पूर्वी हिंदी का वही क्षेत्र है जो प्राचीन काल में उत्तर कोसल और दक्षिण कोसल था। उत्तर कोसल की बोली अवधी और दक्षिण कोसल की छत्तीसगढ़ी है। इन दो खण्डों के बीच में शताब्दियों तक बघेल राजपूतों का राज्य रहा है। बघेलखण्ड की एक राजनीतिक इकाई होने के कारण उसकी बोली बघेलखण्डी या बघेली को भी लोग अलग बोली मानते हैं। इस प्रकार पूर्वी हिंदी उपभाषा (बोली-वर्ग) के अंतर्गत आने वाली तीन प्रमुख बोलियां अवधी, बघेली और छत्तीसगढ़ी हैं । इस लेख में हम Purvi Hindi ki Boliyan aur Unki Visheshtaen को समझने का प्रयास करेंगे । इस टॉपिक को और भी अच्छी तरह से समझने के लिए नीचे दिए गए वीडियो को भी जरूर देखें ।
वैज्ञानिक दृष्टि से विचार किया जाये तो बघेली को अवधी की एक उपबोली ही मानना पड़ेगा। कुछ विद्वानों ने भोजपुरी को भी पूर्वी हिंदी की बोली माना है।
पूर्वी हिंदी की समस्त बोलियों में अवधी प्रधान है। इसमें भरपूर साहित्य मिलता है। मंझन, जायसी, उसमान, जान, नूरमुहम्मद आदि सूफियों का काव्य ठेठ अवधी में और तुलसीदास-कृत ‘रामचरितमानस’ और ‘रामललानहछू’ एवं मानदास, बाबा रामचरणदास और महाराज रघुराजसिंह का रामभक्ति काव्य साहित्यिक अवधी में लिखा गया है। पूर्वी हिंदी कानपुर से मिर्जापुर तक (लगभग 150 मील) और लखीमपुर-नेपाल की सीमा से दुर्ग-बस्तर की सीमा तक (550 मील) के क्षेत्र में बोली जाती है। ।
पूर्वी हिंदी की बोलियों (अवधी, बघेली और छत्तीसगढ़ी) का आपस में संबंध
सामान्यता की दृष्टि से जितना घनिष्ठ सम्बन्ध आपस में इस उपवर्ग की बोलियों का है, उतना किसी अन्य हिंदी उपभाषा की बोलियों का नहीं है। इनके आपसी संबंधों को निम्न बिंदुओं के आधार पर समझा जा सकता है :
- 1. /ण/ की जगह सदा /न/, और /श/ /ष की जगह /स/ बोला जाता है।
- 2. /ड/ और /ड़/ सहस्वन है।
- 3. शब्द के मध्य अथवा अन्त में /ड/ नहीं होता।
- 4. प्रायः हिंदी के शब्दों का /ल/ परिवर्तित होकर /र/ हो जाता है, जैसे थारी, हर, फर में।
- 5. /य/ /व/ का उच्चारण क्रमशः ज/ए और ब/उ होता है, जैसे जेह/एह, बकील/उकील में।
- 6. महाप्राण ध्वनियाँ शुद्ध और स्पष्ट हैं।
- 7. ऐ//औ/ संयुक्त स्वर हैं….. जैसे मैल, कौन का उच्चारण मइल, कउन करके होता है।
पूर्वी हिंदी की बोलियाँ
प्राचीन भारत में उत्तर कोसल और दक्षिण कोसल के नाम से विख्यात क्षेत्र पूर्वी हिंदी का है। कानपुर से मिर्जापुर, लखीमपुर से दुर्ग-बस्तर की सीमा तक में फैले हुए क्षेत्र की यह उपभाषा है। इसमें अवधी, बघेली और छत्तीसगढ़ी बोली जाती है। इन तीनों बोलियों में जितना घनिष्ठ संबंध है, उतना अन्य बोलियों में नहीं है। इनका संक्षिप्त परिचय इस प्रकार है-
1. अवधी
