बंग महिला का जन्म: 1882 ई. में हुआ था ।
इनका पूरा नाम राजेन्द्र बाला घोष है ।
ये आरंभिक दौर की महिला कथाकारों में प्रमुख हैं ।
इनकी पुस्तक ‘कुसुम संग्रह’ का संपादन आचार्य रामचंद्र शुक्ल द्वारा किया गया।
दुलाईवाली कहानी का प्रकाशन 1907 ई. में सरस्वती पत्रिका में हुआ था।
‘कुंभ में छोटी बहू’ (1906 ई.), भाई बहन (1908 ई.), दालिया (1909 ई.), ‘हृदय परीक्षा’ इनकी प्रमुख कहानियाँ हैं।
दुलाईवाली कहानी का कथासार
यह नवल किशोर द्वारा अपने मित्र वंशीधर से रेल में किए गए मजाक की रोचक कहानी है।
वंशीधर इलाहाबाद के रहने वाले हैं। बनारस में ससुराल है।
इसमें काशी/बनारस के लोगों के जीवन पर प्रकाश डाला गया है ।
इस कहानी में बनारसी शौक और बोली का समावेश है ।
इसमें विभिन्न परिस्थितियों में इंसान की दिनचर्या का चित्रण किया गया है ।
इस कहानी में काशी से इलाहाबाद की यात्रा का विवरण है।
इसमें दो मित्रों के हँसी-मजाक एवं व्यवहार का चित्रण किया गया है ।
दोनों में गहरी मित्रता, दोनों एक जान दो जिस्म।
दुलाईवाली कहानी के पात्र
इस कहानी के पात्रों को हम मुख्य पात्र और गौण पात्रों में विभाजित कर सकते हैं ।
मुख्य पात्र
वंशीधरः जानकी के पति
नवलकिशोर के मित्र, नवलकिशोर के लिये अगाध स्नेह।
नवलकिशोर : वंशीधर के घनिष्ठ मित्र।
विनोदप्रिय, खूब हँसी-मजाक करने वाले।
कलकत्ते से नई बहू को लेकर चले थे और वंशीधर को तार भेजा था कि उन्हें ट्रेन में मिले।
कट्टर स्वदेशी थे।
जानकी: वंशीधर की पत्नी
उन्हें नवलकिशोर का हँसी-मज़ाक पंसद नहीं था।
हालाँकि उनमें नवलकिशोर के प्रति कोई दुराग्रह नहीं था।
पारंपरिक भारतीय नारी थीं। ससुराल से विदा होने पर रोने जैसे संस्कार इनमें विद्यमान थे।
गौण पात्र
नवलकिशोर की बहू
सीताः जानकी देई की बहन
कहारिनः जानकी के मायके में नौकरानी
ट्रेन में 2-3 महिला सहयात्री
दुलाईवाली कहानी में वर्णित स्थानों के नाम
दशाश्वमेध घाट
गोदौलिया (बनारस) कलकत्ता
मुगलसराय
इलाहाबाद पैयाग (प्रयाग)
दुलाईवाली कहानी के विशेष उल्लेखनीय तथ्य
दुलाई-अर्थात् एक प्रकार का चादर/चुनरी जिसे घूँघट के रूप में प्रयुक्त किया जाता है।
देशकाल, परिस्थितियों और वातावरण का यथार्थ चित्रण, पात्रानुकूल भाषा और स्थानीयता के रंगों से भरी यह कहानी आज भी जीवंत है।
बनारसी बोली के संवाद (ट्रेन में औरतों के संवाद) कहानी की मिठास बढ़ा देते हैं।
दुलाईवाली कहानी के प्रमुख उद्धरण और कथन
“जब हम तुम्हें विदा कराने आए ही हैं तब कल के बदले आज ही सही।”
“छूछे को कौन पूछे ?”
“इस अस्थिर संसार में स्थिरता कहाँ?”
“नाहक विलायती चीज़ें मोल लेकर क्यों रुपए की बरबादी की जाए? देशी लेने से भी दाम लगेगा सही; रहेगा तो देश ही में।”
“अरे इनकर मनई तो नाहीं आईलेन। हो देख हो रोवल करथईन।”
“देखने में तो यह भले घर की मालूम होती है, पर आचरण इसका अच्छा नहीं।”
“हँसी में किसी के प्राण भी निकल जाएँ तो भी इन्हें दया न आवे।”
“पैयाग जी, जाहाँ मनई मकर नाहाए जाला।”
पहली, “उ मेहरुवा बड़ी उजबक रहला। भला केहू के चिल्लाये से रेलीऔ कहूँ खड़ी होला?”
