अलीगढ़ (उ.प्र.) जिले के ‘अतरौली’ नामक कस्बे में जन्मे, नागपुर और आगरा से पढ़े-लिखे तथा दिल्ली विश्वविद्यालय में शिक्षक रहे डॉ. नगेन्द्र (09.03.1915-27.10.1999) ने काव्यशास्त्र और आलोचना के क्षेत्र में अत्यंत महत्वपूर्ण और वृहद् कार्य किया है । आज हम Dr Nagendra ki Alochana Drishti को विस्तार से समझने का प्रयास करेंगे ।
डॉ. नगेन्द्र व्यावहारिक आलोचक के रूप में ही आलोचना के क्षेत्र में प्रवेश करते हैं । 1937-38 ई. में इनकी पहली समीक्षा-पुस्तक ‘सुमित्रानन्दन पंत‘ प्रकाशित हुई थी। इसमें पंत जी के काव्य का व्यवस्थित विवेचन-विश्लेषण युगीन प्रवृत्ति के आधार पर किया गया है। इस पुस्तक में पंत जी के बहाने एक तरह से समूचे छायावाद का मूल्यांकन करने का प्रयास हुआ है ।
डॉ. नगेन्द्र साहित्य को आत्माभिव्यक्ति मानते हैं और उसकी स्वायत्तता (जिस पर अपना अधिकार हो) के समर्थक हैं। वे काव्य में सौन्दर्य-चेतना के समर्थक हैं और अभिव्यंजना के सौन्दर्य को कविता का अनिवार्य तत्त्व मानते हैं। डॉ. नगेन्द्र ने भारतीय काव्य-चिन्तन को पाश्चात्य काव्य-चिन्तन या सौन्दर्य-चिन्तन के आलोक में देखा है और दोनों में संगति बैठाने की चेष्टा की है।
डॉ. नगेन्द्र रीतिकाव्य और छायावादी काव्य की ही नहीं बल्कि सियारामशरण गुप्त और बच्चन की कविता की भी मनोवैश्लेषिक व्याख्या करते हैं।
डॉ. नगेन्द्र की समीक्षा-दृष्टि में एक अध्यापक की तटस्थता और व्यवस्था है । डॉ. नगेन्द्र को समन्वयशील समीक्षक कहा गया है।
डॉ. नगेन्द्र ने ‘अभिव्यक्ति’ और ‘निर्मिति’, ‘आनन्दवाद’ और ‘लोक-कल्याण’, ‘व्यष्टि-चेतना’ और ‘समष्टिचेतना’, ‘पाश्चात्यचिन्तन’ और ‘भारतीयचिन्तन’, ‘स्वायत्तता’ और ‘समाज-सापेक्षता’ तथा ‘गांधीवाद’ और ‘समाजवाद’ में समन्वय स्थापित करने की बात अनेक अवसरों पर कही है; किन्तु यह समन्वय अपनी मूल मान्यताओं में परिवर्तन किये बिना तर्क के स्तर पर विरोधी मान्यताओं से संगति बैठाने का बौद्धिक प्रयास मात्र है।
डॉ. नगेन्द्र ने स्वयं कहा है- “किन्तु काव्य के मौलिक तत्त्वों के विषय में मेरी स्थिति में कोई परिवर्तन नहीं हुआ।” (आस्था के चरण)
{काव्य के मौलिक तत्त्व : भाव तत्त्व, कल्पना तत्त्व, बुद्धि तत्त्व, शैली तत्त्व, रस, अलंकार इत्यादि}
डॉ. नगेन्द्र का सर्वाधिक महत्व इस इस बात में है कि उन्होंने रस-सिद्धांत के मनोवैज्ञानिक आधार का, उसकी मूलभूत प्रेरणाओं का उद्घाटन किया और रस को मनोवैज्ञानिक भूमि पर प्रतिष्ठित किया ।
डॉ. नगेन्द्र की समीक्षाओं में अधिकांशत: भारतीय साहित्यशास्त्र की नवप्रतिष्ठा का, उसके संशोधन और संस्कार का प्रयत्न लक्षित होता है ।
अनुभूति व अभिव्यक्ति को काव्य की मुख्य प्रेरणा माननेवाले डॉ. नगेन्द्र ने स्पष्ट कहा है कि, “किसी भी साहित्य के साहित्य होने की मुख्य बुनियादी शर्त है उसका अनुभूतिमय होना ।” उनकी दृष्टि में यही वह तत्त्व है जो देश-काल से परे काव्य-विवेचन का एक शाश्वत (सदा रहनेवाला) आधार हो सकता है ।
डॉ. नगेन्द्र की प्रमुख आलोचनात्मक कृतियाँ
डॉ. नगेन्द्र की प्रमुख आलोचनात्मक कृतियाँ निम्नलिखित हैं :
- सुमित्रानन्दन पंत
- कामायनी के अध्ययन की समस्याएँ
- साकेत: एक अध्ययन
- आधुनिक हिन्दी नाटक
- विचार और अनुभूति
- रीति काव्य की भूमिका
- आधुनिक हिन्दी कविता की मुख्य प्रवृत्तियाँ
- विचार और विवेचन
- विचार और विश्लेषण
- काव्य में उदात्त तत्त्व
- अनुसन्धान और आलोचना
- आस्था के चरण
- नई समीक्षा नए सन्दर्भ
- समस्या और समाधान
- रस सिद्धान्त
- आलोचक की आस्था
- काव्य बिम्ब
- चेतना बिम्ब
- नई समीक्षा : नए सन्दर्भ
- भारतीय सौन्दर्यशास्त्र की भूमिका
- शैली विज्ञान
- मिथक और साहित्य
- साहित्य का समाज शास्त्र
- भारतीय समीक्षा और आचार्य शुक्ल की काव्य दृष्टि
- मैथिलीशरण गुप्त का काव्य : पुनर्मूल्यांकन
- देव और उनकी कविता
- प्रसाद और कामायनी : मूल्यांकन का प्रश्न
डॉ. नगेन्द्र द्वारा संपादित प्रमुख कृतियाँ
डॉ. नगेन्द्र द्वारा संपादित प्रमुख कृतियाँ निम्नलिखित हैं :
- हिन्दी ध्वन्यालोक
- कविभारती
- हिन्दी काव्यालंकारसूत्र
- रीति श्रृंगार
- हिन्दी वक्रोक्तिजीवित
- भारतीय नाट्य साहित्य
- भारतीय काव्यशास्त्र की परम्परा
- हिन्दी साहित्य का वृहद् इतिहास, भाग-6
- इंडियन लिटरेचर’ (अंग्रेजी)
- हिन्दी अभिनव भारती
- हिन्दी काव्यप्रकाश
- मानविकी शब्दकोश
- हरिभक्तिरसामृतसिन्धु
- पाश्चात्य काव्शास्त्र सिद्धान्त और वाद
- हिन्दी साहित्य का इतिहास
- भारतीय साहित्य कोश
डॉ. नगेन्द्र की आलोचना दृष्टि के प्रमुख बिन्दु
डॉ. नगेन्द्र की आलोचना दृष्टि को हम निम्नलिखित बिंदुओं के आधार पर भली-भाँति समझ सकते हैं :
1. ‘रस’ के प्रति एकान्त निष्ठा का कारण डॉ. नगेन्द्र के रोमानी (रोमांटिक) काव्य-संस्कार ही हैं। उनकी व्यावहारिक आलोचनाएँ भी इस तथ्य की पुष्टि करती हैं। उन्होंने ‘पंत’, ‘प्रसाद’, ‘महादेवी’, ‘मैथिलीशरण गुप्त’, ‘सियारामशरण गुप्त’, ‘दिनकर’ और ‘गिरिजाकुमार माथुर’ की काव्य-समीक्षा में विशेष रुचि दिखाई है। ये सभी कवि किसी न किसी रूप में रूमानी भाव-बोध के कवि माने गये हैं।
