नाटक के तत्व | Natak Ke Tatva

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हिंदी नाटक के स्वरूप निर्माण में भारतीय और  पाश्चात्य दोनों ही नाट्य दृष्टियों का योगदान रहा है। अतः भारतीय और पाश्चात्य नाट्य तत्वों की संक्षिप्त जानकारी आवश्यक है। भारतीय नाट्य सिद्धांत संस्कृत के नाटकों के आधार पर निर्मित हुए थे तथा पश्चिमी नाट्य सिद्धांतों का आधार यूनानी नाटक थे। भारतीय आचार्यों ने नाटक के तीन अनिवार्य तत्व माने हैं–वस्तु, नेता और रस। वस्तु का अर्थ है  कथावस्तु, नेता यानी पात्र और रस यानी रचना से उत्पन्न होने वाला प्रभाव या उसकी अनुभूति। अर्थात् रचनाकार द्वारा अनुभूत सत्य की दर्शक अथवा पाठक को प्रतीति अथवा अनुभूति । पाश्चात्य आचार्यों ने नाटक के छह तत्व माने हैं:  कथावस्तु, पात्र, देशकाल, संवाद, शैली और उद्देश्य। इसके अलावा वहाँ संकलन-त्रय यानी नाटक में स्थान, समय और काल की एकता पर भी जोर दिया गया है। पश्चिम में सुखांत (Comedy) और दुखांत (Tragedy) दो तरह के नाटकों का प्रचलन रहा है जो क्रमशः कामदी (Comedy) और … Read more

प्लेटो का आदर्शवाद | Plato ka Adarshvad

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 पाश्चात्य संस्कृति एवं सभ्यता का आदिस्रोत यूनान रहा है। यूनान के दार्शनिकों, विचारकों एवं काव्य-चिन्तकों ने जिन सिद्धान्तों का प्रतिपादन ईसा से चार-पाँच शताब्दियों पूर्व किया था, उन्हीं की अनुगूँज परवर्ती युग में यूरोप के विभिन्न विचारकों की शब्दावली में सुनाई देती है।   यूनान के गौरवशाली चिन्तकों एवं महान् दार्शनिकों में सुकरात के शिष्य प्लेटो (427 ई० प०-347 ई० पू०) का नाम सर्वोपरि है। प्लेटो मूलतः दार्शनिक एवं आचार्य थे। प्लेटो का दृष्टिकोण अपने पूर्ववर्ती दार्शनिकों से सर्वत्र स्वतन्त्र एवं मौलिक दिखाई पड़ता है जिसका प्रकटीकरण उनके द्वारा रचित विभिन्न दार्शनिक एवं राजनीतिक ग्रन्थों में हुआ। उनके द्वारा रचित ग्रन्थों में ‘दि रिपब्लिक‘ (गणराज्य), ‘दि स्टेट्समैन‘ (राजनेता), ‘दि लॉज‘ (विधि) आदि उल्लेखनीय हैं। प्लेटो के दार्शनिक विचार दर्शन का चरम लक्ष्य सत्य या अन्तिम सत्य की खोज करना होता है, पर अन्तिम सत्य के सम्बन्ध में भी दार्शनिकों के मुख्यतः दो वर्ग रहे हैं- एक, जो किसी सूक्ष्म सत्ता या परोक्ष … Read more

