शोध के लिए ‘सिनोप्सिस’ (रूपरेखा) कैसे तैयार करें | Shodh Ke Lie Synopsis Kaise taiyar Karen

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आज जो तथ्य, विषय अज्ञात है, उसे जानना ही अनुसंधान है। अनुसंधान कार्य करने से पहले सर्वप्रथम विषय का चुनाव करना होता है।अनुसंधान-प्रक्रिया का दूसरा सोपान निर्देशक का चुनाव है । उनके बिना अनुसंधान-कार्य की कल्पना करना असंभव है । अनुसंधान-प्रक्रिया में विषय का चुनाव कर लेने के बाद अगले पड़ाव अथवा लक्ष्य के रूप में ‘रूपरेखा’ तैयार करने का कार्य करना होता है । इसे अँग्रेजी में ‘सिनोप्सिस’ कहते हैं, जिसे तैयार करना सर्वाधिक महत्वपूर्ण कार्य होता है । अनुसंधान की सफलता का पहला चरण है, रूपरेखा तैयार करना । आज हम shodh ke lie synopsis kaise taiyar karen विषय का विस्तृत विवेचन करेंगे और इसे विस्तार से समझने का प्रयास करेंगे । ‘रूपरेखा’ या ‘प्रारूप’ शोधकार्य का बीज है, जिसका सम्पूर्ण विकास शोध-प्रबंध के विस्तृत वटवृक्ष के रूप में होता है । यह प्रबंध को मूर्त रूप देता है । दूसरे शब्दों में यह कहा जा सकता है कि शोध-विषय का क्रमिक अर्थात् अध्यायों, … Read more

आचार्य रामचन्द्र शुक्ल की आलोचना दृष्टि | Acharya Ramchandra Shukla Ki Alochana Drishti

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‘हिंदी साहित्य का इतिहास’ में ‘गद्य साहित्य का प्रसार’ के द्वितीय उत्थान (संवत् 1950-1975) के अंतर्गत समालोचना पर विचार करते हुए शुक्लजी ने लिखा है, ‘पर यह सब आलोचना बहिरंग बातों तक ही रही। भाषा के गुण-दोष, रस, अलंकार आदि की समीचीनता इन्हीं सब परम्परागत विषयों तक पहुँची। स्थायी साहित्य में परिगणित होने वाली समालोचना जिसमें कवि की अंतर्वृत्ति का सूक्ष्म व्यवच्छेद होता है, उसकी मानसिक प्रवृत्ति की विशेषताएँ दिखाई जाती हैं, बहुत कम दिखाई पड़ी।’  आचार्य रामचन्द्र शुक्ल  Acharya Ramchandra Shukla हिंदी आलोचना के युग-पुरुष हैं। आइए अब हम acharya ramchandra shukla ki alochana drishti का विस्तृत विवेचन करें । आगे गद्य साहित्य के तृतीय उत्थान के अंतर्गत समालोचना के विकास पर लिखते हुए उन्होंने कवियों की ‘अंतःप्रवृत्ति की छानबीन’ की बात फिर की है। शिष्टता और विनम्रता के नाते उन्होंने यह नहीं लिखा कि ‘ऐसी आलोचना मैंने की है।’ उन्होंने उत्तम पुरुष का प्रयोग बचाते हुए अपने विषय … Read more