इस बोली का केंद्र अयोध्या है । अवध (अयोध्या) प्रांत की बोली होने के कारण इसका नाम अवधी पड़ा है। इसके अन्य नाम पूर्वी, कोसली और बैसवाड़ी भी हैं। इसका विस्तार क्षेत्र-लखीमपुर, खीरी, गोंडा, बहराइच, बाराबंकी, लखनऊ, फैजाबाद, सुल्तानपुर, प्रतापगढ़, रायबरेली, जौनपुर, मिर्जापुर, इलाहाबाद, फतेहपुर, उन्नाव तक फैला हुआ है। अवधी बोलने वालों की संख्या दो करोड़ के लगभग है। इस में जायसी, कुतुबन, उसमान, तुलसी आदि विख्यात साहित्यकार हुए हैं। ‘रामचरित मानस’ इसी भाषा में लिखा गया ग्रंथ है।
अवधी की भाषागत विशेषताएँ
1. अ, इ, उ के ह्रस्व और अतिह्रस्व दो-दो रूप मिलते हैं। अ किसी शब्द के अन्त में नहीं आता। ऐ, औ का उच्चारण अई, अउ के रूप में होता है।
2. ण ध्वनि नहीं है। ड, ढ शब्द के आरंभ में होते हैं, मध्य और अंत में नहीं। ड़ और ढ़ मध्य अथवा अंत में आते हैं।
3. महाप्राण ध्वनियाँ बहुत स्पष्ट हैं।
4. अवधी के संज्ञापद स्वरान्त हैं, जो कि अकारांत, आकारांत और ईकारान्त रूप में है। जैसे- लड़का – लरिका, लरिकवा, लरिकौना।
5. अवधी में परसर्ग निम्नवत् हैं-
- कर्म, सम्प्रदान – का, काँ, कु, कूँ कै, कहँ, कहूँ
- करण, अपादान – से, सन, सेन, सेनी, सों, सेती, ते
- सम्बन्ध – क, की, के, केर
- अधिकरण – में, माँ, माझ, मह, महुँ
नोट : हिंदी व्याकरण में संज्ञा या सर्वनाम शब्दों के बाद प्रयुक्त होने वाले ने, को, से, का, की, के, में, पर जैसे कारक चिह्नों को परसर्ग या विभक्ति कहते हैं। ये शब्द वाक्य के अन्य पदों के साथ संबंध स्थापित करते हैं और व्याकरण में इन्हें कारक चिन्ह भी कहा जाता है।
6. आकारान्त विशेषण नहीं के बराबर हैं। उनका लिंग-वचन के अनुसार रूप नहीं बदलता। जैसे- मीठ फल, मीठ रोटिन इत्यादि।
7. संख्यावाचक शब्दों के कुछ उदाहरण – दो-दुई, तीन-तीनि, छह-छा, सोरा, ग्यारह-एगारा, सोलह-सोरा, पचपन-पंचावन आदि।
8. साधारणतया उत्तम पुरुष एकवचन ‘मैं’ और मध्यम पुरुष एकवचन ‘तू’ के रूपों का व्यवहार नहीं होता। मैं के स्थान पर ‘हम’ का प्रयोग होता है।
9. विभिन्न कालों के कृदन्त रूप द्रष्टव्य हैं-
| वर्तमान | भूत | भविष्यत् |
| देखत | देखा | देखब |
| खात | खाया | खाब |
| रहत | रहा | रहब |
नोट : कृदंत (participle) को “क्रिया से व्युत्पन्न और विशेषण के रूप में प्रयुक्त शब्द, जैसे हंसता हुआ चेहरा” के रूप में परिभाषित किया गया है। कृदंत को इंग्लिश में Participle (पार्टिसिपल) कहते हैं। यह क्रिया (verb) का वह रूप है जो विशेषण (adjective) की तरह काम करता है या काल (tenses) बनाने में मदद करता है।
10. पूर्वकालिक क्रियाओं में कइके, पढ़िके, खाइके आदि रूप मिलते हैं।
नोट : जब वाक्य में कर्ता एक क्रिया समाप्त करके तुरंत दूसरी क्रिया करता है, तो जो क्रिया पहले समाप्त होती है, उसे पूर्वकालिक क्रिया कहते हैं। इसमें आमतौर पर मुख्य क्रिया से पहले ‘कर’ या ‘करके’ जुड़ा होता है।
