राम की शक्तिपूजा की व्याख्या | भाग 17 | Ram Ki Shakti Puja Ki Vyakhya | Part 17

कह हुए भानुकुलभूषण वहां मौन क्षण भर
बोले विश्वस्त कंठ से जाम्बवान “रघुबर,

विचलित होने का नहीं देखता मैं कारण,

हे पुरुष सिंह तुम भी वह शक्ति करो धारण

आराधन का दृढ़ आराधन से दो उत्तर

तुम वरो विजय संयत प्राणों से प्राणों पर

रावण अशुद्ध होकर भी यदि कर सका त्रस्त,

तो निश्चय तुम हो सिद्ध करोगे उसे ध्वस्त

शक्ति की करो मौलिक कल्पना करो पूजन

 छोड़ दो समर जब तक न सिद्धि हो रघुनंदन।।”

संदर्भ

प्रस्तुत पंक्तियाँ छायावादी कवि सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ द्वारा रचित ‘राम की शक्ति पूजा’ से ली गई हैं । मूल रूप से यह कविता उनके काव्य संग्रह ‘अनामिका’ में संकलित है ।

प्रसंग

राम ने जब अपने साथियों को यह बताया कि देवी रावण की सहायता कर रही है और इसलिए उनके बाण रावण पर प्रहार नहीं कर पा रहे हैं, तो जामवंत ने राम को यह सुझाव दिया कि तुम भी शक्ति की आराधना कर उसे प्रसन्न करो। रावण अशुद्ध होकर यदि शक्ति को अपने वशीभूत कर तुम्हें त्रस्त कर रहा है तो तुम शक्ति पूजा के द्वारा शक्ति को प्रसन्न कर उसे नष्ट कर दोगे। इन पंक्तियों में कवि ने जामवंत के इसी सुझाव का वर्णन किया है।

व्याख्या

राम यह कहकर मौन हो गए कि देवी रावण की सहायता कर रही है, अतः अब हमारी विजय नहीं हो सकती। सूर्यवंश के विभूषण राम के मौन हो जाने के बाद विश्वास भरे स्वर में जामवंत इस प्रकार कहने लगे “हे राम ! मुझे तो विचलित होने का कोई कारण दिखाई नहीं देता। हे वीर पुरुष ! आप भी उस शक्ति को धारण कीजिए अर्थात् शक्ति की आराधना करके देवी को प्रसन्न करो और पूजा का उत्तर पूजा से दो। मुझे पूरा विश्वास है कि रावण के प्राणों पर देवी की उपासना करके तुम विजय प्राप्त करोगे।”

यदि रावण अशुद्ध होकर भी शक्ति की पूजा करके उन्हें प्रसन्न कर सका है और तुम्हें भयभीत कर पाया है तो तुम निश्चय ही सिद्ध पुरुष बनकर रावण को नष्ट कर सकोगे। हे राम! आप शक्ति की मौलिक कल्पना करके देवी की पूजा करें और जब तक आपको सिद्धि प्राप्त न हो तब तक के लिए युद्ध से विरत हो जाएं।

विशेष

(1) जामवंत मंत्री है अतः मंत्री के उपयुक्त विवेक एवं धैर्य उनमें विद्यमान है।

(2) वे किसी भी स्थिति में विचलित नहीं होते तथा कोई न कोई उपाय निकाल लेते हैं।

(3) जामवंत ने राम को शक्ति की मौलिक कल्पना करने के लिए कहा है। निराला की अवधारणा है कि किसी का अनुकरण करके सफलता प्राप्त नहीं की जा सकती। समय एवं परिस्थितियों के अनुरूप शक्ति की मौलिक कल्पना व्यक्ति को करनी चाहिए तभी वह सिद्धि प्राप्त कर सकता है।

(4) जैसे ‘सिंह’ देवी को अपने ऊपर धारण करता है वैसे ही तुम (राम) ‘पुरुष सिंह’ बनकर शक्ति को धारण करो। यही जामवंत का सुझाव है।

(5) प्रस्तुत पंक्तियों से जामवंत के चरित्र पर प्रकाश पड़ता है।

(6) ‘पुरुष सिंह’ में रूपक अलंकार।

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