‘हिंदी साहित्य का इतिहास’ में ‘गद्य साहित्य का प्रसार’ के द्वितीय उत्थान (संवत् 1950-1975) के अंतर्गत समालोचना पर विचार करते हुए शुक्लजी ने लिखा है, ‘पर यह सब आलोचना बहिरंग बातों तक ही रही। भाषा के गुण-दोष, रस, अलंकार आदि की समीचीनता इन्हीं सब परम्परागत विषयों तक पहुँची। स्थायी साहित्य में परिगणित होने वाली समालोचना जिसमें कवि की अंतर्वृत्ति का सूक्ष्म व्यवच्छेद होता है, उसकी मानसिक प्रवृत्ति की विशेषताएँ दिखाई जाती हैं, बहुत कम दिखाई पड़ी।’ आचार्य रामचन्द्र शुक्ल Acharya Ramchandra Shukla हिंदी आलोचना के युग-पुरुष हैं। आइए अब हम acharya ramchandra shukla ki alochana drishti का विस्तृत विवेचन करें । आगे गद्य साहित्य के तृतीय उत्थान के अंतर्गत समालोचना के विकास पर लिखते हुए उन्होंने कवियों की ‘अंतःप्रवृत्ति की छानबीन’ की बात फिर की है। शिष्टता और विनम्रता के नाते उन्होंने यह नहीं लिखा कि ‘ऐसी आलोचना मैंने की है।’ उन्होंने उत्तम पुरुष का प्रयोग बचाते हुए अपने विषय … Read more