2. डॉ. नगेन्द्र ने गिरिजाकुमार माथुर की कविता को इसलिये महत्व दिया है कि उसमें ‘रूप’ और ‘आभा’ का सामञ्जस्य है। उनकी कुछ कविताएँ रसमयी और श्रृंगारी हैं। उनका शब्द-विधान, उनकी बिम्ब-योजना तथा उनका स्वर-लय-विन्यास मोहक और विशिष्ट है। उनका सौन्दर्य-बोध विकसित और प्रगीततत्व समृद्ध है। इन्हीं गुणों के कारण डॉ. नगेन्द्र ने उन्हें ‘नयीकविता’ के निर्माताओं में अन्यतम स्वीकार किया है।
3. जिन विशेषताओं के कारण डॉ. नगेन्द्र ने गिरिजाकुमार माथुर के काव्य को अन्यतम बताया है उनमें रूमानी भावबोध की अनुगूँज है।
4. रूमानी काव्य-संस्कार और जीवन के प्रति शाश्वतवादी (भाववादी) दृष्टि के कारण डॉ. नगेन्द्र का सारा काव्य-चिन्तन इतिहास-निरपेक्ष हो गया है। तत्त्व-दृष्टि से वे नये और पुराने आदमी में भेद नहीं करते। वे यह मानते हैं कि ‘मानव-स्वभाव’ के व्यक्त रूपों में देशकाल के अनुसार परिवर्तन होता रहता है किन्तु उसके मूलतत्त्व (मानवत्व) स्थिर रहते हैं। इसी प्रकार “कविता के व्यक्त रूपों में परिवर्तन होता रहता है। नये-पुराने का भेद भी होता रहता है। किन्तु उसके मूलतत्त्व (कवित्व) का स्वरूप स्थिर रहता है।” (आस्था के चरण)
5. इसीलिये कविता या रस का साहित्य तत्त्व-दृष्टि से परिवर्तनशील नहीं है। अतः युग-सापेक्ष्य सभी काव्य-प्रवृत्तियों और वादों में ‘रस’ की स्थिति मान्य है।’
6. ‘प्रगतिवाद’, ‘प्रयोगवाद’, ‘बिम्बवाद’, ‘नयीकविता’, ‘नयीसमीक्षा’, ‘मिथकीय समीक्षा’, ‘शैली-विज्ञान’, ‘समाजशास्त्रीय-समीक्षा‘ आदि सभी पर उनकी रचनाएँ विद्यमान है। किन्तु वे इनमें से किसी के भी पुरोधा या प्रवर्तक नहीं है। चर्चा से आकृष्ट होकर वे इनके अध्ययन में प्रवृत्त हुए हैं और अपनी दृष्टि से इनकी विस्तृत समीक्षा की है।
7. प्रगतिवाद के सम्बन्ध में उन्होंने अनेक संदर्भों में विचार किया है। 1940 ई. से लेकर 1982 ई. तक (सुमित्रानन्दन पंत के दूसरे संस्करण से लेकर ‘साहित्य का समाजशास्त्र’ की रचना तक) इस सम्बन्ध में वे अपने विचारों का शोधन परिमार्जन करते आ रहे हैं।
8. प्रयोगवाद पर 1950 ई. के आस-पास, बिम्बवाद पर 1966 ई. में, नयी समीक्षा पर 1970 ई. के आस-पास, मिथकीय समीक्षा पर 1978 ई. में, शैलीविज्ञान पर 1976 ई. में, और समाजशास्त्रीय समीक्षा (साहित्य का समाजशास्त्र) पर 1982 ई. में निबन्ध और पुस्तकें लिखकर उन्होंने अपने विचार व्यक्त किये हैं।
9. प्रयोगवादी कविता के बारे में डॉ. नगेन्द्र की राय है कि, “ये कविताएँ अनिवार्य रूप से ही नहीं, सिद्धांत रूप से भी दुरूह हैं।”
10. डॉ. नगेन्द्र की रूचि काव्य-सिद्धान्तों के विवेचन में अधिक है, व्यावहारिक मूल्यांकन या विश्लेषण में कम।
11. डॉ. नगेन्द्र ने ‘बिम्ब’ पर विचार करते हुए तो ‘निराला’, ‘प्रसाद’, ‘पंत’, ‘गिरिजाकुमार माथुर’, ‘अज्ञेय’, ‘कुंवरनारायण’, ‘भारती’, ‘अजितकुमार’ आदि ‘छायावाद’ और ‘नयीकविता’ के कवियों से उदाहरण दिये हैं किन्तु ‘नयीसमीक्षा’, ‘शैली-विज्ञान’ और ‘समाजशास्त्रीयसमीक्षा’ का विवेचन तो मुख्यतः सिद्धान्त के स्तर पर ही किया है।
12. ‘मिथकीय आलोचना’ का विवेचन करते हुए भी उन्होंने मात्र ‘दिनकर’ की ‘उर्वशी’ पर विचार किया है।
13. ‘प्रयोगवाद’ का स्वागत डॉ. नगेन्द्र ने नहीं किया। उन्होंने इसे ‘छायावाद’ के विरुद्ध ‘प्रतिक्रिया’ के रूप में देखा। काव्य के उपादानों (कारण या साधन-सामग्री) के प्रति सतत् अन्वेषण की प्रवृत्ति, बौद्धिक धारणाओं की अतिशयता, भाषा में परम्परागत अर्थ-व्यंजना की क्षमता से अधिक भार लादकर अवचेतन मन की व्यक्तिगत कुण्ठाओं के यथावत् चित्रण का आग्रह तथा विशेष को सामान्य बनाकर प्रेषित करने के बजाय विशेष रूप में ही प्रेषित करने के दुराग्रह को इन कवियों की सामान्य प्रवृत्ति मानकर डॉ. नगेन्द्र ने घोषित कर दिया कि प्रयोगवादी कविता में चित्त को द्रवित करने की शक्ति नहीं है। अर्थात् उसमें रस का अभाव है।
14. डॉ. नगेन्द्र का यह मानना है कि ‘प्रयोगवाद’ काव्य-प्रवृत्ति के रूप में उस प्रकार विकसित होकर नहीं आया जिस प्रकार ‘छायावाद’।
15. बिम्ब पर विचार करते हुए डॉ. नगेन्द्र ने उसके स्वरूप, प्रकार, रचना-प्रक्रिया और मूल्यवत्ता का विश्लेषण करके उसका पूरा शास्त्र प्रस्तुत कर दिया। इसके बहुत पहले (यदि आचार्य शुक्ल की ‘बिम्ब-ग्रहण’ की चर्चा को छोड़ दें) प्रभाकर माचवे ने ‘तारसप्तक’ के अपने वक्तव्य में ‘बिम्बवाद’ की चर्चा की थी। उस समय उन्होंने इसे इम्प्रसेनिज्म (Impressionism) के हिन्दी-पर्याय रूप में प्रस्तुत किया था।
16. परंतु यह उल्लेखनीय है कि डॉ. नगेन्द्र के ‘बिम्ब-चिन्तन’ के पहले बिम्ब-ग्रहण, बिम्बवाद, बिम्ब-विधान की चर्चा हो चुकी थी।
