आलोचना का अर्थ, परिभाषा, स्वरूप और प्रकार | alochana ka arth, paribhasha, swarup aur prakar

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alochana ka arth, paribhasha, swarup aur prakar

आलोचना शब्द का प्रयोग किसी कृति के गुण-दोषों के विवेचन के लिए किया जाता है। सामान्यतः आलोचना का अर्थ लोग दोषदर्शन से ही लेते हैं, किन्तु आलोचना के व्युत्पत्तिपरक अर्थ पर विचार करने से यह स्पष्ट हो जाता है कि आलोचना का अभिप्राय गुण-दोष दोनों पर प्रकाश डालना है। आलोचना को समालोचना अथवा समीक्षा भी कहते हैं। आलोचना का व्युत्पत्तिपरक अर्थ आलोचना शब्द की व्युत्पत्ति ‘लोच’ धातु में ‘अन्’ प्रत्यय लगाकर और ‘आ’ उपसर्ग जोड़ने से होती है जिसे स्त्रीलिंग बनाने के लिए पुनः ‘आ’ प्रत्यय जोड़ दिया जाता है। इसकी व्युत्पत्ति निम्न प्रकार की हुई है : “आ समन्तात् लोचनम् अवलोकनम् इति आलोचनं स्त्रियां आलोचना।”  ‘आ’ का अर्थ है ‘चारों ओर’ और लोचन का अर्थ है ‘देखना’। अतः आलोचना का शाब्दिक अर्थ हुआ – सब ओर देखना।  दूसरे शब्दों में किसी साहित्यिक रचना की सम्यक् परीक्षा करना, उसके गुण-दोषों का उद्घाटन करना, आलोचना है। अंग्रेजी में आलोचना का पर्यायवाची … Read more

अनुसंधान का अर्थ, स्वरूप और विशेषताएं | Anusandhan Ka Arth, Swarup Aur Visheshtaen

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anusandhan ka arth, awarup aur visheshtaen

अनुसंधान’ के लिए अनेक पर्यायवाची शब्दों का प्रयोग किया जाता, जिनमें ‘अन्वेषण’ और ‘शोध’ प्रमुख हैं । अँग्रेजी में ‘रिसर्च’ शब्द का प्रयोग किया गया है, जिसका अर्थ ‘अन्वेषण’ है ।   (अन्वेषण = खोजना, ढूँढ़ना)   अनुसंधान क्या है ? वस्तुतः अनुसंधान की परिभाषा में यह अर्थ है कि जो संधान (संधान का अर्थ है दिशा) के लिए हो, जिसमें खोजना और प्रमाणित करना हो । ‘शोध’ शब्द का प्रयोग अब ‘रिसर्च’ के अर्थ में होने लगा है । जब किसी भी साहित्य या विज्ञान या समाज विज्ञान के सृजनात्मक स्वरूप का मूल्याँकन होता है और नई व्याख्या की जाती है तब उसे अनुसंधान कहा जाता है । डॉ. हजारीप्रसाद द्विवेदी और डॉ. नगेंद्र ने अनुसंधान को परीक्षण या समीक्षण भी कहा है। डॉ नगेंद्र ने ‘अनुसंधान का स्वरूप’ शीर्षक के अंतर्गत अनुसंधान की परिभाषा करते हुए कहा है – “संधान का अर्थ है दिशा और अनु का अर्थ है पीछे । इस प्रकार अनुसंधान का अर्थ किसी लक्ष्य को सामने रखकर … Read more

टी एस इलियट का वस्तुनिष्ठ समीकरण का सिद्धान्त | t s eliot ka vastunishtha samikaran ka siddhant | eliot ka vastunishtha samikaran ka siddhant

