अंधेरे में कविता का सारांश | andhere men kavita ka saransh | andhere men muktibodh

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गजानन माधव मुक्तिबोध हिंदी-साहित्य में फैंटेसी-शैली के कारण विशेष रूप से प्रसिद्ध हैं । मुक्तिबोध फैंटेसी को काव्य-शिल्प का अनिवार्य अंग मानते थे । ‘अंधेरे में’ फैंटेसी-शैली की एक अद्भुत रचना है। मुक्तिबोध ने फैंटेसी काव्य-शैली को अनुभव की कन्या कहा है । ‘अंधेरे में’ एक स्वप्न-कथा है । मुक्तिबोध की ‘अंधेरे में’ कविता ‘चाँद का मुँह टेढ़ा’ है में संकलित हैं। ‘चाँद का मुँह टेढ़ा है, कविता संग्रह में मुक्तिबोध की 28 कविताएं संगृहीत हैं। जिनमें ‘अंधेरे में’ सर्वाधिक चर्चित एवं प्रभावशाली कविता है। ‘अंधेरे में’ कविता कल्पना पत्रिका में सन् 1964में ‘आशंका के द्वीप : अंधेरे’ में शीर्षक से प्रकाशित हुई थी। ‘अंधेरे में’ कविता कवि  की प्रतिनिधि कविता है और इसकी रचना 1957 से लेकर 1962 तक हुई थी। ‘अंधेरे में’ कविता मुक्तिबोध की सबसे लंबी कविता के रूप में भी जानी जाती है। शमशेर बहादुर सिंह ने कहा है, “अंधेरे में कविता देश के आधुनिक जन … Read more

हिंदी साहित्य के इतिहास लेखन की परम्परा | Hindi Sahitya Ke Itihas Lekhan Ki Parampara

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हिंदी भाषा एवं साहित्य का प्रारम्भ मोटे तौर पर 1000 ई. के आस-पास माना जाता है। तथापि हिंदी साहित्य के इतिहास लेखन का वास्तविक सूत्रपात 19 वीं शताब्दी से माना जाता है। यद्यपि मध्यकाल में रचित वार्ता साहित्य यथा-चौरासी वैष्णवन की वार्ता (गोसाई गोकुलनाथ-ब्रजभाषा),  दो सौ बावन वैष्णवन की वार्ता (गोसाई गोकुलनाथ-ब्रजभाषा)), भक्तमाल (नाभादास) आदि में अनेक कवियों के व्यक्तित्व  एवं कृतित्व का परिचय मिल जाता है, किन्तु इतिहास-लेखन के लिए जो कालक्रमानुसार वर्णन अपेक्षित होता है, उसका नितांत अभाव इन वार्ता ग्रन्थों में है, अतः इन्हें साहित्य का इतिहास-ग्रंथ नहीं माना जा सकता। हिंदी साहित्य के इतिहास लेखकों में जो उल्लेखनीय हैं, उनका क्रमानुसार संक्षिप्त विवरण निम्नानुसार है: गार्सा-द-तासी  हिंदी साहित्य के इतिहास लेखन की परम्परा का सूत्रपात भी किसी हिंदी भाषी व्यक्ति द्वारा न होकर फ्रेंच विद्वान् ‘गार्सा-द-तासी’ द्वारा रचित ‘इस्त्वार द ला लितरेत्युर ऐन्दुई ए ऐन्दुस्तानी’ नामक ग्रंथ से हुआ, जिसकी रचना दो भागों में की गयी है। … Read more

लघु कथा क्या है | Laghu Katha Kya Hai

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 ‘लघु कथा’ शब्द सम्भवतः अंग्रेजी के ‘शार्ट स्टोरी’ (Short Story) शब्द का अनुवाद है। वैसे ‘कहानी’ शब्द भी अंग्रेजी के ‘शार्ट स्टोरी’ के लिये ही प्रयुक्त होता है। ‘लघु कथा’ और ‘कहानी’ में तात्विक दृष्टि से कोई अंतर होता भी नहीं है। व्यावहारिक दृष्टि से ‘लघु कथा’ कहानी के छोटे रूप को अभिव्यक्त करती है। हमारे यहाँ लघुकथाओं की परंपरा बहुत पुरानी है। पुरानी लघु कथाएं वस्तुतः दृष्टांतों के रूप में विकसित हुई हैं। ऐसे दृष्टांत मुख्यतया नैतिक और धार्मिक क्षेत्रों में मिलते हैं। नैतिक दृष्टांतों को प्रकट करने वाली नैतिक लघु कथाएं सर्वत्र मिलती हैं, जैसे ‘पंचतंत्र’ की कथाएं, ‘महाभारत’, ‘बाइबिल’, ‘जातक’ आदि की कथाएं। इसी प्रकार धार्मिक दृष्टांतों के अंतर्गत भी लघु कथाओं के अनेक उदाहरण मिल सकते हैं। आधुनिक कहानी के संदर्भ में ‘लघु कथा’ का अपना स्वतंत्र महत्व एवं अस्तित्व है। प्रेमचंद व ‘प्रसाद’ से लेकर जैनेंद्र व ‘अज्ञेय’ तक इस धारा की एक समृद्ध परंपरा है। प्रेमचंद ने अपनी कहानी-कला के उत्कर्ष काल में लघु कथाओं के रूप में … Read more