हिंदी के लोकनाट्य | Hindi Ke Loknatya

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लोकनाट्य वे नाट्य हैं जो आम जनता द्वारा किसी मिथक रचित एवं प्रदर्शित होते हैं। लोकनाट्यों के कथानक प्रायः लोक प्रचलित होते हैं, जिनमें पौराणिक और ऐतिहासिक और लोक-वार्तागत प्रसंगों का समावेश होता है । लौकिक एवं किवदंतियाँ और काल्पनिक प्रेमकथाएँ भी इन नाट्यों का विषय बनाई जाती हैं । इनका कथानक प्रायः ढीला-ढाला होता है और पूर्वार्द्ध में जिनती विलंबित गति से कथा बढ़ती है उत्तरार्द्ध में उतनी ही द्रुत गति से घटनाएँ आगे बढ़ती हैं । वे लोकनाट्य अधिक सफल होते हैं जिनमें घटनाओं के शिल्प विधान के स्थान पर जीवन की झांकियों की लड़ी होती है। जिनमें पौराणिक एवं धार्मिक कथाओं का पूर्व परिचित दर्शक होता है। लोक रंगमंच के दर्शक कथानक के चमत्कारपूर्ण अंश अथवा घटनाओं के कौतूहलपूर्ण उद्घाटन की आशा नहीं करते। वे प्रायः इससे पहले से ही परिचित रहते हैं । भारत बहुजातीय, बहुसांस्कृतिक, बहुरंगी देश है। अनेक लोक कलाएँ, लोकनाट्य रूप (ज्ञात और … Read more

‘राम की शक्ति पूजा’ की मूल संवेदना या केंद्रीय संवेदना | Ram ki Shaktipuja ki Mul Samvedana | Ram ki Shaktipuja ki Kendriya Samvedana

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 राम की शक्तिपूजा, सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ (Suryakant Tripathi Nirala) द्वारा रचित काव्य है। निराला जी ने इसका सृजन 23 अक्टूबर 1936 को पूर्ण किया था। कहा जाता है कि इलाहाबाद (प्रयागराज) से प्रकाशित दैनिक समाचारपत्र ‘भारत’ में पहली बार 26 अक्टूबर 1936 को उसका प्रकाशन हुआ था। बाद में इसका प्रकाशन निराला के कविता संग्रह ‘अनामिका’ (1938 ई.) में हुआ । तो आइये अब हम ram ki shaktipuja ki mul samvedana समझने का प्रयास करते हैं। यह कविता 312 पंक्तियों की एक ऐसी लम्बी कविता है, जिसमें निराला जी के स्वरचित छंद ‘शक्ति पूजा’ या ‘शक्ति छंद’ का प्रयोग किया गया है। चूँकि यह एक कथात्मक कविता है, इसलिए संश्लिष्ट होने के बावजूद इसकी संरचना अपेक्षाकृत सरल है। इस कविता का कथानक प्राचीन काल से सर्वविख्यात रामकथा के एक अंश से है। इस कविता पर वाल्मीकि रामायण और तुलसी के रामचरितमानस से कहीं अधिक बांग्ला के कृत्तिवास रामायण का प्रभाव देखा जाता है। किन्तु ‘कृत्तिवास रामायण’ और ‘राम की शक्ति … Read more

औचित्य सिद्धान्त | औचित्य सम्प्रदाय | Auchitya Siddhant | Auchitya Sampraday | Bhartiya Kavyashastra

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ईसा की ग्यारहवीं शताब्दी के आरम्भ तक भारतीय काव्य-शास्त्र के क्षेत्र में पाँच प्रमुख सम्प्रदाय रस, अलंकार, रीति, ध्वनि और वक्रोक्ति प्रतिष्ठित हो चुके थे, किन्तु फिर भी काव्य के आधारभूत तत्व के सम्बन्ध में कोई एक सर्वमान्य निर्णय नहीं हो सका। इतना ही नहीं, अनेक सम्प्रदायों की स्थापना के कारण ‘काव्य की आत्मा’ सम्बन्धी। विवाद सुलझाने के स्थान पर और अधिक उलझ गया था- रस, अलंकार, रीति आदि प्रत्येक सम्प्रदाय अपने-अपने मत को प्रमुखता देते थे तथा दूसरे के मत को नीचा दिखाने का प्रयत्न करते थे। ऐसी स्थिति में काव्य के सामान्य अध्येता (अध्ययन करने वाला,पाठक)  के सामने यह समस्या थी कि वह किस मत को माने और किसको नहीं। ठीक इसी समय आचार्य क्षेमेन्द्र ने औचित्य की स्थापना करके इस विवाद को सुलझाने में गहरा योग दिया। उन्होंने कहा कि काव्य में रस, गुण, अलंकार आदि सभी का महत्व है, किन्तु उसी अवस्था में जबकि ये सब … Read more