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प्रसिद्ध कवि, नाटककार तथा आलोचक टॉमस स्टार्न्स इलियट (Thomas Stearns Eliot) का जन्म 26 सितंबर, 1888 को सेंट लुई अमेरिका के एक प्रतिष्ठित परिवार में हुआ। टी.एस.इलियट बीसवीं शताब्दी के सर्वाधिक प्रभावशाली समीक्षक हैं, इन्होंने पाश्चात्य समीक्षा को अत्यधिक गहराई से प्रभावित किया। उन्होंने हार्वर्ड विश्वविद्यालय से 1910 ई. में  एम.ए.किया । इसके बाद तर्कशास्त्र, तत्वज्ञान, संस्कृत और पालि चारों विषयों को मिलाकर दर्शनशास्त्र में पी.एच.डी. की उपाधि प्राप्त की । सन् 1948 ई. में उन्हें नोबल पुरस्कार प्राप्त हुआ और 1965 ई.में इनकी मृत्यु हो गई । इलियट के सिद्धांतों  (निर्वैयक्तिकता का सिद्धांत, परंपरा की परिकल्पना का सिद्धांत और वस्तुनिष्ठ समीकरण का सिद्धांत) में उनका ‘वस्तुनिष्ठ समीकरण का सिद्धांत’ (A theory of objective correlative) पाश्चात्य समीक्षा के क्षेत्र में एक महत्त्वपूर्ण देन है। इसे ‘वस्तुनिष्ठ सहसंबंधिता’ या ‘वस्तुनिष्ठ पारस्परिकता’  अथवा ‘वस्तुमूलक प्रतिरूपता’ या ‘मूर्त विधान का सिद्धांत’ इत्यादि विविध नामों से भी जाना जाता है। ‘वस्तुनिष्ठ समीकरण सिद्धांत’ इलियट … Read more

रीति सम्प्रदाय | रीति सिद्धान्त | Riti Sampraday | Riti Siddhant | Acharya Vaman Ka Riti Sampraday | Bhartiya Kavyashastra

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 रीति सम्प्रदाय के प्रवर्तक आचार्य वामन (8वीं शती) माने जाते हैं। यद्यपि रीति शब्द का काव्य-शास्त्र में प्रयोग आचार्य वामन से पहले भी प्राप्त होता है पर उसका व्यवस्थित स्वरूप और विस्तृत व्याख्या सर्वप्रथम आचार्य वामन ने ही प्रस्तुत की। ‘रीति’ शब्द की व्युत्पत्ति ‘रीङ्’ धातु में ‘ऋन्’ प्रत्यय के योग से हुई है, जिसका अर्थ है-मार्ग, पंथ, गति, शैली आदि। आचार्य वामन ने अपने ग्रन्थ ‘काव्यालंकार सूत्रवृत्ति’ में ‘रीति’ की परिभाषा देते हुए कहा है :  “विशिष्ट पद रचना रीतिः” अर्थात् विशेष प्रकार की पद रचना को रीति कहते  हैं। ‘विशिष्ट’ को स्पष्ट करते हुए वे पुनः कहते हैं : ‘विशेषो गुणात्मा’। अर्थात् यह विशिष्टता ‘गुण’ से आती है, अर्थात् काव्य में गुणात्मक पद रचना को रीति कहते हैं। गुणात्मकता से उनका अभिप्राय ओज, प्रसाद, माधुर्य आदि काव्य गुणों से है। उक्त विवेचन के आधार पर रीति की परिभाषा निम्न  शब्दों में की जा सकती है “प्रसाद, ओज, माधुर्य … Read more

