रय इस मन को दो प्रबोध,

झुक जाएगा कपि निश्चय होगा दूर रोध।

सन्दर्भ

प्रस्तुत पंक्तियां छायावादी कवि सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ द्वारा रचित ‘राम की शक्ति पूजा’ से ली गई हैं। मूल रूप से यह कविता उनके काव्य संग्रह ‘अनामिका’ में संकलित है।

प्रसंग

हनुमान को जब यह बोध हुआ कि मेरे प्रभु राम की आँखों में आँसू हैं तो वे प्रचण्ड क्रोध से भरकर विराट रूप धारण कर आकाश को निगल जाने के लिए तत्पर होकर हुंकार भरते हुए आकाश में जा पहुँचे।

आकाश में एक ओर रुद्रावतार हनुमान थे तो दूसरी ओर रावण को महिमा प्रदान करने वाली श्यामा थी।

यदि दोनों में युद्ध छिड़ गया तो प्रलय हो जाएगी। यह सोचकर शंकर जी ने देवी को समझाते हुए कहा कि तुम हनुमान को शक्ति से नहीं विवेक बुद्धि से झुका सकोगी और तभी प्रलय का यह संकट मिट सकेगा।

व्याख्या

आकाश में एक ओर तो रात्रि के अंधकार जैसी काली वह श्यामा (देवी) थी जो रावण की रक्षा करते हुए उसे महिमावान् बना रही थी तो दूसरी ओर रुद्रावतार हनुमान थे जो राम की पूजा के प्रताप से अपने तेज का प्रसार कर रहे थे।

एक ओर शिव की वह शक्ति थी जो रावण के द्वारा पूजी गई थी और दूसरी ओर हनुमान की वह राम भक्ति थी जो निरन्तर राम नाम के जप से शक्ति सम्पन्न बन गई थी।

हनुमान आकाश को निगल जाने के दृढ़ निश्चय को लेकर आगे बढ़े। यह देखकर शान्त रहने वाले शिवजी भी क्षणभर के लिए अस्थिर हो उठे, क्योंकि उन्हें यह प्रतीत हुआ कि यदि हनुमान ने आकाश निगल लिया तो प्रलय हो जाएगी।

काली देवी के पैरों का भार धारण करने वाले शिवजी मेघ जैसे गम्भीर स्वर में देवी को सम्बोधित करते हुए इस प्रकार कहने लगे- हे देवी! आप अपने तेज का संवरण करें। जिसे आप केवल वानर समझ रही हैं वे महान बलशाली हनुमान हैं, जो चिर ब्रह्मचारी हैं और अभी तक शृंगार के जोड़े में आबद्ध नहीं हुए हैं। ये राम की अर्चना के साक्षात् प्रतिरूप हैं, अमर एवं अक्षय शरीर वाले हैं।

ये ग्यारहवें रुद्र के अवतार हैं तथा मर्यादा पुरुषोत्तम राम के अनन्य भक्त एवं सेवक हैं। ये उनकी लीलाओं में सहभागी बनकर पृथ्वी पर अवतीर्ण हुए हैं, अतः तुम इनका कुछ भी नहीं बिगाड़ सकोगी।

 मैं तुम्हें सचेत करताहूँ कि यदि भूल से भी तुमने इन पर प्रहार करने की गलती की, तो हे देवी! तुम्हें भयंकर पराजय का सामना करना पड़ेगा। इसलिए तुम्हें विवेक बुद्धि का आश्रय लेकर इनके क्रोध युक्त मन को समझा-बुझाकर शान्त करना पड़ेगा तभी सृष्टि पर आया हुआ प्रलय का यह संकट टल सकेगा।

विशेष

  • हनुमान को ग्यारहवें रुद्र का अवतार माना गया है ।
  • देवी और हनुमान का यह संघर्ष सम्भवतः बंगला की ‘कृत्तिवासी रामायण’ से निराला जी ने लिया है।
  • श्यामा-देवी का नाम, काले रंग की – श्लेष अलंकार ।
  • शिव अचल हुए क्षण भर चंचल-विरोधाभास अलंकार।
  • नहीं वानर यह-अपन्हुति अलंकार ।
  • हनुमान की क्षमता एवं सामर्थ्य का वर्णन है। जिसने सूर्य को बचपन में निगल लिया हो, वह आकाश को भी निगल सकता है।

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