रेखाचित्र का उद्भव और विकास | Rekhachitra ka Udbhav aur Vikas

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अंग्रेजी के ‘स्केच’ शब्द का पर्यायवाची रेखाचित्र’ है। हिंदी में इसे ‘शब्दचित्र’ भी कहते हैं। व्यक्तिचरित्र, शब्दांकन, चरित्रलेख इत्यादि इसके अन्य नाम हैं। शब्दों के द्वारा जब किसी घटना, वस्तु, स्थान, दृश्य अथवा व्यक्ति का इस प्रकार भावपूर्ण वर्णन किया जाये कि पाठक के मन पर उसका यथार्थ चित्र खींच जाये तो उसे ‘रेखाचित्र’ कहते हैं। तो आइए अब rekhachitra ka udbhav aur vikas का विस्तृत रूप से अध्ययन करते हैं ।  ‘रेखाचित्र’ का एक स्वतंत्र विधा के रूप में विकास द्विवेदी युग में हुआ। पद्मसिंह शर्मा रेखाचित्र के प्रवर्तक माने जाते हैं। इनकी रचना ‘पद्मपराग’ (1929 ई.) से हिंदी-रेखाचित्र शर्मा की ‘बोलती प्रतिमा’ को हिंदी का प्रथम रेखाचित्र माना है। प्राणों का सौदा (1939 ई.), जंगल के जीव (1949 ई). वे जीते कैसे हैं (1957 ई.)  श्रीराम शर्मा के अन्य प्रसिद्ध रेखाचित्र हैं। रेखाचित्र-साहित्य में बनारसीदास चतुर्वेदी एक अविस्मरणीय हस्ताक्षर (लेखक) हैं। इन्होंने ‘मधुकर’ के रेखाचित्र विशेषांक (1946 ई.) … Read more

गजानन माधव मुक्तिबोध का जीवन दर्शन और उनकी काव्य दृष्टि | Gajanan Madhav Muktibodh ka Jivan Darshan aur Unki Kavya Drishti

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 गजानन माधव मुक्तिबोध का जन्म श्यौपुर, ग्वालियर (मध्यप्रदेश) में 13 नवंबर, 1917 को हुआ । सन 1938 में इन्होंने होल्कर कॉलेज इंदौर से बी. ए. किया । सन 1954 में नागपुर विश्वविद्यालय एम.ए. से किया । उसके चार वर्ष बाद सन् 1958 में वे राजनांदगांव के दिग्विजय कॉलेज में अध्यापक हो गए और अंत तक वहीं रहे । 11 सितंबर, 1964 को इनकी मृत्यु हुई । मुक्तिबोध हिंदी साहित्य के प्रमुख कवि, आलोचक, निबंधकार, कहानीकार तथा उपन्यासकार थे। उन्हें प्रगतिशील कविता और नयी कविता के बीच का एक सेतु भी माना जाता है। आज हम muktibodh ka jivan darshan aur unki kavya d rishti का विस्तार से अध्ययन करेंगे ।  मुक्तिबोध की प्रमुख कृतियाँ  कामायनी : एक पुनर्विचार, नई कविता का आत्म-संघर्ष तथा अन्य निबंध, नए साहित्य का सौन्दर्यशास्त्र, समीक्षा की समस्याएँ, चाँद का मुँह टेढ़ा है, भूरी-भूरी खाक धूल, एक साहित्यिक की डायरी, काठ का सपना, विपात्र, सतह से … Read more

