राम की शक्तिपूजा की व्याख्या भाग 7 | ram ki shaktipuja ki vyakhya | part 7

सिहरा तन, क्षण भर भूला मन, लहरा समस्त,

हर धनुर्भंग को पुनर्वार ज्यों उठा हस्त,

 फूटी स्मिति सीता-ध्यान-लीन राम के अधर,

 फिर विश्व-विजय-भावना हृदय में आयी भर,

 वे आये याद दिव्य शर अगणित मन्त्रपूत,

फड़का पर नभ को उड़े सकल ज्यों देवदूत,

 देखते राम, जल रहे शलभ ज्यों रजनीचर,

ताड़का, सुबाहु, विराध, शिरस्त्रय, दूषण, खर,

 फिर देखी भीमा-मूर्ति आज रण देखी जो

आच्छादित किए हुए सम्मुख समग्र नभ को,

ज्योतिर्मय अस्त्र सकल बुझ-बुझकर हुए क्षीण,

 पा महानिलय उस तन में क्षण में हुए छीन,

रुख शंकाकुल हो गये अतुल-बल शेष-शयन,

खिंच गये दृगों में सीता के राममय नयन,

फिर सुना-हँस रहा अट्टहास रावण खलखल,

भावित नयनों से सजल गिरे दो मुक्ता-दल।

सन्दर्भ 

प्रस्तुत पंक्तियां छायावादी कवि सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ द्वारा रचित ‘राम की शक्ति पूजा’ से ली गई हैं। मूल रूप से यह कविता उनके काव्य संग्रह ‘अनामिका’ में संकलित है।

प्रसंग

सीता की स्मृति मात्र से राम के निराश हृदय में आशा का संचार हो गया और उनके हृदय में फिर से वही उत्साह तरंगित हो उठा जो शिव धनुष तोड़ते समय था।

अतीत की स्मृतियों में खोये राम के मानस पटल पर पुराने दृश्य एक-एक करके उभरने लगे। किस प्रकार उनके वाणों के तेज में ताड़का, सुबाहु, खर, दूषण आदि जले थे।

तत्पश्चात् उनकी कल्पना में आज के युद्ध का दृश्य दिखाई पड़ा। उन्होंने देखा कि उनके द्वारा छोड़े गए वाण उस महाशक्ति के वदन में लीन होते जा रहे थे, इसीलिए वे रावण को परास्त नहीं कर पाए। उनकी आंखों में विवशता के आँसू झलकने लगे।

व्याख्या

सीता की स्मृति मात्र से राम का शरीर रोमांचित हो गया और क्षण भर के लिए उनकी निराशा समाप्त हो गई तथा हृदय में उत्साह की तरंगें लहराने लगीं।

एक बार फिर से शिव धनुष को तोड़ते समय का उत्साह उन्हें अपने हृदय में अनुभव होने लगा। सीता की स्मृति में डूबे हुए राम के अधरों पर आशा की मुस्कान फूट पड़ी और उनके हृदय में सम्पूर्ण संसार को जीत लेने की भावना फिर से भर आई।

उन्हें अपने वे अनेक अभिमंत्रित वाण स्मरण हो आए जिनकी सहायता से उन्होंने अनेक राक्षसों का वध किया था। वे वाण आकाश में इस प्रकार उड़ते थे मानो पंख फैलाकर देवदूत आकाश में उड़ रहे हों।

 राम अपनी कल्पना में देख रहे हैं कि उनके वाणों की आग में राक्षस इस प्रकार जल रहे हैं जैसे पतंगे आग में जलते हैं। अब तक जिन राक्षसों का वध राम ने किया था-ताड़का, सुबाहु, त्रिशिरा, खर-दूषण वे सब उनके तेजस्वी वाणों में जलते हुए उन्हें अपने मानस पटल पर दिखाई दे रहे थे।

तत्पश्चात् उन्हें अपनी कल्पना में आज के युद्ध का दृश्य दिखाई पड़ा। उन्होंने देखा कि देवी की भीमकाय मूर्ति (श्यामा) उनके समक्ष समस्त आकाश को आच्छादित किए हुए थी तथा रावण की रक्षा उनके प्रहारों से कर रही थी।

 राम के द्वारा छोड़े गए तेजस्वी अस्त्र-शस्त्र देवी के शरीर में प्रविष्ट होकर शान्त हो जाते थे और रावण पर उनका कोई प्रभाव नहीं पड़ रहा था।

 यह देखकर अतुलित बलशाली राम, जो शेषनाग की शैया पर शयन करने वाले विष्णु के अवतार हैं, आशंकित हो उठे। उन्हें लगा कि अब रावण को पराजित कर पाना सम्भव नहीं है, क्योंकि शक्ति उसकी रक्षा कर रही है।

 यदि रावण पराजित नहीं हुआ तो सीता की मुक्ति सम्भव नहीं है, अतः वे अत्यन्त चिन्तित हो उठे और उनके नेत्रों में अशोक वाटिका में बैठी वियोगिनी सीता की वह छवि खिंच गई जिसमें केवल राम ही राम समाए हुए हैं।

तत्पश्चात् उन्हें ऐसा लगा जैसे दुष्ट रावण राम की इस विवशता पर अट्टहास कर रहा है। मानो वह यह कह रहा है कि मैंने शक्ति को अपने वशीभूत कर लिया है और इसलिए तुम मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकते। अपनी इस विवशता पर राम की भावपूर्ण आँखों से मोती रूपी दो आँसू टपक पड़े।

कवि ने यहाँ राम-रावण के माध्यम से सत्-असत् के संघर्ष को प्रस्तुत किया है। रावण जैसे दुष्ट आज भी हमारे समाज में विद्यमान हैं जो किसी की पत्नी का अपहरण करके रावण की तरह ही अट्टहास कर रहे हैं।

उन्होंने धन बल, बाहुबल एवं अन्य सभी प्रकार की शक्तियों को अपने कब्जे में कर रखा है। ऐसी स्थिति में सामान्य जन (आम आदमी) आँखों से आँसू बहाने के अतिरिक्त भला और क्या कर सकता है?

विशेष

(1) सीता की स्मृति मात्र से राम की निराशा दूर हो गई। हृदय में आशा और उत्साह का संचार हो गया-ऐसा कहकर निराला ने छायावादी नारी भावना को यहाँ अभिव्यक्ति दी है।

नारी की इसी भूमिका का उल्लेख अन्य छायावादी कवियों ने भी किया है। निराश पुरुष को वह आशा एवं उत्साह से भर देने की सामर्थ्य रखती है।

(2) हर धनुर्भग..  हस्त में उपेक्षा अलंकार का प्रयोग किया गया है ।

(3) फड़का पर नभ.. देवदूत में उत्प्रेक्षा अलंकार का प्रयोग किया गया है ।

 (4) लख शंकाकुल.. शेष नयन में विरोधाभास अलंकार है ।

(5) मुक्ता दल में रूपकातिशयोक्ति लंकार का प्रयोग किया गया है ।

(6) लाक्षणिक भाषा, प्रतीकात्मक शैली, छायावादी भाव-शिल्प सर्वत्र विद्यमान है।

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