17. डॉ. नगेन्द्र के अनुसार “काव्य-बिम्ब’ शब्दार्थ के माध्यम से कल्पना द्वारा निर्मित, एक ऐसी मानस-छवि है जिसके मूल में भाव की प्रेरणा रहती है।” (आस्था के चरण)
18. डॉ. नगेन्द्र ने ऐन्द्रिय-बोध, सर्जक कल्पना, प्रेरक अनुभूति, काव्यार्थ-दृष्टि, काव्य-दृष्टि, मनोवैश्लेषिक दृष्टि और बौद्धिक धारणागत-दृष्टि से बिम्बों का वर्गीकरण किया और निश्चय ही बिम्ब-चिन्तन की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया किन्तु युग-संदर्भ या ऐतिहासिक-सामाजिक चेतना के विकास के साथ बिम्ब के स्वरूप और रचना-प्रक्रिया से जो अन्तर पड़ता है उस पर विचार नहीं किया।
19. डॉ. नगेन्द्र के अनुसार ‘आधुनिकता का भावबोध’ और उसकी यथार्थ अभिव्यक्ति का आग्रह नयीकविता के केन्द्रीय तत्त्व है। व्यक्तिपरकता, बौद्धिकता, सूक्ष्मव्यंग्य, शैलीगत नवीनता, अभिनव प्रतीकविधान, आदि इसकी अन्य विशेषताएँ हैं।
20. डॉ. नगेन्द्र के अनुसार नयीकविता ने सार्त्र के अनास्थावादी जीवन-दर्शन अस्तित्त्ववाद से अपनी धारणाओं के समर्थन का दार्शनिक आधार प्राप्त किया है और इसका स्वरूप विकसनशील (विकसित होना) है। ये सारी मान्यताएँ अज्ञेय, गिरिजाकुमार माथुर और जगदीश गुप्त के वक्तव्यों पर आधृत हैं।
21. ‘नयीकविता’ के सम्बन्ध में डॉ. नगेन्द्र की अपनी मान्यता यही है कि “सब कुछ होने पर भी ‘नयीकविता’ मानवीय अनुभूति और रागतत्त्व से मुक्त नहीं हो सकती। (रस सिद्धान्त)
22. नयीसमीक्षा के सम्बन्ध में डॉ. नगेन्द्र ने 1970 ई. में अपना व्यवस्थित विचार ‘नयीसमीक्षा : नयेसंदर्भ’ लिखकर प्रस्तुत किया। इसके स्वरूप की मीमांसा तो आपने जान क्रो रेन्सम, एलन टेट, रिचर्ड, पी. व्लैकमर, राबर्टपेन वारेन, क्लीन्थ ब्रुक्स तथा ‘विलियम एम्पसन’ के विचारों के आधार पर प्रस्तुत की किन्तु इसके पूर्व-संकेत तथा भारतीय काव्य-चिन्तन में इसके आधार-सूत्रों एवं प्रविधि का अनुसंधान उन्होंने अपनी दृष्टि से किया।
23. ‘नयीसमीक्षा’ को आपने ‘रूपात्मक समीक्षा’ माना और उसके स्वरूप को स्पष्ट करते हुए कहा-“कलाकृति का ‘रूप’ ही समीक्षा का वास्तविक विषय है और इस रूप की अपनी स्वतंत्र सत्ता है-वह किसी अन्य अर्थ का वाहक मात्र नहीं है। अथवा यह कहना चाहिए कि कलात्मक संरचना का समग्र अर्थ ‘रूप’ में ही निहित है।” (नयीसमीक्षा : नये संदर्भ)
24. डॉ. नगेन्द्र के अनुसार काव्य की स्वायत्तता, शिल्पविधान, तथा उचित सौन्दर्य के व्याख्यान-विश्लेषण की सूक्ष्मतर प्रविधि की प्रतिष्ठा नयी-समीक्षा की शक्ति है और काव्यानुभूति की परिधि का संकोच, विडम्बना, श्लेष, विरोधाभास आदि चमत्कार-मूलक प्रयोगों की अतिशयता और ‘रूप’ को एकान्त महत्व देने की अतिवादी प्रवृत्ति इसकी सीमाएँ हैं।
25. शैली-विज्ञान (Stylistics) को डॉ. नगेन्द्र ने “भाषा-विज्ञान के नियमों और प्रविधि के अनुसार साहित्य के भाषिक-विधान के रूपात्मक अध्ययन” के रूप में परिभाषित किया है। (शैली विज्ञान)
Dr. Nagendra has defined Stylistics as “the formal study of the linguistic structure of literature, in accordance with the principles and methodology of linguistics.” (Stylistics)
26. डॉ. नगेन्द्र ने स्पष्ट किया कि शैली-विज्ञान के बीज पश्चिम में अरस्तू से लेकर उन्नीसवीं शती के आलोचकों और भारतवर्ष में भामह, दण्डी, रुद्रट, वामन, आनन्दवर्धन, कुन्तक तथा मम्मट आदि आचार्यों के ग्रन्थों में निश्चित रूप से मिलते हैं।
27. “वामन और कुन्तक ने तो एक परिपूर्ण भाषिक काव्यशास्त्र का निर्माण ही किया है।” (शैली विज्ञान) उनकी दृष्टि में ‘शैली-विज्ञान की शक्ति और सीमा भी प्रायः वही है जो ‘नईसमीक्षा’ की’ (शैली-विज्ञान)
28. शैली-विज्ञान के विश्लेषण-क्रम में विपथन (Deviation), उपचार (Mataphor), चयन (Linguistic Selection), शब्द-विन्यास (Words Structure) आदि शब्दों के प्रयोग से हिन्दी आलोचना की पारिभाषिक शब्दावली समृद्ध हुई।
29. निष्कर्ष रूप में डॉ.नगेन्द्र ने प्रतिपादित किया कि संस्कृत काव्यशास्त्र में ‘शैली–विज्ञान‘ के प्रायः सभी तत्त्व उपलब्ध हैं। संस्कृत के टीकाकारों ने भाषिक तत्त्वों का जो विश्लेषण किया है उसमें “आधुनिक शैली-विज्ञान’ की एक निश्चित पूर्व-परम्परा मिलती है।” (शैली विज्ञान)
भाषिक तत्त्वों (Linguistic elements)
30. मिथक को परिभाषित करते हुए डॉ. नगेन्द्र ने कहा- “सामान्य रूप में मिथक का अर्थ है ऐसी परम्परागत कथा जिसका सम्बन्ध अति-प्राकृत घटनाओं और भावों से होता है। मिथक मूलतः आदिम मानव के समष्टिमन की सृष्टि है जिसमें चेतन की अपेक्षा अचेतन-प्रक्रिया का प्राधान्य रहता है।” (मिथक और साहित्य)
{Myth is fundamentally a creation of the collective psyche of primitive man, wherein unconscious processes predominate over conscious ones.}
