राम की शक्तिपूजा की व्याख्या भाग 7 | ram ki shaktipuja ki vyakhya | part 7
प्रस्तुत पंक्तियां छायावादी कवि सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ द्वारा रचित ‘राम की शक्ति पूजा’ से ली गई हैं। मूल रूप से यह कविता उनके काव्य संग्रह ‘अनामिका’ में संकलित है।
प्रस्तुत पंक्तियां छायावादी कवि सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ द्वारा रचित ‘राम की शक्ति पूजा’ से ली गई हैं। मूल रूप से यह कविता उनके काव्य संग्रह ‘अनामिका’ में संकलित है।
आज के इस लेख में आप ram ki shaktipuja ki vyakhya को पूरी तरह से समझ पाएंगे । कृपया इसे पूरा ज़रूर पड़ें ।
ram ki shaktipuja ki vyakhya
भाग-4 आये सब शिविर सानु पर पर्वत के मंथर सुग्रीव, विभीषण, जाम्बवान आदिक वानर, सेनापति दल-विशेष के अंगद, हनूमान, नल, नील, गवाक्ष प्रात के रण का समाधान करने के लिए, फेर वानर-दल आश्रम-स्थल। बैठे रघु-कुल-मणि श्वेत शिला पर निर्मल जल ले आए कर-पद-क्षालनार्थ पटु हनूमान, अन्य वीर सर के गए तीर संध्या-विधान, वंदना ईश की करने को, लौटे सत्वर, सब घेर राम को बैठे आज्ञा को तत्पर। पीछे लक्ष्मण, सामने विभीषण, भल्लधीर, सुग्रीव, प्रान्त पर पाद-पद्म के महावीर, यूथपति अन्य जो यथास्थान हो निर्निमेष देखते राम का जित सरोज मुख-श्याम-देश। सन्दर्भ – प्रस्तुत पंक्तियां छायावादी कवि सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ द्वारा रचित ‘राम की शक्ति पूजा’ से ली गई हैं। मूल रूप से यह कविता उनके काव्य संग्रह ‘अनामिका’ में संकलित है। प्रसंग – आज के युद्ध का यद्यपि कोई निर्णय नहीं हो सका था, किन्तु राक्षसों का पलड़ा भारी रहा था। रावण ने प्रबल पराक्रम का परिचय दिया था। सूर्यास्त … Read more
भाग – (2) अनिमेष राम-विश्वजिद् दिव्य शर-भंग-भाव, विद्धांग-बद्ध-कोदण्ड-मुष्टि खर रुधिर स्राव। रावण प्रहार दुर्वार विकल वानर दल-बल, मूर्च्छित सुग्रीवांगद-भीषण गवाक्ष गय-नल। वारित सौमित्र भल्लपति अगणित मल्ल-रोध, गर्जित प्रलयाब्धि क्षुब्ध हनुमत् केवल प्रबोध । उद्गीरित वह्नि भीम पर्वत कपि चतुः प्रहर, जानकी भीरु उर आशा भर रावण-सम्बर।। सन्दर्भ – प्रस्तुत पंक्तियां छायावादी कवि सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला‘ द्वारा रचित ‘राम की शक्ति पूजा‘ से ली गई हैं। मूल रूप से यह कविता उनके काव्य संग्रह ‘अनामिका‘ में संकलित है। प्रसंग – राम-रावण युद्ध चल रहा है। आज के युद्ध में यद्यपि कोई निर्णय नहीं हो सका, किन्तु रावण ने आज प्रबल पराक्रम का परिचय देकर सभी वानर वीरों को व्याकुल कर दिया। केवल हनुमान ही एक ऐसे वीर थे जो रावण का प्रतिरोध करते हुए राम के हृदय में क्षीण आशा का संचार कर रहे थे। इन पंक्तियों में कवि ने इसी वृत्तान्त का वर्णन किया है। व्याख्या – राम ने रावण … Read more
‘राम की शक्ति पूजा’ निराला द्वारा 1936 में रचित एक लम्बी कविता है, जो उनके काव्य संकलन ‘अनामिका’ में संकलित है। 312 पंक्तियों की इस कविता की कथा पौराणिक है, परन्तु निराला ने उसे सर्वथा मौलिक रूप में प्रस्तुत करते हुए प्रासंगिक बना दिया है। आज हम Ram ki Shakti Puja के प्रारम्भिक 10 पंक्तियों की व्याख्या को समझने का प्रयास करेंगे । संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) की परीक्षा में जब कविताओं की व्याख्या लिखनी होती है तो आपको कुल 150 शब्दों में इसका उत्तर लिखना होता है । इसमें आपको संदर्भ, प्रसंग, व्याख्या और विशेष सब मिलाकर कुल 150 शब्दों में उत्तर लिखना होता है । लेकिन मैंने आपको इसमें विस्तार से सब कुछ बताने का प्रयास किया है ताकि इस कृति से संबंधित न केवल व्याख्या बल्कि किसी भी प्रकार के प्रश्नों का उत्तर दे सकने में आप समर्थ और सक्षम हो पायेंगे । यह पहला भाग … Read more
भाग-3 लौटे युग दल। राक्षस-पद-तल पृथ्वी टलमल, बिंध महोल्लास से बार-बार आकाश विकल। वानर-वाहिनी खिन्न, लख निज-पति-चरण-चिन्ह चल रही शिविर की ओर स्थविर-दल ज्यों विभिन्न, प्रशमित है वातावरण, नमित-मुख सान्ध्यकमल लक्ष्मण चिन्ता-पल पीछे वानर-वीर सकल, रघुनायक आगे अवनी पर नवनीत-चरण, श्लथ धनु-गुण है, कटि-बन्ध स्रस्त-तूणीर-धरण, दृढ़ जटा-मुकुट हो विपर्यस्त प्रतिलट से खुल फैला पृष्ठ पर, बाहुओं पर, वक्ष पर, विपुल उतरा ज्यों दुर्गम पर्वत पर नैशान्धकार, चमकती दूर तारायें ज्यों हों कहीं पार। सन्दर्भ – प्रस्तुत पंक्तियां छायावादी कवि सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला‘ द्वारा रचित ‘राम की शक्ति पूजा‘ से ली गई हैं। मूल रूप से यह कविता उनके काव्य संग्रह ‘अनामिका‘ में संकलित है। प्रसंग – सूर्यास्त हो जाने पर आज का युद्ध स्थगित हो गया। राक्षसों एवं वानरों की सेनाएं अपने-अपने शिविर की ओर लौट रही हैं। वानर सेना में हताशा है, जबकि राक्षसों का पलड़ा भारी रहने के कारण राक्षस सेना में उत्साह है। राम के हृदय में निराशा … Read more