उस गाड़ी में एक लाठीवाला भी था, उसने खुल्लमखुल्ला कहा, “का बाबू जी! कुछ हमरो साझा?”
वह बुढ़िया, जिसे उन्होंने रखवाली के लिये रख छोड़ा था, किसी बहाने से भाग गयी।
“तू ही उन स्त्रियों को कहीं ले गयी है,” इतना कहना था कि दुलाई से मुँह खोलकर नवलकिशोर खिलखिला उठे।
“दुलाई की बिसात ही कितनी?”
“अरे तुम क्या जानो, इन लोगों की हँसी ऐसी ही होती है। हँसी में किसी के प्राण भी निकल जाएँ तो भी इन्हें दया न आवे।”
खैर, दोनों मित्र अपनी-अपनी घरवाली को लेकर राजी-खुशी घर पहुँचे और मुझे भी उनकी यह राम-कहानी लिखने से छुट्टी मिली।
दुलाईवाली कहानी के स्मरणीय तथ्य
पात्र–वंशीधर, नवलकिशोर, जानकी देई, सीता, वंशीधर की सास, साला, साली।
दुलाई का अर्थ है, कपड़े का मोटा चादर जिसे नवविवाहिता औरतें घूँघट लेती हैं।
दुलाईवाली कहानी की शुरूआत दशाश्वमेध घाट (काशी) से होती है।
इस कहानी का प्रकाशन 1907 ई. को ‘सरस्वती पत्रिका‘, भाग-8, संख्या-5 में हुआ था।
दुलाईवाली हिंदी की प्रथम मौलिक कहानी मानी जाती है।
इस कहानी में मौलिकता और कल्पनाशीलता का अनोखा वर्णन है।
पहली बार इसी कहानी में आंचलिक भाषा का प्रयोग किया गया है। इस लिहाज से इसे पहली आंचलिक कहानी भी कहा जा सकता है।
कहानी में नवलकिशोर, वंशीधर का मित्र और ममेरा भाई है।
जानकी देई, वंशीधर की पत्नी और सीता, जानकी देई की बहन तथा वंशीधर की साली है।
कहानी का मुख्यपात्र वंशीधर, इलाहाबाद का रहने वाला है।
वंशीधर इलाहाबाद के रहने वाले हैं। बनारस में ससुराल है।
नवलकिशोर का ससुराल कलकत्ता में है।
नवलकिशोर इनके दूर के नाते में ममेरे भाई हैं।
वंशीधर के ससुराल में साले, साली और सास के अलावा कोई नहीं हैं।
कहानी में वंशीधर ससुराल पत्नी को लेने आता है।
वंशीधर डेढ़ रुपया पालकी का किराया सुन इक्का से ही जाना मुनासिब समझता है।
वंशीधर भूलवश देशी धोती न पहन विलायती धोती पहन कर जाता है।
वंशीधर ड्योढ़े का टिकट ले, भीड़ की वजह से तीसरे दर्जे में जाकर बैठता है और पत्नी को जनानी डब्बा में बैठाता है।
मिरजापुर में वंशीधर पूड़ी और मिठाईयाँ खाता है।
नवलकिशोर और वंशीधर एक-दूसरे को मुगलसराय में मिलने की बात कही थी, पर दोनों नहीं मिल पाते हैं।
मिरजापुर में वंशीधर के कमरे में पास वाली जगह में एक भले घर की स्त्री बैठी थी। वह बेचारी सिर से पैर तक ओढ़े, सिर झुकाए, एक हाथ लंबा घूँघट काढ़े, कपड़े की गठरी-सी बनी बैठी थी।
पिछली सीट में केवल एक स्त्री, जो फरासीसी छींट की दुलाई ओढ़े अकेली बैठी थी, कुछ नहीं बोली। कभी-कभी घूँघट के भीतर से एक आँख निकालकर वंशीधर की ओर ताक देती थी और सामना हो जाने पर फिर मुँह फेर लेती थी। वंशीधर सोचने लगे कि यह क्या बात है? देखने में तो यह भले घर की मालूम होती है, पर आचरण इसका अच्छा नहीं।
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