31. मिथक-रचना मानव-चेतना की एक सहजात वृत्ति है। आदिम मनोवेगों के दबाव से कल्पना अनायास ही मिथक-रचना में प्रवृत्त हो जाती है और चूंकि ‘साहित्य-सर्जना की भी प्रक्रिया यही है, अतः दोनों का सहज सम्बन्ध स्वयंसिद्ध है।’ (मिथक और साहित्य
32. मिथकीय समीक्षा की विशेषता स्पष्ट करते हुए आपने कहा- “मिथकीय समीक्षा एक ओर ‘नयीसमीक्षा’ के ‘अव्याप्ति’ और दूसरी ओर शास्त्रीयसमीक्षा के ‘अतिव्याप्ति’ दोष से मुक्त होने का दावा करती है।” (स्वच्छन्दतावादी आलोचना: संदर्भ एवं दृष्टि)
33. मिथकीय समीक्षा की सीमा का उल्लेख करते हुए आपने कहा- “जाहिर है कि साहित्य के मिथकीय आधार या विवेच्य कृति में मिथक विशेष के प्रयोग और विकास की व्याख्या मात्र से, उसके कलात्मक मूल्य का आकलन नहीं किया जा सकता।” (स्वच्छन्दतावादी आलोचना: संदर्भ एवं दृष्टि)
34. व्यावहारिक स्तर पर आपने ‘दिनकर’ की प्रसिद्ध कृति ‘उर्वशी’ की मिथकीय समीक्षा प्रस्तुत की और निष्कर्ष रूप में कहा- “दिनकर ने आधुनिक युग में योगी अरविन्द के नव्य वेदान्त की प्रेरणा से पुरुष-प्रकृति के औपनिषदिक मिथक को ग्रहण किया है और द्यावा-पृथिवी के वैदिक मिथक के साथ उसका विनियोग (प्रयोग) कर ‘उर्वशी’ के मिथकीय रचना-विधान को पूर्ण किया है।”
{द्यावा-पृथिवी = वैदिक साहित्य में स्वर्ग (द्यौ) और पृथ्वी का एक संयुक्त द्वंद्व समास है, जो आकाश और धरती के मिलन को दर्शाता है।}
35. मिथकीय समीक्षा के विवेचन-क्रम में डॉ. नगेन्द्र ने विशेष उल्लेखनीय पारिभाषिक शब्दों का प्रयोग नहीं किया। सामूहिक अवचेतन, पुराख्यान, लोक-गाथा, स्वप्न-कथा, चित्र-भाषा, मिथकीय शैली, वस्तुसंरचना, कथानक रूढ़ि, आदि पूर्व प्रचलित शब्दों के प्रयोग से ही काम चलाया।
36. प्रगतिवाद के सम्बन्ध में डॉ. नगेन्द्र ने अनेक सन्दर्भों में विचार किया है। 1940 ई. से लेकर 1982 ई. तक पंत की समीक्षा से आरम्भ करके ‘साहित्य का समाजशास्त्र’ के लेखन तक उन्होंने अनेक बार इसकी पड़ताल की है।
37. सन् 1951 ई. में आधुनिक हिन्दी कविता की मुख्य प्रवृत्तियों के विवेचन-क्रम में आपने ‘प्रगतिवाद’ की सीमाओं का उल्लेख करते हुए इसके जीवन-दर्शन को संकुचित, इतिहास की व्याख्या को अधूरी और रचना-दृष्टि को ‘एक विशेष राजनीतिक विचारधारा’ का उच्चार बताया था।
38. बौद्धिक स्तर पर प्रगतिशील चिन्तन और मार्क्सवादी विचारधारा के महत्व को डॉ. नगेन्द्र ने एक सीमा तक स्वीकार कर लिया है किन्तु संस्कारतः वे इसे स्वीकार नहीं कर सके हैं।
39. वर्ग-संघर्ष से मुक्त होकर प्रगतिशील साहित्य के सम्बन्ध में नहीं सोचा जा सकता। डॉ. नगेन्द्र के अनुसार “वर्गों में बाँटकर जीवन को देखना तो रुग्ण-दृष्टि का परिचायक है।” (आस्था के चरण)
40. डॉ. नगेन्द्र प्रगतिशील चेतना को एक प्रकार की नैतिक चेतना मानते हैं जिसे वर्गों में विभक्त करके देखना उचित नहीं है।
41. गिरिजाकुमार माथुर का हवाला देते हुए डॉ. नगेन्द्र कहते हैं कि गिरिजाकुमार माथुर की प्रगतिचेतना मध्यवर्ग की ही प्रगति-चेतना है। इसलिये उग्र प्रगतिवादी आलोचक उसका उचित मूल्यांकन करने में कदाचित् असमर्थ रहे हैं।
42. डॉ. नगेन्द्र के अनुसार “यदि वर्ग-संघर्ष की भावना से मुक्त होकर विचार करें तो प्रगति-चेतना वस्तुतः एक प्रकार की नैतिक चेतना है जो वर्गों में विभाजित नहीं हो सकती।” (आस्था के चरण)
43. ‘साहित्य का समाजशास्त्र’ लिखते हुए आपने ‘क्रिस्टोफर काडवेल’, ‘रेल्फ फाक्स’, ‘लुकाच’ और ‘गोल्डमान’ के विचारों को अत्यन्त संक्षेप में प्रस्तुत किया है।
44. इस क्रम में आपने सामाजिक यथार्थ, समाजवादीयथार्थ, संस्थाबद्ध सौन्दर्य-शास्त्र, सम्पूर्णयथार्थ, खण्डितयथार्थ, सार्वभौमपरिप्रेक्ष्य, विश्वबोध, सापेक्षिकस्वायत्तता जैसे पारिभाषिक शब्दों का प्रयोग किया किन्तु व्यावहारिक समीक्षा में डॉ. नगेन्द्र ने कभी भी मार्क्सवादी सौन्दर्य-शास्त्र का प्रयोग नहीं किया। इसलिये इन शब्दों को हिन्दी-साहित्य के संदर्भ से वे नहीं जोड़ सके।
45. डॉ. नगेन्द्र ने नये संदर्भ के अन्तर्गत आधुनिकता पर भी विचार किया है। उनके मतानुसार- “आधुनिक का अर्थ व्यापक और गत्यात्मक ही मानना चाहिए। युग-बोध, परम्परा का संशोधन, जीवन के वैविध्य की स्पृहा (इच्छा या कामना), अपने पर्यावरण के माध्यम से आत्मसिद्धि, विकास की आकांक्षा, आदि ही उसके सही लक्षण हैं।”
(नयीसमीक्षा : नये संदर्भ)
46. डॉ. नगेन्द्र के अनुसार ‘अस्तित्त्ववाद’ (निराशावादी वैज्ञानिक मानववाद) को ही आधुनिकता के सूत्रबद्ध लक्षण के रूप में स्वीकार कर लेना उचित नहीं है। सार्वभौम विनाश की आशंका से उत्पन्न ‘निराशा’, ‘कुण्ठा’, ‘विघटन’ को ही आधुनिकता का लक्षण मानना खण्ड-यथार्थ को स्वीकार करना होगा।
{वैज्ञानिक मानववाद एक ऐसी धर्मनिरपेक्ष और तर्कसंगत विचारधारा है जो अलौकिक शक्तियों के बजाय मानव विवेक, तर्क और वैज्ञानिक प्रमाणों पर आधारित है। यह मनुष्य के विकास और समस्याओं के समाधान के लिए विज्ञान का रचनात्मक उपयोग करने, अंधविश्वास को त्यागने और मानवीय मूल्यों के आधार पर एक बेहतर दुनिया बनाने पर जोर देता है।}