हिंदी निबंध का उद्भव और विकास | Hindi Nibandh ka Udbhav aur Vikas

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 डॉ.गुलाबराय ने निबंध को परिभाषित करते हुए कहा है – “निबंध उस गद्य रचना को कहते हैं जिसमें एक सीमित आकार के भीतर किसी विषय का वर्णन या प्रतिपादन एक विशेष निजीपन, स्वच्छंदता, सौष्ठव और सजीवता तथा आवश्यक संगति और संबद्धता के साथ किया गया हो ।” आइए अब हम hindi nibandh ka udbhav aur vikas विषय का विस्तार से अध्ययन करें ।  इस प्रकार निबंध उस गद्य रचना को कहते हैं, जिसमें लेखक अपने भावों और विचारों को आत्मपरक रूप में व्यक्त करने के लिए सजीव, लालित्यपूर्ण और मर्यादित भाषा-शैली का प्रयोग करता है । हिंदी में निबंध की परंपरा बहुत पुरानी नहीं है। हिंदी में पहला निबंध कब लिखा गया और किसने लिखा, इस पर कोई एक मत नहीं है। लेकिन कुछ ऐसे ऐतिहासिक तथ्य हैं जिन्हें निबंधों पर विचार करते हुए- अवश्य दृष्टि में रखना चाहिए। हिंदी में निबंधों की शुरुआत, गद्य की अन्य कई विधाओं की तरह भारतेंदु … Read more

भारतेन्दु हरिश्चंद्र की कविता में नवजागरण, समाज सुधार तथा राष्ट्रीय चेतना | Bhartendu Harishchandra Ki Kavita Men Navjagaran, Samaj Sudhar Tatha Rashtreey Chetna

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आधुनिक हिंदी कविता का प्रारंभ उन्नीसवीं सदी में भारतेन्दु हरिश्चंद्र bhartendu harishchandra से माना जाता है। भारतीय नवजागरण और राष्ट्रीयता की चेतना की पृष्ठभूमि भी इसी युग की कविता में प्राप्त होती है । नवजागरण की दृष्टि से देखें तो उसके तीनों प्रमुख तत्व – प्राचीन संस्कृति पर उसकी निर्भरता, ईश्वर की जगह मानव केन्द्रिता और एक जातीय राष्ट्रीय भाषा के रूप में हिंदी खड़ी बोली की स्वीकृति- इस युग की कविता में मिल जाते हैं । भारतेन्दु हरिश्चंद्र bhartendu harishchandra ने नाटक, निबंध, कविता, आदि कई साहित्यिक विधाओं को अपनी रचनात्मक अभिव्यक्ति का माध्यम बनाते हुए और पत्रकारिता द्वारा साहित्य और समाज के संबंधों को नये ढंग से समझने का प्रयास किया ।  आइए अब bhartendu harishchandra ki kavita men navjagaran, samaj sudhar tatha rashtreey chetna पर विचार-विमर्श करें ।  1858 से 1881 तक अर्थात् लार्ड रिपन के शासन शुरू होने तक भारतेन्दु की राजनीतिक समझ इस प्रकार की … Read more

‘अज्ञेय’ के उपन्यास ‘शेखर एक जीवनी’ का वस्तु और शिल्प | Agyey Ke Upanyas ‘Shekhar Ek Jivani’ Ka Vastu Aur Shilp

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शेखर एक जीवनी ‘अज्ञेय’  agyey जी की बहुचर्चित औपन्यासिक कृति है जिसके दो भाग प्रकाशित हुए हैं। प्रथम भाग का प्रकाशन सन् 1941 ई. में और द्वितीय भाग का प्रकाशन सन् 1944 ई. में हुआ। यह अज्ञेय की ऐसी औपन्यासिक रचना है जिसे जीवनी प्रधान मनोवैज्ञानिक उपन्यास कहना अधिक उचित है। स्वयं अज्ञेय के अनुसार, “ ‘शेखर एक जीवनी’ एक अधूरी जीवनी है जो घनीभूत वेदना की केवल एक रात में देखे ‘विजन’ को शब्दबद्ध करने का प्रयास है।” आइए अब shekhar ek jivani ka wastu aur shilp को विस्तार से समझने का प्रयास करें ।  इस उपन्यास का तीसरा भाग भी अज्ञेय जी agyey ने लिखा था, पर वे उसमें कुछ संशोधन करना चाहते थे, जो न कर सके, परिणामतः वह छप न सका। क्या शेखर एक जीवनी अज्ञेय की अपनी जीवनी है— इस विषय में अज्ञेय कहते हैं— “फिर कहता हूँ कि आत्मघटित ही आत्मानुभूत नहीं होता, परघटित भी आत्मानुभूत हो सकता है। तथापि मेरी अनुभूति और मेरी वेदना शेखर को अभिसिंचित … Read more

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