हिंदी आलोचना का उद्भव और विकास | Hindi Alochana ka Udbhav aur Vikas

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हिंदी में ‘आलोचना’ शब्द अंग्रेजी के ‘क्रिटिसिज़्म’ (Criticism) का पर्याय है जिसका अर्थ है ‘मूल्यांकन’ अथवा ‘निर्णय करना’। अर्थात् किसी वस्तु या कृति की सम्यक व्याख्या अथवा मूल्यांकन आदि करना ही आलोचना है । आलोचना को समीक्षा भी कहा जाता है। समीक्षा का अर्थ है ‘सम्यक निरीक्षण’। वस्तुत: पहले सर्जनात्मक साहित्य प्रकाश में आता है तत्पश्चात् उसकी आलोचना की आवश्यकता का अनुभव किया जाता है ।आज हिंदी आलोचना का क्षेत्र-विस्तार हो जाने के परिणामस्वरूप इसके लिए ‘समीक्षा’, ‘आलोचना’, ‘समालोचना’ जैसे शब्दों का भी प्रयोग किया जाता। बाबू गुलाबराय के अनुसार आलोचना का अर्थ है-  “आलोचना का मूल उद्देश्य कवि की कृति का सभी दृष्टिकोणों से आस्वादकर पाठकों को उस प्रकार के      आस्वाद में सहायता देना तथा उनकी रुचि को परिमार्जित करना एवं साहित्य की गति निर्धारित करने में योग देना है |” इस तरह आलोचना, साहित्य कीव्याख्या करती है, उसके गुण-दोष बताती है, उसके निर्माण की दिशा निर्धारित … Read more

‘कामायनी’ का महाकाव्यत्व | Kamayani Ka Mahakavyatva

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‘कामायनी’ (1935 ई.) जयशंकर प्रसाद Kamayani Jaishankar Prasad की महाकाव्यात्मक रचना है । ‘कामायनी’ में कुल पंद्रह सर्ग (ग्रंथ का प्रकरण या अध्याय) हैं, जो क्रमानुसार इस प्रकार हैं : चिंता, आशा, श्रद्धा, काम, वासना, लज्जा, कर्म, ईर्ष्या, इड़ा, स्वप्न, संघर्ष, निर्वेद, दर्शन, रहस्य तथा आनंद। तो आइए अब हम kamayani ka mahakavyatva विषय को विस्तार से समझने का प्राय करते हैं ।   ‘कामायनी’ (1935 ई.) जयशंकर प्रसाद Kamayani Jaishankar Prasad की महाकाव्यात्मक रचना है । ‘कामायनी’ में कुल पंद्रह सर्ग (ग्रंथ का प्रकरण या अध्याय) हैं, जो क्रमानुसार इस प्रकार हैं : चिंता, आशा,  श्रद्धा, काम, वासना, लज्जा, कर्म, ईर्ष्या, इड़ा, स्वप्न, संघर्ष, निर्वेद, दर्शन, रहस्य तथा आनंद। ‘कामायनी’ के मुख्य पात्र हैं – मनु, श्रद्धा, इड़ा और कुमार। जिनमें मनु ‘मन’, श्रद्धा ‘हृदय’, इड़ा ‘बुद्धि’ तथा कुमार ‘मानव’ का प्रतीक हैं । ‘कामायनी’ (Kamayani) की कथावस्तु का आधार ऋग्वेद, छान्दोग्य उपनिषद, शतपथ ब्राह्मण तथा श्रीमद्भगवद है । कामायनी … Read more

हिंदी में अनुच्छेद लेखन | Hindi Men Anuchchhed Lekhan

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विभिन्न परीक्षाओं में हिंदी में अनुच्छेद लेखन लिखने के संबंध में प्रश्न पूछा जाता है । आज के इस लेख में हम अनुच्छेद लेखन के संबंध में अनिवार्य बातों को समझने का प्रयास करेंगे । आइए hindi men anuchchhed lekhan सीखने का प्रयास करें ।  नीचे हिंदी में अनुच्छेद लेखन Hindi Men Anuchchhed Lekhan के कुछ उदाहरण दिए गए हैं, जिसकी सहायता से आप कुछ छोटे-छोटे अनुच्छेद लिख सकते हैं: मेरे जीवन का लक्ष्य मेरे जीवन का लक्ष्य प्रशासनिक अधिकारी बनकर राष्ट्र और समाज की सेवा करना है । इस पुनीत कार्य के लिए लिए वैसे तो बहुत सारे क्षेत्र हैं, परंतु एक प्रशासनिक अधिकारी के पास इस कार्य के लिए एक व्यापक क्षेत्र होता है । मैं आईएएस ऑफिसर बनकर लोगों के जीवन में सकारात्मक बदलाव लाना चाहता  हूँ। मैं समाज में रहकर एक प्रशासनिक अधिकारी के रूप में लोगों की समस्याओं का समाधान करना चाहता हूँ। ग्रामीण और … Read more