प्रमुख उदाहरण:
- नहाकर पूजा की। (पूजा से पहले नहाना)
- वह खाकर सो गया। (सोने से पहले खाना)
- चोर सामान चुराकर भाग गया।
11. कुछ निराले शब्द हैं- करिआ (काला), कंडा (उपला), आँचर (स्तन), मरसेरू (पति), बसही (पत्नी), सार (साला), गरू (भारी), तरखले (नीचे), पातर (पतला) इत्यादि।
2. बघेली
अवध और छत्तीसगढ़ के मध्य बघेली बोली जाती है। बघेलखंड में बघेल राजपूत राजाओं का प्रभाव था। जो रीवां, शहडौल, सतना, मैहर तक विस्तृत था। इस क्षेत्र में बघेली बोली जाती है। कुछ विद्वान इसे अवधी की उपबोली भी मानते हैं। कभी-कभी इसे दक्षिणी अवधी भी कहा जाता है। इस बोली में लोक-साहित्य की रचना हुई है।
बघेली की भाषागत विशेषताएँ
1. अवधी का ‘व’ बघेली में ‘ब’ हो जाता है। जैसे आबा (आवा-अवधी, आया-हिंदी )।
2. विशेषणों में ‘हा’ प्रत्यय लग जाता है, जैसे- मरकहा।
3. परसर्ग इस प्रकार हैं-
कर्म, सम्प्रदान – कहा
करण, अपादान – तार
शेष अवधी की भाँति हैं।
4. सर्वनामों में मुझे के स्थान पर म्वा, मोहि; तुझे के स्थान पर त्वां, तोहि; उसको के लिए वाहि तथा इसको के लिए याहि विशिष्ट हैं।
5. बघेली की शब्दावली में आदिवासी जनजातियों की बोलियों के तत्त्व भी दिखाई देते हैं।
3. छत्तीसगढ़ी
वर्तमान छत्तीसगढ़ राज्य की यह बोली है। छतीसगढ़ का का ऐतिहासिक नाम दक्षिण कोसल था। यह क्षेत्र रायपुर, बिलासपुर, रायगढ़, सरगुजा, खैरागढ़, दुर्ग, राजनांदगाँव, बस्तर, जगदलपुर, कांकेर तक फैला हुआ है।
यह अवधी से काफी मिलती-जुलती है। अर्द्धमागधी अपभ्रंश के दक्षिणी रूप से इस बोली का उद्भव हुआ। इस बोली में लोक-साहित्य उपलब्ध होता है। इसको बोलने वालों की संख्या लगभग एक करोड़ है।
छत्तीसगढ़ी की भाषागत विशेषताएँ
1. महाप्राणीकरण की प्रवृत्ति पाई जाती है। जैसे इलाका-इलाखा, कचहरी-कछेरी, जन-झन इत्यादि।
नोट : हिंदी व्याकरण में महाप्राण ध्वनि वे व्यंजन हैं जिनके उच्चारण में मुख से हवा का प्रवाह (श्वास) अधिक मात्रा में और जोर से बाहर निकलता है। इनमें प्रत्येक वर्ग का दूसरा (2nd) और चौथा (4th) व्यंजन, तथा सभी ऊष्म व्यंजन (श, ष, स, ह) शामिल हैं।
2. ‘स’ का ‘छ’ उच्चारण मिलता है- सीता-छीता।
3. परसर्ग निम्नवत् हैं-
कर्म, सम्प्रदान – का. ल, ला
करण, अपादान – ले, से
सम्प्रदान – बरे, खातिर
सम्बन्ध – के
अधिकरण – में, माँ, ऊपर
4. बहुवचन प्रायः ‘मन’ शब्द लगाने से बनता है। जैसे हम मन (हम लोग)।
5. संज्ञार्थक क्रिया – देखल, करब के अतिरिक्त देखब, करन भी होती है। शिष्ट और अशिष्ट प्रयोगों में भी अन्तर होता है। जैसे हन (शिष्ट), हवन (अशिष्ट) ।
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