राम की शक्तिपूजा की व्याख्या भाग 12 | ram ki shaktipuja ki vyakhya | part 12

कह हुए मौन शिव, पवन तनय में भर विस्मय,

सहसा नभ में अंजना रूप का हुआ उदय।

बोली माता- “तुमने रवि को जब लिया निगल

तब नहीं बोध था तुम्हें, रहे बालक केवल।

यह वही भाव कर रहा तुम्हें व्याकुल रह-रह,

यह लज्जा की है बात कि मां रहती सह-सह।

यह महाकाश है जहाँ वास शिव का निर्मल-

पूजते जिन्हें श्री राम उसे ग्रसने को चल।

क्या नहीं कर रहे तुम अनर्थ सोचो मन में,

क्या दी आज्ञा ऐसी कुछ श्री रघुनन्दन ने?

तुम सेवक हो छोड़कर धर्म कर रहे कार्य-

क्या असंभाव्य हो यह राघव के लिए धार्य?”

कपि हुए नम्र, क्षण में माता छवि हुई लीन,

उतरे धीरे-धीरे गह प्रभुपद हुए दीन ॥

सन्दर्भ

प्रस्तुत पंक्तियां छायावादी कवि सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ द्वारा रचित ‘राम की शक्ति पूजा’ से ली गई हैं। मूल रूप से यह कविता उनके काव्य संग्रह ‘अनामिका’ में संकलित है।

प्रसंग

जब हनुमान को यह पता चला कि राम की आँखों में आँसुओं का कारण श्यामा (देवी) है तो वे श्यामा से संघर्ष करने तथा आकाश को निगल जाने के लिए क्रुद्ध होकर आकाश में जा पहुँचे।

उनके इस निश्चय को जानकर भगवान शिव व्याकुल हो उठे और उन्होंने देवी से अनुरोध किया कि आप हनुमान पर प्रहार न करें अन्यथा आपको हार का सामना करना पड़ेगा।

आप विद्या-बुद्धि एवं विवेक का सहारा लेकर इन्हें समझाएं तो सृष्टि पर आया यह संकट टल सकता है।

देवी ने इसीलिए माता अंजनी का रूप धारण कर हनुमान को आकाश न निगलने के लिए कहा और हनुमान विनम्र होकर पृथ्वी पर उतर आए।

इन पंक्तियों में इसी वृत्तान्त का वर्णन कवि ने किया है।

व्याख्या

देवी को भगवान शिव ने यह बताया कि हनुमान को विद्या-बुद्धि का सहारा लेकर समझाओ तथा भूल से भी इन पर प्रहार मत करना, अन्यथा तुम्हें हार का सामना करना पड़ेगा।

 इतना कहकर शिवजी तो शान्त हो गए किन्तु अचानक ही अपनी माता अंजनी को आकाश में प्रकट देखकर हनुमान विस्मय से भर उठे।

वास्तव में देवी ही अंजना का रूप धारण कर आकाश में प्रकट हो गई थीं। माता अंजना हनुमान को समझाती हुई कहने लगीं कि बचपन में एक बार जब तुमने सूर्य को निगल कर संसार को संकट में डाल दिया था, तब तुम्हारा अपराध यह समझकर सबने क्षमा कर दिया था कि तुम अबोध बालक हो और तुम्हें भले-बुरे का ज्ञान नहीं है।

किन्तु ऐसा लगता है कि तुम्हारा बचपना अभी तक गया नहीं है इसलिए तुम आकाश को निगलने की सोच रहे हो।

तुम्हारे लिए यह लज्जा की बात है कि तुम्हारी माता को अपने पुत्र के ऐसे कारनामों के कारण दूसरों की बातें सहनी पड़ें। लोग यही तो कहेंगे कि अंजना ने कैसा पुत्र उत्पन्न किया है जो सृष्टि को बार-बार संकट में डाल देता है।

जरा विचार करो कि यह महाकाश है जहाँ भगवान शिव का निर्मल निवास है। शिव की पूजा तो तुम्हारे प्रभु श्री राम भी करते हैं, अतः उस आकाश को निगलने का निश्चय कर लेना क्या तुम्हारे लिए उचित होगा?

क्या प्रभु श्री राम ने तुम्हें इस प्रकार की कोई आज्ञा दी है? हे पुत्र ! तुम राम के सेवक हो। सेवक का कार्य होता है स्वामी की आज्ञा का पालन करना, किन्तु इस समय तुम सेवक धर्म को त्यागकर अपनी इच्छा से आकाश को निगलने का जो कार्य करने जा रहे हो वह निश्चय ही तुम्हारे स्वामी राम को भी स्वीकार नहीं होगा।

अंजना के इस उपदेश को सुनकर हनुमान विनम्र हो गए। क्षण भर में ही माता अंजना की छवि अंतर्धान हो गई और हनुमान ने धीरे-धीरे पृथ्वी पर उतर कर प्रभु राम के चरणों को दीन भाव से पकड़ लिया।

विशेष

(1) हनुमान मातृभक्त हैं। माता अंजना के समझाने पर वे शान्त हो गए।

(2) देवी ने ही शंकर जी के सुझाव पर अंजना का रूप धारण किया था।

(3) हनुमान राम के सेवक हैं – यह बात अंजना ने यहाँ कहकर इन्हें सेवक धर्म का निर्वाह करने को कहा है।

(4) वक्रोक्ति अलंकार है।

(5) भावानुकूल भाषा का प्रयोग किया गया है।

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