स्वच्छन्दतावाद क्या है | Swachchhandatavad kya hai | swachchhandatavad | Romanticism kya hai

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‘स्वच्छंदतावाद’ ‘रोमांटिसिज़्म’ का हिंदी अनुवाद है । हिंदी में इस शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग कदाचित् आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने अपने ग्रंथ ‘हिंदी साहित्य का इतिहास’ में पं. श्रीधर पाठक को ‘स्वच्छंदतावाद’ का प्रवर्तक मानते हुए किया है । ‘रोमांटिक’ शब्द को एक काव्य प्रवृत्ति अथवा ‘वाद’ के रूप में सर्वप्रथम प्रयुक्त करने वाले जर्मन आलोचक फ्रेड्रिक श्लेगल थे । इन्होंने 1798-1800 ई. के बीच इस शब्द का प्रयोग ‘क्लासिसिज़्म’ के विरोधी अर्थों में किया ।   इंग्लैंड में स्वच्छन्दतावादी काव्यान्दोलन का मार्ग प्रशस्त करने वाले दो कवि राबर्ट बर्न्स एवं विलियम ब्लेक थे। वस्तुतः अंग्रेजी कविता में स्वच्छन्दतावादी काव्य-आंदोलन का प्रारम्भ विलियम वर्ड्सवर्थ के ‘लिरिकल बैलेड्स’ से हुआ। अंग्रेजी में वर्ड्सवर्थ के बाद कॉलरिज़, शेली, बायरन, कीट्स, सर वाल्टर स्कॉट आदि अनेक स्वच्छन्दतावादी साहित्यकारों द्वारा इस काव्य-आंदोलन का पर्याप्त पल्लवन एवं विकास हुआ ।  विक्टर ह्यूगो ने स्वच्छन्दतावाद को पारिभाषित करते हुए इसे ‘साहित्यिक उदारवादिता’ कहा है। वाल्टर रेले ‘दूरी … Read more

छायावाद | Chhayavad

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छायावाद (1918 ई. से 1936 ई.) | Chhayavad हिंदी साहित्य में ‘छायावाद’ शब्द का प्रथम लिखित प्रयोग मुकुटधर पाण्डेय ने किया। आइये आज हम chhayavad को समझने का प्रयास करते हैं ।   सन् 1920 में जबलपुर से प्रकाशित पत्रिका ‘श्रीशारदा’ में ‘हिंदी में छायावाद’ शीर्षक से चार चरणों में लेख लिखकर छायावाद की आरंभिक विवेचना की।  मुकुटधर पाण्डेय ने अपने लेखों में छायावाद की पाँच विशेषताओं का उल्लेख किया, जो इस प्रकार हैं :  1. वैयक्तिकता, 2. स्वातंत्र्य चेतना,  3. रहस्यवादिता, 4.शैलीगत वैशिष्ट्य,    5. अस्पष्टता सरस्वती पत्रिका, जुलाई 1920 ई. अंक में प्रकाशित मुकुटधर पाण्डेय की कविता ‘कुररी के प्रति’ छायावाद की प्रथम कविता मानी जाती है ।आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने मुकुटधर पाण्डेय को ‘छायावाद का प्रवर्तक’ स्वीकार किया है । मुकुटधर पाण्डेय ने ‘आँसू’, ‘उद्गार’, ‘प्रेमबंधन’, ‘पूजाफूल’, ‘कानन कुसुम’ आदि रचनाएँ लिखी हैं।  हिंदी साहित्य में छायावाद का विकास   हिंदी साहित्य में छायावाद का विकास द्विवेदीयुगीन कविता के उपरान्त हुआ। … Read more