यूनिकोड क्या है | unicode kya hai

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 यूनिकोड unicode एक कंप्यूटर प्रोग्राम है, जो हमारे द्वारा की–बोर्ड से टाइप किए गये प्रत्‍येक अक्षर को एक विशेष कोड या नम्‍बर प्रदान करता है।  हम इंटरनेट पर जो भी लेख हिंदी में लिखा हुआ देखते हैं अथवा इंटरनेट पर जो भी सामग्री हिंदी में उपलब्ध है वह सब यूनिकोड के माध्यम से ही लिखे और टाइप किए जाते हैं। इसका सबसे महत्वपूर्ण लाभ यह है कि सभी प्रकार के सॉफ्टवेयर में अथवा किसी भी भाषा में यूनिकोड का प्रयोग किया जा सकता है।   यूनिकोड  को दुनिया भर के कम्‍प्‍यूटरों में प्रयोग किया जा रहा है। यूनिकोड में टाइप की गई पाठ्य सामग्री या विषयवस्तु को कहीं भी ले जाने पर उसका स्‍वरूप नहीं बदलता है, वह पूरी दुनिया में कहीं भी पढ़ी जा सकती है । इसके लिए प्रत्येक सिस्टम में यूनिकोड सक्रिय (Activate) किया जाना आवश्यक है ।  यूनिकोड से टाइप करने की सुविधा विश्‍व की अधिकांश भाषाओं में उपलब्ध है । भारत … Read more

अंधेरे में कविता का सारांश | andhere men kavita ka saransh | andhere men muktibodh

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गजानन माधव मुक्तिबोध हिंदी-साहित्य में फैंटेसी-शैली के कारण विशेष रूप से प्रसिद्ध हैं । मुक्तिबोध फैंटेसी को काव्य-शिल्प का अनिवार्य अंग मानते थे । ‘अंधेरे में’ फैंटेसी-शैली की एक अद्भुत रचना है। मुक्तिबोध ने फैंटेसी काव्य-शैली को अनुभव की कन्या कहा है । ‘अंधेरे में’ एक स्वप्न-कथा है । मुक्तिबोध की ‘अंधेरे में’ कविता ‘चाँद का मुँह टेढ़ा’ है में संकलित हैं। ‘चाँद का मुँह टेढ़ा है, कविता संग्रह में मुक्तिबोध की 28 कविताएं संगृहीत हैं। जिनमें ‘अंधेरे में’ सर्वाधिक चर्चित एवं प्रभावशाली कविता है। ‘अंधेरे में’ कविता कल्पना पत्रिका में सन् 1964में ‘आशंका के द्वीप : अंधेरे’ में शीर्षक से प्रकाशित हुई थी। ‘अंधेरे में’ कविता कवि  की प्रतिनिधि कविता है और इसकी रचना 1957 से लेकर 1962 तक हुई थी। ‘अंधेरे में’ कविता मुक्तिबोध की सबसे लंबी कविता के रूप में भी जानी जाती है। शमशेर बहादुर सिंह ने कहा है, “अंधेरे में कविता देश के आधुनिक जन … Read more

ध्वनि सम्प्रदाय | ध्वनि सिद्धांत Dhwani Sampraday| Dhwani Siddhant | Acharya Anandvardhan | Bhartiya Kavyashastra

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भारतीय काव्यशास्त्र में ध्वनि सम्प्रदाय का महत्वपूर्ण स्थान है। ध्वनि-सिद्धान्त को व्यवस्थित करने का श्रेय आचार्य आनन्दवर्धन को है जिन्होंने अपने ग्रन्थ ‘ध्वन्यालोक’ में ध्वनि सिद्धान्त की स्थापना की। ध्वनि सिद्धान्त से पहले काव्यशास्त्र में तीन महत्वपूर्ण सिद्धान्त अलंकार, रस और रीति का प्रवर्तन हो चुका था। अतः ध्वनि सिद्धान्त के अन्तर्गत प्रबल एवं पुष्ट तर्कों के आधार पर ध्वनि को काव्य की आत्मा स्वीकार करते हुए उक्त सभी सिद्धान्तों का पुनः मूल्यांकन किया गया। ध्वनि-सिद्धांत का आधार वैयाकरण का स्फोटवाद है।काव्यशास्त्रियों ने ध्वनि शब्द वैयाकरणों से लिया है। ध्वनि काव्य का संबंध व्यंजना शब्दशक्ति से है। व्यंजना का अर्थ है – स्पष्ट करना, खोलना या विकसित करना।   स्फोट के 2 अर्थ हैं –1. जिससे अर्थ स्फुटित (व्यक्त) हो 2. जो वर्णों द्वारा स्फुटित (प्रकाशित अथवा व्यक्त) हो। स्फोट व्यंग्य भी है। इस स्फोट को ही ध्वनि कहा गया है।    शब्द शक्ति :शब्द और अर्थ के संबंध को … Read more

