चन्द्रदेव से मेरी बातें – राजेन्द्र बाला घोष (बंग महिला) | Chandradev Se Meri Baten-Rajendra Bala Ghosh (Bang Mahila)

राजेन्द्र बाला घोष बंग महिला के नाम से प्रसिद्ध हैं।

राजेन्द्र बाला घोष को हिंदी की प्रथम महिला कथाकार होने का गौरव प्राप्त है।

राजेन्द्र बाला घोष आचार्य रामचन्द्र शुक्ल की प्रेरणा से हिंदी में लेखन प्रारंभ की।

इनकी प्रसिद्धि दुलाईवाली कहानी से अत्यधिक हुई।

‘दुलाईवाली’ हिंदी की पहली मौलिक कहानी मानी जाती है। जिसका प्रकाशन 1907 ई. में ‘सरस्वती पत्रिका’ में हुआ था।  

राजेन्द्र बाला घोष (बंग महिला) का जन्म सन् 1882 ई. में मिरजापुर नगर के बरियाघाट में हुआ।

राजेन्द्र बाला की माता का नाम नीरदवासिनी घोष तथा इनके पिता का नाम रामप्रसन्न घोष है।

‘चंद्रदेव से मेरी बातें’ कहानी की पृष्ठभूमि

प्रकाशनः सरस्वती पत्रिका (1904 .), निबंध के रूप में।

पत्रात्मक शैली में लिखी कहानी।

भवदेव पांडेय इसे हिंदी की पहली राजनीतिक कहानी मानते हैं।

‘चंद्रदेव से मेरी बातें’ कहानी के भीतर वर्णित विषय

पक्षपात

ज्ञान-विज्ञान

कलकत्ता की बात

चिकित्सा

वाहन (चप्पल)

बिजली

एकता का सूत्र

तंत्र विज्ञान

परिवर्तन

कानून आदि।

‘चंद्रदेव से मेरी बातें’ कहानी का सार

उपनिवेशवाद के शिकार भारत में तत्कालीन आर्थिक, राजनीतिक, सामाजिक समस्याओं का वर्णन करते हुए, वायसराय लॉर्ड कर्जन और उनकी व्यवस्था पर करारा व्यंग्य किया गया है।

यह कहानी चंद्रदेव को लिखे गए पत्र के रूप में लिखी गई है जिसमें तत्कालीन गुलाम भारत की व्यवस्था और परिवेश पर व्यंग्य है।

अंग्रेजी सरकार की न्याय व्यवस्था पर व्यंग्य।

रंगभेद एवं पक्षपात का चित्रण।

सरकारी मिशन और कमीशन की उपयोगिता पर प्रश्न चिह्न।

उच्च शिक्षित वर्ग की काठ के पुतलों से तुलना।

भारत की दीन-हीन व्यवस्था को देख लेने का आग्रह चंद्रदेव से।

प्रकृति से छेड़छाड़ पर व्यंग्य किया गया है, उद्धरण के लिए “कलकत्ता आदि को देखकर आपके देवराज सुरेंद्र भी कहेंगे कि हमारी अमरावती तो इसके आगे निरी फीकी-सी जान पड़ती है।”

कलकत्ता विश्वविद्यालय के विद्वानों पर भी व्यंग्य।

‘चंद्रदेव से मेरी बातें’ कहानी के पात्र और स्मरणीय तथ्य

‘चंद्रदेव से मेरी बातें’ कहानी के पात्र और स्मरणीय तथ्य निम्नानुसार हैं :

‘चंद्रदेव से मेरी बातें’ कहानी के पात्र  

भगवान चंद्रदेव, लेखिका (कथानायिका), धन्वन्तरी (फैमिली डॉक्टर), चित्रगुप्त (देवताओं के चीफ जस्टिस), लार्ड कर्जन।

‘चंद्रदेव से मेरी बातें’ कहानी के स्मरणीय तथ्य

 कहानी में लेखिका भगवान चंद्रदेव को प्रणाम करती हैं।

 चन्द्रदेव को ढेर दिन के पुराने कहते हुए ‘बूढ़ा’ कहा गया है।

 चंद्रदेव को कहानी में अमर बताया गया है।

इसमें अंग्रेज वायसराय लार्ड कर्जन (कजइन) की चर्चा है, जिसे आधुनिक भारत ‘प्रभु’ कह कर संबोधित किया गया है।

इसमें तत्कालीन समय के सामाजिक, राजनीतिक तथा आर्थिक समस्याओं का चित्रण किया गया है।

इस कथा में देश की बदहाल आर्थिक दशा और देश में फैली बेरोजगारी एवं नारी के साथ अमानवीय व्यवहार का भी वर्णन है।