47. डॉ. नगेन्द्र के संस्कार रूमानी (रोमांटिक) और छायावादी हैं। उनकी मान्यता है- “राजनीति में जिन प्रवृत्तियों ने गांधीवाद को जन्म दिया, करीब-करीब वैसी ही प्रवृत्तियों द्वारा साहित्य में ‘छायावाद’ का प्रादुर्भाव हुआ। दोनों की मूल-वर्तिनी-भावना एक है। स्थूल के विरुद्ध सूक्ष्म की प्रतिक्रिया अर्थात् स्थूल से हटकर सूक्ष्म की ओर बढ़ने और उसको प्राप्त करने का प्रयत्न।
48. डॉ. नगेन्द्र के अनुसार गांधी जी के साथ आत्मा की वस्तु बनकर यह प्रवृत्ति आध्यात्मिक बन गई, उधर रवीन्द्र के साथ हृदय में रंगकर उसने ‘छायावाद’ का रूप धारण किया।” (सुमित्रानन्दन पंत)
49. सन् 1950 में डॉ. नगेन्द्र का शोध-प्रबन्ध ‘रीतिकाव्य की भूमिका तथा देव और उनकी कविता’ दो खण्डों में प्रकाशित हुआ था। इसे प्रस्तुत करते हुए डॉ. नगेन्द्र ने पाश्चात्य मनोविज्ञान और भारतीय काव्यशास्त्र का अध्ययन किया था। इसी समय से वे भारतीय काव्यशास्त्र के अध्ययन में प्रवृत्त हुए और उन्होंने ‘रस’, ‘ध्वनि’, ‘अलंकार’, ‘रीति’, ‘वक्रोक्ति’ आदि सिद्धान्तों का विधिवत् अध्ययन किया।
50. डॉ. नगेन्द्र ने पूरे भारतीय काव्य-चिन्तन को पाश्चात्य सौन्दर्य-शास्त्र के आलोक में देखा है। उनके अनुसार “सौन्दर्य-चेतना एक मिश्र वृत्ति है। इसके योजक तत्त्व हैं-प्रीति अर्थात् आनन्द और विस्मय।
51. डॉ. नगेन्द्र के अनुसार भारतीय काव्य-चिन्तन के दो प्रतिनिधि सिद्धान्त रस और अलंकार क्रमशः प्रीति और विस्मय के ही शास्त्रीय विकास हैं। सौन्दर्य के आस्वाद में निहित ‘प्रीति-तत्त्व’ का प्राधान्य ‘रस-सिद्धान्त’ में प्रस्फुटित और विकसित हुआ और उधर ‘विस्मयतत्त्व’ की प्रमुखता ने ‘वक्रता’ ‘अतिशय’ आदि के माध्यम से ‘अलंकारवाद’ का रूप धारण किया।” (रस-सिद्धान्त)
52. डॉ. नगेन्द्र ने ‘छायावाद’ के मूल में भी ‘सौन्दर्य’ (रस) और ‘विस्मय’ के तत्त्व लक्षित किये हैं और इसी दृष्टि से उसका सम्बन्ध अंग्रेजी की रोमाण्टिक (स्वच्छन्दतावादी) कविता से जोड़ा है।
53. डॉ. नगेन्द्र की व्यावहारिक समीक्षा ‘सुमित्रानन्दन पंत’ (1938 ई.), ‘साकेत एक अध्ययन’ (1939 ई.), ‘कामायनी के अध्ययन की समस्याएँ’ (1962 ई.) इन तीन कृतियों के रूप में हमारे सामने है।
54. ‘सुमित्रानन्दन पंत’ और ‘साकेत एक अध्ययन’ इन दोनों में डॉ. नगेन्द्र ने मुख्यतः आचार्य रामचन्द्र शुक्ल की समीक्षा-पद्धति का अनुसरण किया है। इनमें प्रयुक्त शब्दावली भी प्रायः वही है जिसका प्रयोग शुक्ल जी कर चुके थे।
55. ‘पंत की कला’ के विवेचन में डॉ. नगेन्द्र ने दृश्य-विधान (Setting), चित्रमय विशेषण, एक शब्द-चित्र (One word picture), व्यंजनापूर्ण (Suggestive) शब्द-प्रयोग, वर्ण-परिज्ञान (Sense of colour) आदि पर विचार करके ‘छायावाद’ की कलात्मक मूल्यांकन-पद्धति को थोड़ा आगे बढ़ाया।
56. पंत जी के मूल्यांकन में डॉ. नगेन्द्र ने प्राचीन भारतीय शब्दावली का भी प्रयोग किया। ‘ग्रन्थि’ को उन्होंने विप्रलंभ श्रृंगार की रचना माना और उसमें स्पृहा, संकोच, श्रृंगारिकहास्य, असूया आदि भावों के अंकन की ओर ध्यान आकृष्ट किया। ‘परिवर्तन’ में उन्हें कहीं ‘श्रृंगार का अरुण राग’ दिखाई पड़ा, कहीं ‘वीभत्स का नीला रंग’।
57. डॉ. नगेन्द्र ने पंत द्वारा प्रयुक्त भारतीय अलंकारों- उपमा, रूपक, मालोपमा, उल्लेख, स्मरण, सन्देह, समासोक्ति, अन्योक्ति, सहोक्ति, यथासंख्य को भी निर्दिष्ट किया और लक्षित किया कि पंत जी की अलंकार-योजना में पश्चिमी पालिश अधिक है। अलंकार प्रायः चित्रमय हो गये हैं। इनके प्रयोग से भाव्य-व्यंजना में तीव्रता आई है।
58. डॉ. नगेन्द्र ने यह भी बताया कि पश्चिम के अलंकार मुख्यतः लक्षणा-मूलक हैं जिनका अच्छा उपयोग पंत जी ने किया है।
59. ‘ग्राम्या’ का मूल्यांकन करते हुए डॉ. नगेन्द्र ने बौद्धिक रस की चर्चा की। उन्होंने बताया कि ‘ग्राम्या’ की कविताओं में हृदय और बुद्धि का द्वन्द्व है, इसलिये कविताएँ आलोचनात्मक हो गई हैं। इन कविताओं से “एक प्रकार का बौद्धिक रस मिलता है जो अपने शास्त्रीय रस से भिन्न है।” (सुमित्रानन्दन पंत)
{बौद्धिक रस साहित्य या कला के प्रति उस मानसिक और तर्कसंगत आनंद को कहते हैं, जो भावनाओं के बजाय विचार, तर्क, सूक्ष्मता और वैचारिक गहराई से उत्पन्न होता है। यह पारंपरिक रस सिद्धांत (श्रृंगार, करुण आदि) से भिन्न है, क्योंकि इसमें हृदय की अनुभूति से अधिक बुद्धि (Intellect) का संतोष प्रमुख होता है।
60. डॉ. नगेन्द्र का मानना है कि ऐसी कविताओं में कवि वस्तु में तन्मय नहीं होता वह अपना व्यक्तित्व पृथक् रखता है और पाठक उसे पढ़कर मन में कह उठता है- “हाँ ठीक है- यही मैं भी सोचता था इसी को आचार्यों ने अभिज्ञान का आनन्द (Pleasure of Recognition) कहा है।”
