राम की शक्तिपूजा की व्याख्या | भाग 16 | Ram Ki Shakti Puja Ki Vyakhya | Part 16

देखा है महाशक्ति रावण को लिए अंक,

लांछन को ले जैसे शशांक नभ में अशंक ।

हत मंत्र-पूत शर संवृत करती बार-बार,

निष्फल होते लक्ष्य पर क्षिप्र वार पर वार।

विचलित लख कपि दल क्रूद्ध-युद्ध को मैं ज्यों-ज्यों

झक-झक झलकती वह्नि वामा के दृग त्यों-त्यों।

पश्चात् देखने लगीं मुझे बंध गए हस्त,

फिर खिंचा न धनु मुक्त ज्यों बंधा मैं हुआ त्रस्त ।

संदर्भ

प्रस्तुत पंक्तियाँ छायावादी कवि सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ द्वारा रचित ‘राम की शक्ति पूजा’ से ली गई हैं । मूल रूप से यह कविता उनके काव्य संग्रह ‘अनामिका’ में संकलित है ।

प्रसंग

श्री राम ने अपने साथियों को बताया कि आज हुए युद्ध में देवी रावण की सहायता कर रही थीं। वे मेरे द्वारा चलाए गए बाणों को रोक लेती थीं। जब उन्होंने मेरी ओर देखा तो मुझसे धनुष की डोरी खींची नहीं गई और मैं मुक्त होते हुए भी स्वयं को बंधा हुआ सा अनुभव करने लगा।

व्याख्या

राम कहने लगे कि मैंने युद्ध क्षेत्र में देखा है कि वह महाशक्ति रावण को अपनी गोद में उसी तरह बिठाए हुए है जैसे आकाश लांछित चन्द्रमा को निःशंक होकर अपने आश्रय में रखता है। मेरे द्वारा चलाए गए अभिमंत्रित बाणों को वे बार-बार रोक लेती थीं और इसलिए लक्ष्य (रावण) पर चलाए गए मेरे बाण बार-बार निष्फल हो रहे थे।

वानर सेना को रावण के प्रहारों से विचलित देखकर मैं क्रोधित होकर जैसे-जैसे युद्ध में संलग्न होता था कि मुझे उस वामा (देवी) के नेत्रों में आग की ज्वाला धधकती हुई दिखाई पड़ती थी। तत्पश्चात् वे मेरी ओर ऐसी दृष्टि से देखने लगीं कि मेरे हाथ बंध से गए और मैं पूर्णतः मुक्त होने पर भी बंध गया तथा मुझसे धनुष की प्रत्यंचा खींची न जा सकी।

विशेष

(1) ‘लांछन को .. अशंक’ में दृष्टान्त अलंकार ।

(2) ‘क्रुद्ध-युद्ध’ में पदमैत्री।

(3) ‘झक-झक झलकती’ में दृश्य बिम्ब की योजना है।

(4) ‘वामा’ में परिकरांकुर अलंकार है।

(5) ‘पश्चात् .. हस्त’ में विभावना अलंकार।

(6) ‘मुक्त ज्यों बंधा’ में विरोधाभास ।

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