पदोन्नति के लिए सिफारिश और चाटुकारिता का वर्णन इस कहानी में है।

चंद्रदेव से मेरी बातें एक पत्रात्मक शैली में रचित कहानी है, जिस पर शिवशम्भू के चिट्ठे का प्रभाव देखा जा सकता है।

कहानी में चंद्रदेव के गौर वर्ण पर कालिमा के लिए कई उपमाएँ आयीं है

जैसे-कलंकी, शशांक, शशधर, शशलांघन।

कहानी में देवताओं के फैमिली डॉक्टर ‘धन्वन्तरि’ और देवताओं के चीफ जस्टिस ‘चित्रगुप्त’ की चर्चा है।

‘चंद्रदेव से मेरी बातें’ कहानी के मुख्य वक्तव्य और उद्धरण

भगवान चंद्रदेव! आपके कमलवत-कोमलकांत चरणों में इस दासी का अनेक बार प्रणाम !

क्या आपके डिपार्टमेंट (महकमे) में ट्रांसफ़र (बदली) होने का नियम नहीं है? क्या आपकी गवर्नमेंट ‘पेंशन’ भी नहीं देती?

क्षमा कीजिए, क्षमा कीजिए आप तो अमर हैं, आपको मृत्यु कहाँ?

देवता भी अपनी जाति के कैसे पक्षपाती होते हैं। देखो न ‘चंद्रदेव’ को अमृत देकर उन्होंने अमर कर दिया।

यदि आपको अंग्रेज जाति की सेवा करना स्वीकार हो तो एक ‘एप्लीकेशन’ (निवेदन पत्र) हमारे आधुनिक भारत प्रभु लार्ड कर्जन (कजइन) के पास भेज देवें।

आप अधम भारतवासियों की भाँति कृष्णांग तो हैं ही नहीं जो आपको अच्छी नौकरी देने में उनकी गौरांग जाति कुपित हो उठेगी।

क्योंकि उनको कमीशन और मिशन, दोनों ही, अत्यंत प्रिय हैं।

आपके चंद्रलोक में जो रीति और नीति, सृष्टि के आदिकाल में प्रचलित थे वे ही अब भी हैं। पर यहाँ तो इतना परिवर्तन हो गया है कि भूत और वर्तमान में आकाश पाताल का-सा अंतर हो गया है।

आधुनिक भारत संतान लड़कपन से ही चश्मा धारण करने लगी है।

हमारे यहाँ के उच्च शिक्षा प्राप्त युवा, काठ के पुतलों की भाँति मुँह ताकते रह जाते हैं। आपके देवलोक में जितने देवता हैं उनके वाहन भी उतने हैं-किसी का गज, किसी का हंस, किसी का बैल, किसी का चूहा।

अब भारत में न तो आपके और न आपके स्वामी भुवन भास्कर सूर्य महाशय ही के वंशधरों का साम्राज्य हैं और न अब भारत की वह शस्य श्यामला स्वर्णप्रसूता मूर्ति ही है। अब तो आप लोगों के अज्ञात एक अन्य द्वीपवासी परम शक्तिमान गौरांग महाप्रभु इस सुविशाल भारत वर्ष का राज्य-वैभव भोग रहे हैं।

“भगवान चंद्रदेव! क्षमा कीजिए, आप तो अमर हैं; आपको मृत्यु कहाँ? तब परलोक बनाना कैसा? ओ हो! देवता भी अपनी जाति के कैसे पक्षपाती होते हैं। देखो न ‘चंद्रदेव’ को अमृत देकर उन्होंने अमर कर दिया तब यदि मनुष्य होकर हमारे अंग्रेज अपने जातिवालों का पक्षपात करें तो आश्चर्य ही क्या है? अच्छा, यदि आपको अंग्रेज जाति की सेवा करना स्वीकार हो तो, एक ‘एप्लिकेशन’ (निवेदन पत्र) हमारे आधुनिक भारत प्रभु लार्ड कर्जन के पास भेज देवें।”

“आशा है कि आपको आंदरपूर्वक अवश्य आह्वान करेंगे। क्योंकि आप अधम भारतवासियों के भाँति कृष्णांग तो हैं नहीं, जो आपको अच्छी नौकरी देने में उनकी गौरांग जाति कुपित हो उठेगी।”

“मैं विश्वास करती हैं. कि जब लार्ड कर्जन हमारे भारत के स्थायी भाग्यविधाता बन के आवेंगे, तब आपको किसी कमीशन का मेम्बर नहीं तो किसी मिशन में भरती करके वे अवश्य ही भेजे देवेंगे क्योंकि लार्ड कर्जन को कमिशन और मिशन, दोनों ही अत्यंत प्रिय हैं।”

“मैं अनुमान करती हैं कि आपके नेत्रों की ज्योति भी कुछ अवश्य ही मंद पड़ गई होगी। क्योंकि आधुनिक भारत संतान लड़कपन से ही चश्मा धारण करने लगी है; इस कारण आप हमारे दीन, हीन, क्षीणप्रभ भारत को उतनी दूर से भलीभाँति न देख सकते होंगे।”