{काव्य वस्तु का अर्थ है किसी काव्य रचना का मूल विषय, कथानक (Plot), भाव या वर्ण्य-विषय, जिसके इर्द-गिर्द पूरी कविता या महाकाव्य की अभिव्यक्ति घूमती है। यह वह आधारभूत विचार या कथा है जिसे कवि पाठकों तक पहुँचाना चाहता है, जिसमें प्रेम, प्रकृति, वीरता, या कोई दार्शनिक भाव शामिल हो सकते हैं।}
61. मैथिलीशरण गुप्त द्वारा रचित ‘साकेत’ के अध्ययन में भी डॉ. नगेन्द्र ने आचार्य शुक्ल की समीक्षा-पद्धति का ही अनुकरण किया। उन्होंने ‘साकेत’ की ‘कथावस्तु’ पर विचार करने के बाद ‘साकेत के गार्हस्थ्यचित्र’, ‘साकेत में विरह’ और ‘साकेत के भाव-पूर्ण स्थल’ इन तीन अध्यायों में गुप्त जी की भावुकता का विवेचन किया। इन तीनों ही अध्यायों में रसशास्त्र की शब्दावली का प्रचुर प्रयोग मिलता है।
62. डॉ. नगेन्द्र ने बताया है कि ‘साकेत’ का प्रधान रस श्रृंगार है। ‘श्रृंगार’ में भी संयोगपक्ष गौण ‘वियोगपक्ष’ प्रधान है। वियोग-वर्णन में काम की सभी दशाएँ- अभिलाषा, चिन्ता, स्मृति, गुणकथन, उद्वेग, प्रलाप, उन्माद, व्याधि, जड़ता आदि-मिल जाती हैं। श्रृंगार के अतिरिक्त ‘साकेत’ में वात्सल्य, करुण, वीर, रौद्र, आदि की भी व्यञ्जना हुई है। इनसे सम्बन्धित सभी संचारीभाव भी यथा स्थान व्यञ्जित हुए हैं।
63. डॉ. नगेन्द्र के इस विवेचन में मनोभावों का सम्बन्ध जीवन के क्रिया-व्यापारों, पात्रों की मनोदशा एवं चरित्र-गठन तथा ‘कथा-संगठन’ के साथ दिखाकर रस-निरूपण की रीतिवादी पद्धति से अपने को अलग रखा है। यही नहीं उन्होंने उर्मिला के वियोग में युग के मनोविज्ञान का निदर्शन कर नवीनता का परिचय भी दिया है।
64. ‘साकेत’ के सांस्कृतिक आधार का विवेचन करते हुए डॉ. नगेन्द्र ने ‘धार्मिक’, ‘सामाजिक-राजनीतिक आदर्श’, ‘भौतिकजीवन’, ‘गांधीवाद का प्रभाव‘ आदि की चर्चा की है और निष्कर्ष रूप में कहा है– “अपनी संस्कृति का प्रभाव तो सभी कवियों पर थोड़ा-बहुत पड़ता है। परन्तु जिन मनस्वियों की कविता लोक-मंगल से प्रेरित होकर अपने देश और जाति की संस्कृति की प्रतिष्ठा एवं संरक्षा करती है वे अनेक नहीं होते। हमारे तुलसी, प्रसाद और मैथिलीशरण गुप्त ऐसे ही कवि हैं।” (साकेत एक अध्ययन)
65. ‘चरित्र-चित्रण’ का विवेचन करते हुए डॉ. नगेन्द्र ने बताया है कि मैथिलीशरण गुप्त जी ने वैज्ञानिक युग के कवि के रूप में अमानवीय चरित्रों की अवतारणा नहीं की है। उनका चित्रण स्वाभाविक है और वे मानव-चरित्र की जटिलताओं को पहचानते हैं।
66. मैथिलीशरण गुप्त जी के अभिव्यंजना-कौशल पर विचार करते हुए डॉ. नगेन्द्र ने संस्कृत ‘अलंकारशास्त्र’ और क्रोचे के ‘अभिव्यंजनावाद’ दोनों के बीच का मार्ग अपनाया।
67. ‘कामायनी के अध्ययन की समस्याएँ’ का प्रकाशन 1962 में हुआ। इसका आरम्भ इस वाक्य से हुआ है “काव्य का मूल प्रयोजन है- रसास्वादन, कम से कम कामायनी तक तो यह स्थापना सर्वथा मान्य है ही, आगे की बात आगे देखेंगे।”
68. लेकिन इस ‘रसास्वादन’ के लिये डॉ. नगेन्द्र ने प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक समीक्षक आई. ए. रिचर्ड्स का सहारा लिया है। रिचर्ड्स ने काव्य के आस्वादन की प्रक्रिया के छः अवस्थान (ठहरना, रहना, अवधिकाल, केंद्रबिन्दु) बताए हैं। डॉ. नगेन्द्र ने इनके अंग्रेजी नामों का उल्लेख न करके इन्हें निम्नलिखित क्रम से प्रस्तुत किया है-
- चाक्षुष-संवेदन,
- सम्बद्ध बिम्ब-विधान,
- स्वतंत्र बिम्ब-विधान,
- विचार,
- भावोद्बोधन,
- दृष्टिकोण का निर्माण।
69. रसास्वादन के उपर्युक्त अवस्थानों को केन्द्र में रखकर डॉ. नगेन्द्र ने कामायनी के महाकाव्यत्व, अंगीरस, रूपकतत्त्व, और दार्शनिक पृष्ठभूमि पर विचार किया है।
{काव्य में अंगीरस का अर्थ महाकाव्य या लंबी कविता का मुख्य, प्रधान या मूल रस होता है। जहाँ अनेक रसों का मिश्रण हो, वहाँ जो रस शुरू से अंत तक छाया रहता है और संपूर्ण कथा को नियंत्रित करता है, उसे ही अंगीरस कहते हैं। अन्य रस ‘अंग’ (सहायक) और यह ‘अंगी’ (प्रधान) होता है।}
{काव्य में रूपकतत्त्व (Metaphor/Allegory) का अर्थ है, जब किसी वस्तु, पात्र या घटना का वर्णन सीधे न करके किसी अन्य वस्तु के रूप में किया जाता है, ताकि गहरा नैतिक, आध्यात्मिक या प्रतीकात्मक अर्थ प्रकट हो सके। यह अलंकारिक भाषा है जो ‘जैसे’ या ‘समान’ शब्दों के बिना समानता दिखाकर कल्पना को सजीव बनाती है और अर्थ में गहराई लाती है।}
70. महाकाव्यत्व का मूल्यांकन डॉ. नगेन्द्र ने औदात्य (Sublimity) के आधार पर किया है। उन्होंने निर्णय दिया है कि इसका कथानक ‘उदात्त’ (Sublime) है किन्तु उसका क्षेत्र ब्रह्माण्ड नहीं पिण्ड है- मानव-आत्मा या मानव-चेतना है। इसका कार्य, ‘भाववृत्ति’, ‘कर्मवृत्ति’, तथा ‘ज्ञानवृत्ति’ के सामंजस्य द्वारा समरसता की सिद्धि और उसके फलस्वरूप आनन्द की उपलब्धि है। यह ‘कार्य’ सर्वथा उदात्त है।
{पिंड का मुख्य अर्थ शरीर, देह, गोलाकार वस्तु या ढेर है। इसके पर्यायवाची शब्दों में शरीर, देह, लोंदा, गोला, द्रव्यखंड और राशि शामिल हैं।}