भारतेन्दु हरिश्चंद्र की कविता में नवजागरण, समाज सुधार तथा राष्ट्रीय चेतना | Bhartendu Harishchandra Ki Kavita Men Navjagaran, Samaj Sudhar Tatha Rashtreey Chetna

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आधुनिक हिंदी कविता का प्रारंभ उन्नीसवीं सदी में भारतेन्दु हरिश्चंद्र bhartendu harishchandra से माना जाता है। भारतीय नवजागरण और राष्ट्रीयता की चेतना की पृष्ठभूमि भी इसी युग की कविता में प्राप्त होती है । नवजागरण की दृष्टि से देखें तो उसके तीनों प्रमुख तत्व – प्राचीन संस्कृति पर उसकी निर्भरता, ईश्वर की जगह मानव केन्द्रिता और एक जातीय राष्ट्रीय भाषा के रूप में हिंदी खड़ी बोली की स्वीकृति- इस युग की कविता में मिल जाते हैं । भारतेन्दु हरिश्चंद्र bhartendu harishchandra ने नाटक, निबंध, कविता, आदि कई साहित्यिक विधाओं को अपनी रचनात्मक अभिव्यक्ति का माध्यम बनाते हुए और पत्रकारिता द्वारा साहित्य और समाज के संबंधों को नये ढंग से समझने का प्रयास किया ।  आइए अब bhartendu harishchandra ki kavita men navjagaran, samaj sudhar tatha rashtreey chetna पर विचार-विमर्श करें ।  1858 से 1881 तक अर्थात् लार्ड रिपन के शासन शुरू होने तक भारतेन्दु की राजनीतिक समझ इस प्रकार की … Read more

काव्य-प्रयोजन : भारतीय काव्यशास्त्र | Kavya Prayojan : Bhartiya Kavyashastra

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kavya prayojan

संसार की प्रत्येक रचना उद्देश्यपूर्ण है। यहाँ कुछ भी प्रयोजन रहित नहीं होता। काव्य रचना का जीवन और जगत से घनिष्ठ संबंध है। अतः उसके भी कुछ प्रयोजन है। काव्य-रचना में कवि के उद्देश्य ही प्रयोजन के रूप में अभिव्यक्त होते हैं। भारतीय और पाश्चात्य विद्वानों द्वारा काव्य प्रयोजनों पर गंभीरता से विचार किया गया है। आदि आचार्य भरत से लेकर पण्डितराज जगन्नाथ तथा उनके बाद भी काव्य-प्रयोजन पर विचार-विमर्श होता रहा है। आचार्यों ने कवि और पाठक की दृष्टि से काव्य-प्रयोजन पर विचार किया है। काव्य-प्रयोजनों की परिधि बहुत व्यापक है। इसके अंतर्गत मानव जीवन की बाह्य आवश्यकताएँ और अंतरंग भावनाएँ समाहित हैं। आइये अब kavya prayojan के संबंध में विभिन्न विद्वानों के द्वारा व्यक्त किए गए विचारों और उनके दृष्टिकोणों को समझने का प्रयास करते हैं ।  काव्य प्रयोजन (kavya prayojan) के संबंध में संस्कृत आचार्यों के मत  भरतमुनि पंचम वेद के रूप में मान्य अपने ग्रंथ ‘नाट्यशास्त्र’ … Read more

प्रयोजनमूलक हिंदी : प्रयुक्तियां और व्यवहार क्षेत्र | Prayojanmulak Hindi : Prayuktiyan Aur Vyavahar Kshetra