“जिस व्योमवासिनी विद्युत देवी को स्पर्श तक करने का किसी व्यक्ति को साहस नहीं हो सकता, वही आज पराये घर में आश्रिता नारियों की भाँति ऐसे दबाव में पड़ी है, कि वह चूं तक नहीं कर सकती। क्या करें? बेचारी के भाग्य में विधाता ने दास-वृत्ति ही लिखी थी।”

स्त्रियों की दशा का वर्णन

“अब भारत में न तो आपके, और न आपके स्वामी भुवनभास्कर सूर्य महाशय के ही वंशधरों का साम्राज्य है और न अब भारत की वह शस्यश्यामला स्वर्ण प्रसूतामूर्ति ही है। अब तो आप लोगों के अज्ञात, एक अन्य द्वीप-वासी परम शक्तिमान गौरांग महाप्रभु इस सुविशाल भारत-वर्ष का राज्य वैभव भोग रहे हैं। अब तक मैंने जिन बातों का वर्णन आपसे स्थूल रूप में किया वह सब इन्हीं विद्या विशारद गौरांग प्रभुओं के कृपा कटाक्ष का परिणाम है। यों तो यहाँ प्रति वर्ष पदवी दान के समय कितने ही राज्य विहीन राजाओं की सृष्टि हुआ करती है, पर आपके वंशधारों में जो दो चार राजा महाराजा नाम-मात्र के हैं भी, वे काठ के पुतलों की भाँति हैं। जैसे उन्हें उनके रक्षक नचाते हैं, वैसे ही वे नाचते हैं। वे इतनी भी जानकारी नहीं रखते कि उनके राज्य में क्या हो रहा है- उनकी प्रजा दुखी है, या सुखी?”

देशी राजाओं की रीढ़विहीनता का वर्णन

“हरिपदोभ्दवा त्रैलोक्यपावनी सुरसरी के भी खोटे दिन आए हैं, वह भी अब स्थान-स्थान में बंधन ग्रस्त हो रही है। उसके वक्षस्थल पर जहाँ-तहाँ मोटे वृहदाकार खंभ गाड़ दिये गये हैं।”

गंगा पर बन रहे पुलों और बांधों के माध्यम से आधुनिक विकास की आलोचना

“कलकत्ता आदि को देखकर आपके देवराज सुरेंद्र भी कहेंगे कि हमारी अमरावती तो इसके आगे निरी फीकी सी जान पड़ती है। वहाँ का ईडन गार्डन तो पारिजात परिशोभित नंदन कानन को भी मात दे रहा है।”

प्रकृति से छेड़छाड़ पर व्यंग्य

“भम्रण करने को आएँ तो  अपने ‘फैमिली डॉक्टर’ धन्वन्तरि महाशय को और देवताओं के ‘चीफ जस्टिस’ चित्रगुप्तजी को साथ अवश्य लेते आएँ। आशा है कि धन्वन्तरि महाशय यहाँ के अंग्रेज़ी डॉक्टरों के सन्निकट चिकित्सा संबंधी बहुत कुछ शिक्षा लाभ कर सकेंगे यहाँ के ‘इंडियन पीनल कोड’ की धाराओं को देख कर चित्रगुप्त जी महाराज अपने यहाँ की दंडविधि (कानून) को बहुत कुछ सुध सकते हैं।”

अंग्रेज़ी डॉक्टरों और ब्रिटिश न्याय व्यवस्था पर व्यंग्य

‘चंद्रदेव से मेरी बातें’ कहानी के बारे में विद्वानों की राय

गोपाल राय के अनुसार- “चंद्रदेव से मेरी बातें में समकालीन वायसराय लार्ड कर्जन के प्रशासन पर करारा व्यंग्य है।”

भवदेव पाण्डेय के अनुसार – “बंगमहिला की पहली कहानी ‘चंद्रदेव से मेरी बातें’, सरस्वती, 1904 में प्रकाशित हिंदी साहित्य की पहली कहानी थी, जिसने अपने समय की ‘राजनीति और अर्थनीति’ को केन्द्रीय कथ्य बनाया। यह हिंदी की पहली राजनीतिक कहानी थी। इस कहानी में भारत की बदहाल आर्थिक दशा और देश में फैली बेरोजगारी के चित्रण के साथ-साथ समाज में नारियों की स्थिति, जातिगत पक्षधरता और हर क्षेत्र में वृद्ध पीढ़ी के अनुचित दबदबे का रेखांकन है।

लक्ष्मीसागर वैष्णवी जी ने अपने निबंध ‘नवनीत’ में लिखा है- “चंद्रदेव से मेरी बातें ‘कहानी’ नहीं एक निबंध है।”

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