71. डॉ. नगेन्द्र के अनुसार ‘कामायनी’ का नायक मनु धीरोदात्त नहीं है किन्तु नायिका श्रद्धा का चरित्र अत्यन्त उज्ज्वल है। इसका मूलवर्ती भाव अथवा महाभाव या अंगीरस अखण्ड आत्मरस या आनन्दरस है। इसकी शैली उदात्त है।
{काव्यशास्त्र (साहित्य) में ‘धीरोदात्त’ उस आदर्श नायक को कहते हैं जो अत्यंत गम्भीर, क्षमावान, दृढ़-प्रतिज्ञ, विनयी, अहंकारी न होने वाला (निरहंकारी) और शूरवीर होता है। यह नाटक या महाकाव्य का वह मुख्य पात्र है जो अपनी भावनाओं पर नियंत्रण रखता है और उदात्त गुणों (उच्च चरित्र) से युक्त होता है, जैसे- राम या युधिष्ठिर। }
72. डॉ. नगेन्द्र के अनुसार ‘कामायनी’ में अलंकार-विधान, लक्षणा-व्यंजना के विचित्र चमत्कार, मूर्तविधान एवं बिम्ब-योजना की समृद्धि और चित्र-भाषा एवं प्रतीक-भाषा की प्रयोग-बहुलता के कारण शैली में असाधारणत्व गुण का समावेश हो गया है।
73. डॉ. नगेन्द्र के अनुसार ‘कामायनी’ में अन्तर्मुखता के कारण ‘प्रगीत-तत्त्व’ का प्राधान्य है किन्तु जहाँ भौतिक घटनाओं का वर्णन है वहाँ वह ‘विस्तारगर्भा’ और ‘नाना-वर्णनक्षमा’ भी हो गई है। इसका वस्तु-विकास अन्तर्मुख है।
74. साधारणीकरण के लिये कवि (प्रसाद जी) ने रूपक की भावमय पद्धति ग्रहण की है। इसमें अनेक रसों की स्थिति देखी जा सकती है। श्रद्धा-मनु के प्रणय-प्रसंग में श्रृंगार, स्वप्न सर्ग में श्रद्धा का विरह और वात्सल्य, प्रलय के चित्र में भयानक, संघर्ष सर्ग में वीर और रौद्र, रहस्य सर्ग में अद्भुत, पशु की हत्या के प्रसंग में वीभत्स, चिन्ता और निर्वेद सर्गों में निर्वेदमूलक शान्त और अन्त में आनन्दपूर्ण सामरस्य (व्यापक अर्थ में शान्त) की सिद्धि हुई है।
{रूपक (Metaphor/Allegory) का अर्थ है जब किसी वस्तु, व्यक्ति या विचार को दूसरे के समान न बताकर सीधे वही मान लिया जाए।}
75. डॉ. नगेन्द्र ने ‘कामायनी’ के रूपक-तत्त्व की व्याख्या करते हुए मनु को ‘मन’, श्रद्धा को ‘हृदय’, इड़ा को ‘बुद्धि’, कुमार को ‘पूर्णमानव’, ‘आकुलि-किलात’ को आसुरीवृत्ति, देवताओं को ‘इन्द्रियों’, श्रद्धा के पशु को ‘अहिंसावृत्ति’, वृषभ को ‘धर्म’ और सोमलता को ‘भोग’ के प्रतीक रूप में प्रस्तुत किया है।
76. ‘कामायनी’ की दार्शनिक पृष्ठभूमि का विवेचन करते हुए डॉ. नगेन्द्र ने सिद्ध किया है कि कामायनी का आधारभूत दर्शन आनन्दवादी शैवाद्वैत है। इसके अतिरिक्त बौद्धदर्शन के क्षणवाद, शून्यवाद, नियतिवाद, दुःखवाद, तथा वर्तमान वैज्ञानिक चिन्तन के अनेक सिद्धान्तों- विकासवाद और उसके अंगभूत परिवर्तनवाद, परमाणुवाद, शक्ति-स्पर्धावाद-आदि की प्रतिध्वनि भी कामायनी में सुनाई पड़ती है।
77. ‘कामायनी’ की आलोचना में डॉ. नगेन्द्र ने रिचर्ड्स की मनोवैज्ञानिक, लॉंजिनस, (Longinus) की उदात्ततत्त्वीय तथा भारतीय रस-सिद्धान्त, शैव एवं बौद्ध दर्शन और आधुनिक विकासवाद की पारिभाषिक शब्दावली का उपयोग किया है।
78. अपने स्फुट निबन्धों में डॉ. नगेन्द्र ने प्रायः उन्हीं कवियों की समीक्षा की है जो गांधीवाद से प्रभावित हैं और जिनमें रूमानी प्रवृत्ति लक्षित होती है। पंत, सियारामशरणगुप्त, दिनकर, बच्चन, नरेन्द्र, अंचल, गिरिजाकुमार माथुर आदि की समीक्षाएँ इस तथ्य को प्रमाणित करती हैं। इन समीक्षाओं में डॉ. नगेन्द्र ने रस-सिद्धान्त, मनोविज्ञान, बिम्बवादी, मिथकीय और अभिव्यंजना-सौन्दर्य का विवेचन करने वाली छायावादी शब्दावली का प्रयोग किया है।
{रूमानी प्रवृत्ति (Romantic Tendency) प्रेम, सौंदर्य, कल्पना और व्यक्तिगत भावनाओं को तर्क व यथार्थ से ऊपर रखने का एक दृष्टिकोण है। यह भावना, सहज ज्ञान, प्रकृति के प्रेम और रहस्यों में रुचि को प्राथमिकता देती है, जो मुख्य रूप से कला, साहित्य और संस्कृति में रूमानियत (Romanticism) के रूप में प्रकट होती है।}
79. डॉ. नगेन्द्र की वृत्ति गद्य-साहित्य के मूल्यांकन में नहीं रमी है। उन्होंने जैनेन्द्र, सियारामशरण-गुप्त और अज्ञेय के उपन्यासों- ‘त्यागपत्र’, ‘नारी’, ‘सुखदा’, और ‘शेखर-एक जीवनी’ की समीक्षा इनके प्रभाव की दृष्टि से की थी। इस क्रम में उन्होंने रचना की मूल-प्रेरणा, जीवन-दृष्टि, प्रभाव-अंकन, कला, शैली की विदग्धता (कौशल), रस की क्षीणता आदि के आधार पर अपना निर्णय दिया था।
80. सन् 1940 ई. में आपने ‘आधुनिक हिन्दी-नाटक’ लिखा था। उसमें हिन्दी-नाटक की प्रवृत्तियों का वर्गीकरण, उनमें निहित-चेतना और उनके रूप-बंध की दृष्टि से किया था। इसके बाद इस दिशा में भी आपने सक्रियता नहीं दिखाई।
81. इधर 1970 के आस-पास आपने ‘साहित्य के इतिहास-दर्शन’ पर भी विचार किया है, आपके अनुसार- “देशकाल के परिवेश में साहित्य की विकास-परम्परा का निरूपण, साहित्य के इतिहास का सामान्य लक्षण है। चूँकि तत्त्व-रूप में ‘साहित्य सौन्दर्य-चेतना की अभिव्यक्ति का नाम है, अतः साहित्य का इतिहास देश-काल के परिवेश में सौन्दर्य-चेतना और उसकी अभिव्यक्ति के माध्यम उपकरणों के क्रम-विकास का निरूपण है।” (आस्था के चरण)