हिंदी साहित्य के इतिहास लेखन की परम्परा | Hindi Sahitya Ke Itihas Lekhan Ki Parampara

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हिंदी भाषा एवं साहित्य का प्रारम्भ मोटे तौर पर 1000 ई. के आस-पास माना जाता है। तथापि हिंदी साहित्य के इतिहास लेखन का वास्तविक सूत्रपात 19 वीं शताब्दी से माना जाता है। यद्यपि मध्यकाल में रचित वार्ता साहित्य यथा-चौरासी वैष्णवन की वार्ता (गोसाई गोकुलनाथ-ब्रजभाषा),  दो सौ बावन वैष्णवन की वार्ता (गोसाई गोकुलनाथ-ब्रजभाषा)), भक्तमाल (नाभादास) आदि में अनेक कवियों के व्यक्तित्व  एवं कृतित्व का परिचय मिल जाता है, किन्तु इतिहास-लेखन के लिए जो कालक्रमानुसार वर्णन अपेक्षित होता है, उसका नितांत अभाव इन वार्ता ग्रन्थों में है, अतः इन्हें साहित्य का इतिहास-ग्रंथ नहीं माना जा सकता। हिंदी साहित्य के इतिहास लेखकों में जो उल्लेखनीय हैं, उनका क्रमानुसार संक्षिप्त विवरण निम्नानुसार है: गार्सा-द-तासी  हिंदी साहित्य के इतिहास लेखन की परम्परा का सूत्रपात भी किसी हिंदी भाषी व्यक्ति द्वारा न होकर फ्रेंच विद्वान् ‘गार्सा-द-तासी’ द्वारा रचित ‘इस्त्वार द ला लितरेत्युर ऐन्दुई ए ऐन्दुस्तानी’ नामक ग्रंथ से हुआ, जिसकी रचना दो भागों में की गयी है। … Read more

राम की शक्ति पूजा की व्याख्या भाग-3 | Ram ki Shaktipuja ki Vyakhya | Part-3

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  भाग-3 लौटे युग दल। राक्षस-पद-तल पृथ्वी टलमल, बिंध महोल्लास से बार-बार आकाश विकल। वानर-वाहिनी खिन्न, लख निज-पति-चरण-चिन्ह  चल रही शिविर की ओर स्थविर-दल ज्यों विभिन्न,  प्रशमित है वातावरण, नमित-मुख सान्ध्यकमल लक्ष्मण चिन्ता-पल पीछे वानर-वीर सकल, रघुनायक आगे अवनी पर नवनीत-चरण,  श्लथ धनु-गुण है, कटि-बन्ध स्रस्त-तूणीर-धरण,  दृढ़ जटा-मुकुट हो विपर्यस्त प्रतिलट से खुल  फैला पृष्ठ पर, बाहुओं पर, वक्ष पर, विपुल  उतरा ज्यों दुर्गम पर्वत पर नैशान्धकार,  चमकती दूर तारायें ज्यों हों कहीं पार। सन्दर्भ – प्रस्तुत पंक्तियां छायावादी कवि सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला‘ द्वारा रचित ‘राम की शक्ति पूजा‘ से ली गई हैं। मूल रूप से यह कविता उनके काव्य संग्रह ‘अनामिका‘ में संकलित है।  प्रसंग – सूर्यास्त हो जाने पर आज का युद्ध स्थगित हो गया। राक्षसों एवं वानरों की सेनाएं अपने-अपने शिविर की ओर लौट रही हैं। वानर सेना में हताशा है, जबकि राक्षसों का पलड़ा भारी रहने के कारण राक्षस सेना में उत्साह है। राम के हृदय में निराशा … Read more

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