राम की शक्तिपूजा की व्याख्या भाग-15 | Ram Ki Shaktipuja Ki Vyakhya Part-15

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Ram Ki Shatipuja Ki Vyakhya Part-15

सन्दर्भ प्रस्तुत पंक्तियां छायावादी कवि सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ द्वारा रचित ‘राम की शक्ति पूजा’ से ली गई हैं। मूल रूप से यह कविता उनके काव्य संग्रह ‘अनामिका’ में संकलित है। प्रसंग राम ने विभीषण एवं अन्य वानर वीरों को सम्बोधित करते हुए कहा कि हे मित्र ! इस युद्ध में अब हमारी विजय नहीं हो सकती, क्योंकि रावण की सहायता देवी कर रही हैं और इसी कारण मेरे वे बाण श्रीहत एवं खण्डित हो रहे हैं जो दैवी शक्ति से सम्पन्न हैं एवं विश्व को जीत सकने की क्षमता रखते हैं। बाणों की जो अमोघ शक्ति मुझे परमात्मा ने प्रदान की है, उसका मैंने कभी दुरुपयोग नहीं किया। सदैव सृष्टि की रक्षा के लिए, अन्याय एवं अत्याचार का विनाश करने के लिए ही मैंने इनका संधान किया फिर मेरे बाणों की वह शक्ति आज श्रीहत क्यों हो गई. इसका मुझे आश्चर्य भी है और दुःख भी है।

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