आचार्य रामचन्द्र शुक्ल और डॉ नगेन्द्र की आलोचना दृष्टि में अंतर
यद्यपि डॉ नगेन्द्र ने आचार्य रामचन्द्र शुक्ल की पारिभाषिक शब्दावली से अनेक शब्द ग्रहण किए लेकिन आचार्य रामचन्द्र शुक्ल और डॉ नगेन्द्र की आलोचना दृष्टि में निम्नलिखित अंतर है :
1. आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ‘छायावाद’ को शैली का एक विशिष्ट रूप मानते थे। डॉ. नगेन्द्र उसके मूल में ‘एक नवीन सांस्कृतिक चेतना’ भी लक्षित करते हैं। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल परोक्ष सत्ता के प्रति रागात्मक सम्बन्ध की स्थापना संभव नहीं मानते थे। इसलिये वे रहस्यवाद और प्रतीकात्मक रहस्यवाद दोनों के विरोधी थे।
2. इसी प्रकार आचार्य रामचन्द्र शुक्ल क्रोचे के अभिव्यंजनावाद के भी विरोधी थे क्योंकि इसमें उन्हें वस्तु-तत्त्व का अभाव लक्षित हुआ था। डॉ. नगेन्द्र को क्रोचे से कोई शिकायत नहीं है। अभिव्यंजनावाद में वे ‘वस्तु’ की मात्र ‘उपेक्षा’ लक्षित करते हैं, अभाव नहीं।
{साहित्य में ‘वस्तु-तत्त्व’ का अर्थ किसी साहित्यिक कृति (कहानी, उपन्यास, नाटक) के मूल आधार, कथावस्तु (Plot), या विषय-वस्तु (Subject Matter) से है। यह वह केंद्रीय विषय, घटनाक्रम, या विचार है, जिसके इर्द-गिर्द पूरी रचना रची जाती है। इसमें पात्रों के कार्य-व्यापार, संघर्ष, और लेखक के मुख्य संदेश समाहित होते हैं।}
3. प्रभाववाद को आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने एकांगी और अधूरा माना था। डॉ. नगेन्द्र सिद्धान्त के स्तर पर ‘रस-सिद्धान्त’ और ‘प्रभाववाद’ में अन्तर मानते हुए भी व्यवहार में उसे रस-विरोधी नहीं मानते।
{साहित्य में प्रभाववाद (Impressionism) एक ऐसी लेखन शैली है जो वस्तुनिष्ठ वास्तविकता के बजाय किसी पात्र या लेखक के मन पर पड़ने वाली क्षणिक छाप, व्यक्तिगत भावनाओं और संवेदनाओं को केंद्र में रखती है। यह यथार्थवाद के विपरीत, घटनाओं के विस्तृत विवरण के बजाय उनके मानसिक प्रभाव को चित्रित करती है, जिसमें समय और चेतना का प्रवाह धुंधला हो सकता है।}
4. वक्रोक्तिवाद को भी आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने पूरी तरह स्वीकार नहीं किया था। वे भाव-प्रेरित वक्रता के ही समर्थक थे। डॉ. नगेन्द्र ‘वक्रता’ को ‘चारुता’ का पर्याय मानते हैं और उसके अभाव में काव्य की स्थिति नहीं मानते।
साहित्य में भाव-प्रेरित वक्रता से तात्पर्य उस काव्य शैली से है, जहाँ तीव्र भावनाओं (जैसे प्रेम, वियोग, क्रोध) के कारण बात सीधे न कहकर टेढ़ेपन या व्यंग्यात्मक ढंग से कही जाती है। यह बुद्धि की अपेक्षा हृदय की उच्च अवस्था में उत्पन्न होती है, जो काव्य में सौंदर्य, तन्मयता और मार्मिकता बढ़ाती है। सूरदास के ‘भ्रमरगीतसार‘ में गोपियों के कथन इसके उत्कृष्ट उदाहरण हैं।
5. आचार्य रामचन्द्र शुक्ल से डॉ. नगेन्द्र की असहमति करुणरस के आस्वाद और साधारणीकरण जैसी केन्द्रीय स्थापनाओं को लेकर भी है। असहमति के ये सारे बिन्दु उनके आत्मपरक काव्य-चिन्तन के प्रमाण हैं।
{साहित्य में साधारणीकरण (Generalization) वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा काव्य या नाटक में वर्णित विशिष्ट पात्र, भाव या परिस्थितियाँ देश-काल की सीमाओं से मुक्त होकर पाठक/दर्शक के लिए सामान्य (Universal) बन जाती हैं। इसमें पाठक व्यक्तिगत ‘मैं’ या ‘पर’ के भाव को भुलाकर, रचना के पात्रों से एकात्म स्थापित कर रस का आस्वादन करता है।}
6. मनोवैज्ञानिक समीक्षा को आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने महत्व नहीं दिया था। डॉ. नगेन्द्र ने बिम्बवादी, मनोवैज्ञानिक और मिथकीय समीक्षा की शब्दावली को सिद्धान्त और व्यवहार के स्तरों पर विवेचित और व्यवहृत कर केन्द्र में लाने का प्रयत्न किया है।
निष्कर्ष
- डॉ. नगेन्द्र आधुनिक हिंदी आलोचना के एक प्रमुख स्तम्भ हैं । उन्होंने आलोचना को परंपरा और शास्त्र के आधुनिक संदर्भों में, पाश्चात्य मापदण्डों के समक्ष रखकर देखा।
- आधुनिक भारतीय विचारकों में भारतीय व पाश्चात्य साहित्यशास्त्र का जितना व्यवस्थित व गहन अध्ययन डॉ. नगेन्द्र का रहा उतना किसी अन्य का नहीं ।
- उन्होंने प्राचीन सिद्धांतों से ही आधुनिक प्रतिमान गढ़े हैं, दूसरे शब्दों में प्राचीन सिद्धांतों की युगानुकूल व्याख्या की है । इस प्रकार वे प्राचीन व नवीन, भारतीय व पाश्चात्य के बीच एक सेतु के निर्माणकर्ता हैं ।
नमस्कार ! मेरा नाम भूपेन्द्र पाण्डेय है । मेरी यह वेबसाइट शिक्षा जगत के लिए समर्पित है । हिंदी भाषा, हिंदी साहित्य और अनुवाद विज्ञान से संबंधित उच्च स्तरीय पाठ्य सामग्री उपलब्ध करवाना मेरा मुख्य उद्देश्य है । मैं पिछले 20 वर्षों से इस क्षेत्र में काम कर रहा हूँ । मेरे लेक्चर्स हिंदी के छात्रों के द्वारा बहुत पसंद किए जाते हैं ।
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