राम की शक्तिपूजा की व्याख्या भाग 9 | ram ki shaktipuja ki vyakhya | part 9

ये नहीं चरण राम के बने श्यामा के शुभ-

सोहते मध्य में हीरक-युग या दो कौस्तुभ

 टूटा वह तार ध्यान का स्थिर मन हुआ विकल

 संदिग्ध भाव की उठी दृष्टि, देखा अविकल

 बैठे थे वही कमल लोचन पर सजल नयन

व्याकुल-व्याकुल कुछ चिर प्रफुल्ल मुख निश्चेतन

सन्दर्भ

प्रस्तुत पंक्तियां छायावादी कवि सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ द्वारा रचित ‘राम की शक्ति पूजा’ से ली गई हैं। मूल रूप से यह कविता उनके काव्य संग्रह ‘अनामिका’ में संकलित है।

प्रसंग

हनुमान जी ध्यानमग्न राम के समीप बैठे हुए थे तथा नेत्र बन्द किए हुए राम के चरणों को ध्यान में देख रहे थे। राम देवी के ध्यान में इतने तल्लीन थे कि उनके चित्त की तदाकार परिणति हो गई और वे तद्रूप हो गए अर्थात् देवी के रूप में बदल गए इसलिए राम के चरण हनुमान को देवी के चरणों के रूप में दिखाई देने लगे। संदेह भरी हुई दृष्टि से नेत्र खोलकर हनुमान ने देखा कि उनके सामने देवी नहीं अपितु राम बैठे हैं, किन्तु उनकी आँखों में आँसू हैं। इन पंक्तियों में कवि ने इसी वृत्तान्त का वर्णन किया है।

 व्याख्या

राम श्यामा (देवी) के ध्यान में डूबे हुए थे। ध्यान की तल्लीनता में उनके चित्त की तदाकार परिणति हो गई परिणामतः वे स्वयं को देवी रूप में अनुभव करने लगे।

इधर हनुमान वहीं ध्यानमग्न बैठे हुए राम के चरणों का ध्यान कर रहे थे। अब राम के चरण देवी के चरण बन गए थे अतः हनुमान को ध्यान में राम के स्थान पर जब देवी के चरण दिखाई दिए तो वे सोचने लगे कि अरे ये चरण राम के न होकर देवी के शुभ चरण हैं, जिन पर गिरे हुए आँसू दो हीरों की तरह या दो कौस्तुभ मणियों की तरह चमक रहे थे।

हनुमान के ध्यान की तल्लीनता भंग हो गई तथा उनके स्थिर एवं शांत मन में व्याकुलता भर गई। संदेह से भरकर उन्होंने अपने नेत्र खोले और जब दृष्टि ऊपर उठाई तो उन्हें अपने समक्ष वही कमल जैसे नेत्रों वाले राम बैठे दिखाई पड़े, किन्तु उनके मुख पर व्याकुलता एवं चिन्ता के भाव थे तथा सदैव प्रफुल्लित रहने वाला वह मुख मुरझाया हुआ था और उनकी आँखों में आँसू की बूंदें झलक रही थीं।  

विशेष

(1) प्रथम पंक्ति में अपन्हुति अलंकार है, क्योंकि उपमेय का निषेध करके उपमान की स्थापना की गई है।

(2) ‘कमल लोचन’ में उपमा अलंकार है ।

(3) ‘चिर प्रफुल्ल मुख निश्चेतन’ में विरोधाभास अलंकार है ।

(4) ‘व्याकुल-व्याकुल’ में पुनरुक्तिप्रकाश है।

(5) ‘सोहते मध्य में हीरक युग या दो कौस्तुभ’ में संदेह अलंकार है।

(6) छायावादी भाषा और लाक्षणिक पदावली का प्रयोग किया गया है ।

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