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प्रयोजनमूलक भाषा से तात्पर्य है किसी प्रयोजन विशेष के लिए इस्तेमाल होने वाली भाषा। यों तो भाषा का उद्देशय ही भावों और विचारों की अभिव्यक्ति होता है चाहे वह अभिव्यक्ति मौखिक हो अथवा लिखित लेकिन इस सहज प्रयोजन विशेष के लिए इस्तेमाल की जाने वाली भाषा प्रयोजनों का माध्यम भी बनती है और ऐसे प्रयोजन विशेष के लिए इस्तेमाल की जाने वाली भाषा प्रयोजनमूलक भाषा कहलाती है।   आइए अब Prayojanmulak Hindi : Prayuktiyan Aur Vyavahar Kshetra को विस्तार से समझने का प्रयास करते हैं ।  अब प्रश्न यह है कि वे प्रयोजन कौन से हैं? इसका उत्तर है जीवन के विभिन्न कार्यक्षेत्रों से संबंधित प्रयोजन। दैनंदिन जीवन में हमारी विभिन्न भूमिकाएँ होती हैं और ये भूमिकाएँ हमारे भाषा व्यवहार को भी नियमित करती हैं। उदाहरण के लिए परिवार के सदस्यों अथवा मित्रों के बीच हम जिस तरह की भाषा का प्रयोग करते हैं वैसी भाषा का इस्तेमाल अपने व्यावसायिक सहयोगियों के … Read more

काव्य के लक्षण – भारतीय काव्यशास्त्र | Kavya Ke Lakshan – Bhartiya Kavyashastra

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संस्कृत काव्यशास्त्र में काव्य के स्वरूप पर पर्याप्त विचार-विमर्श हुआ है, जिससे विभिन्न काव्य सम्प्रदायों का विकास हुआ और काव्य के प्रमुख तत्वों की चर्चा करते हुए kavya ke lakshan निर्धारित करने का प्रयास किया गया। विद्वानों में मतभेद होने के कारण काव्य की कोई सर्वमान्य परिभाषा प्रस्तुत करने में वे सफल नहीं हो सके। आचार्यों ने अपने-अपने मत को प्रमुखता देते हुए जो kavya ke lakshan निर्धारित किए हैं, वे सर्वमान्य नहीं कहे जा सकते।  अब हम कालक्रमानुसार संस्कृत आचायों द्वारा दिए गए काव्य लक्षणों पर विचार करने के उपरांत हिंदी के प्रमुख आचार्यों द्वारा निर्दिष्ट काव्य लक्षणों पर विचार करेंगे। इसके बाद  अंग्रेजी के प्रमुख समीक्षकों द्वारा दी गई काव्य की परिभाषाओं का अध्ययन करेंगे। संस्कृत आचार्यों द्वारा निर्दिष्ट काव्य लक्षण Kavya Lakshan आइये सबे पहले संस्कृत के आचार्याओं द्वारा बताए गए kavya ke lakshan का अध्ययन करते हैं । भामह (छठी शताब्दी) भामह ने अपने ग्रंथ ‘काव्यालंकार’ में काव्य की परिभाषा … Read more

‘अज्ञेय’ के उपन्यास ‘शेखर एक जीवनी’ का वस्तु और शिल्प | Agyey Ke Upanyas ‘Shekhar Ek Jivani’ Ka Vastu Aur Shilp

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शेखर एक जीवनी ‘अज्ञेय’  agyey जी की बहुचर्चित औपन्यासिक कृति है जिसके दो भाग प्रकाशित हुए हैं। प्रथम भाग का प्रकाशन सन् 1941 ई. में और द्वितीय भाग का प्रकाशन सन् 1944 ई. में हुआ। यह अज्ञेय की ऐसी औपन्यासिक रचना है जिसे जीवनी प्रधान मनोवैज्ञानिक उपन्यास कहना अधिक उचित है। स्वयं अज्ञेय के अनुसार, “ ‘शेखर एक जीवनी’ एक अधूरी जीवनी है जो घनीभूत वेदना की केवल एक रात में देखे ‘विजन’ को शब्दबद्ध करने का प्रयास है।” आइए अब shekhar ek jivani ka wastu aur shilp को विस्तार से समझने का प्रयास करें ।  इस उपन्यास का तीसरा भाग भी अज्ञेय जी agyey ने लिखा था, पर वे उसमें कुछ संशोधन करना चाहते थे, जो न कर सके, परिणामतः वह छप न सका। क्या शेखर एक जीवनी अज्ञेय की अपनी जीवनी है— इस विषय में अज्ञेय कहते हैं— “फिर कहता हूँ कि आत्मघटित ही आत्मानुभूत नहीं होता, परघटित भी आत्मानुभूत हो सकता है। तथापि मेरी अनुभूति और मेरी वेदना शेखर को अभिसिंचित … Read more

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