वक्रोक्ति सिद्धान्त | vakrokti siddhant | acharya kuntak ka vakrokti siddhant

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 वक्रोक्ति सम्प्रदाय के प्रवर्तन का श्रेय आचार्य कुन्तक को है। उन्होंने अपने ग्रन्थ ‘वक्रोक्ति जीवित‘ में वक्रोक्ति को काव्य का अनिवार्य तत्व स्वीकार करते हुए इसे काव्य की आत्मा कहा। काव्यशास्त्र में वक्रोक्ति शब्द का प्रयोग कुन्तक से पहले भी उपलब्ध होता है, पर यह उस अर्थ में नहीं मिलता, जिस अर्थ में कुन्तक ने इसका प्रयोग किया है। आइये अब आचार्य  kuntak ka vakrokti siddhant को विस्तार से समझने का प्रयास करते हैं ।  वक्रोक्ति का अर्थ वक्रोक्ति शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है – वक्र + उक्ति । वक्र का अर्थ है— कुटिल या विलक्षण और उक्ति का अर्थ है — कथन । अतः वक्रोक्ति से अभिप्राय है – बांकपन या विलक्षणता से भरा हुआ कथन ।   किसी बात को सामान्य ढंग से व्यक्त करने में सरसता नहीं आती, अतः उसे चमत्कारिक ढंग से या विलक्षणता से कहना ही वक्रोक्ति है। भावों की अभिव्यक्ति के लिए … Read more

राजभाषा हिंदी और अनुवाद का अंतर्संबंध | Rajbhasha Hindi aur Anuvad ka Antarsambandh

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भाषा विचारों के आदान प्रदान का माध्यम होती है । भाषा जितनी सुबोध, सहज, सरल होगी भाव सम्प्रेषण उतना ही सफल और सशक्त होगा । भारतीय भाषाओं की परंपरा में या उनके इतिहास में हिंदी का वही स्थान व महत्व है जो प्राचीन काल में संस्कृत का था। हिंदी करोड़ों लोगों की विचारवाहिनी भाषा है । भारत की आबादी का करीब आधा हिस्सा हिन्दी भाषी है और वह आपसी सम्प्रेषण के लिए हिंदी का प्रयोग करती है । राजभाषा का अर्थ और उसका स्वरूप शासन में कानून बनाने, आदेश निकालने, अध्यादेश जारी करने, प्रतिवेदन, ज्ञापन, सूचना प्रसारित करने, लेखा-जोखा तैयार करने, व्यावसायिक काम करने आदि के लिए जो भाषा अपनाई जाती है वस्तुतः उसी का नाम है राजभाषा । कौटिल्य को भारतीय राजनीति का पितामह माना गया है । उनका ग्रंथ ‘अर्थशास्त्र’ भारत के शासन विधान का आदिग्रंथ है। राजपत्रों और उनकी भाषा के संबंध में कौटिल्य ने अपने ‘अर्थशास्त्र’ … Read more

महादेवी वर्मा की काव्य संवेदना | Mahadevi Verma ki Kavya Samvedana

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महादेवी वर्मा छायावाद की एक प्रतिनिधि हस्ताक्षर हैं । छायावाद का युग उथल-पुथल का युग था । कवि अपने समय के वास्तविक यथार्थ से प्रभावित होकर अपनी रचनाओं में उसकी विशिष्ट प्रवृत्तियों को अभिव्यक्ति देता है और उसकी रचनाएँ ही उस युग विशेष की मूल प्रवृत्ति को रूपायित करती हैं । लेकिन महादेवी जी अपनी काव्य रचना में प्राय: अंतर्मुखी रही रही हैं। अपनी व्यथा वेदना और रहस्य-भावना को ही इन्होंने मुखरित किया है। आइए अब  mahadevi verma ki kavya samvedana को समझने का प्रयास करते हैं ।   उनकी कविता का मुख्य स्वर आध्यात्मिकता ही अधिक दिखाई देता है।  हम यह कह सकते हैं कि महादेवी वर्मा का काव्य प्रासाद इन चार स्तंभों पर अवस्थित है- वेदनानुभूति, रहस्य-भावना, प्रणय-भाव और सौंदर्यानुभूति । महादेवी की काव्य संवेदना के मुख्य तत्व   छायावादी काव्य एक नई संवेदनशीलता का काव्य था । इस युग के कवि विशिष्ट अर्थ में संवेदनशील थे । महादेवी वर्मा … Read more

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