हिंदी की उपभाषाएँ और बोलियाँ | hindi ki upbhashaen aur boliyan

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hindi ki upbhashaen aur boliyan

इस लेख के माध्यम से आप hindi ki upbhashaen aur boliyan को समझेंगे। हिंदी की 5 उपभाषाएँ और 18 बोलियाँ हैं ।

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देवनागरी लिपि की वैज्ञानिकता | Devnagari Lipi Ki Vaigyanikta

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Devnagari Lipi Ki Vaigyanikta

महापंडित राहुल सांकृत्यायन ने देवनागरी लिपि  के विषय में यह कहा है कि – “देवनागरी दुनिया की सर्वाधिक वैज्ञानिक लिपि है” । अब हम Devnagari Lipi Ki Vaigyanikta पर विस्तार से विचार करेंगे और यह समझने का प्रयास करेंगे कि क्या वास्तव में देवनागरी लिपि एक वैज्ञानिक लिपि है । देवनागरी लिपि की विशेषताओं का उल्लेख करते समय भी प्रायः यह कहा जाता है कि यह वैज्ञानिक लिपि है। प्रश्न यह है कि किसी लिपि को वैज्ञानिकता प्रदान करने वाले कौन से तत्त्व होते हैं? किसी भी लिपि की वैज्ञानिकता के आधार तत्व बताते हुए भाषाविदों ने मान है कि वह लिपि वैज्ञानिक लिपि हो सकती है जिसमें – • एक ध्वनि के लिए एक वर्ण हो। • एक वर्ण एक ही ध्वनि को व्यक्त करें। • मात्रा एवं वर्णचिह्नों में भिन्नता हो। • लेखन और उच्चारण में एकरूपता हो। • सरल एवं स्पष्ट हो । • उच्चारण एवं लेखन … Read more

देवनागरी लिपि की विशेषताएँ | Devnagari Lipi Ki Visheshtaen

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devnagari lipi ki visheshtaen

देवनागरी (नागरी) लिपि में असंख्य विशेषताएं विद्यमान हैं। वस्तुतः यह विश्व की समस्त वर्तमान लिपियों से श्रेष्ठ एवं वैज्ञानिक है।आइजक पिटमैन के अनुसार – “संसार की यदि कोई लिपि सर्वाधिक पूर्ण है तो वह एकमात्र देवनागरी ही है।” मोनियर विलियम्स के अनुसार, “देवनागरी में यद्यपि Z और F (ज़ और फ़) के लिए वर्ण नहीं है फिर भी यह सभी ज्ञात लिपियों से अधिक पूर्ण एवं संतुलित है।” यहाँ यह उल्लेखनीय है कि विलियम्स द्वारा बताए गए इस अभाव को भी देवनागरी ने दूर कर लिया है। देवनागरी की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:  Devnagari Lipi Ki Visheshtaen  1. यह भाषा के अंतर्गत आने वाले अधिक-से-अधिक ध्वनि-चिह्नों से संपन्न है। इसमें परंपरागत रूप से 11 स्वर तथा 33 व्यंजन हैं। इसके अतिरिक्त ड़, ढ़, क़, ख़, ग़, ज़, फ़, ध्वनियों के लिए भी चिह्न बने हैं। क्ष, त्र, ज्ञ, श्र संयुक्त व्यंजनों के लिए भी अलग चिह हैं। संस्कृत भाषा के लिए … Read more

अपभ्रंश की व्याकरणिक विशेषताएँ | Apbhransh Ki Vyakaranik Visheshtaen

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apbhransh ki vyakaranik visheshtaen

अपभ्रंश की व्याकरणिक संरचना का विवेचन संज्ञा, वचन, लिंग, विशेषण, काल, सर्वनाम तथा क्रिया आदि आधारों पर किया जा सकता है। (1) संज्ञा तथा कारक व्यवस्थाः सरलीकरण की प्रक्रिया अपभ्रंश के संज्ञा-रूपों में कई प्रकार से चलती रही। इस संबंध में तीन तरह के नये प्रयोग इस काल में दिखते हैं – (i) निर्विभक्तिक प्रयोगों की प्रवृत्ति बढ़ी। इनके अन्तर्गत शब्दों को केवल प्रातिपदिक (धातु शब्द, मूल और रूढ़ शब्द) के रूप में व्यक्त किया जाता था या एक ही विभक्ति से कई कारकों का काम लिया जाता था। उदाहरण के तौर पर अपभ्रंश में ‘हिं’ प्रत्यय से कर्म, करण, सम्प्रदान, अपादान और अधिकरण कारकों का काम लिया जाता रहा। (ii) जो प्रयोग सविभक्तिक थे उनमें भी सरलीकरण हुआ। सारे प्रातिपदिक (Antipodes – धातु शब्द, मूल और रूढ़ शब्द) स्वरांत (वह शब्द जिसके अंत में स्वर वर्ण हो) हो गये, जैसे- जगत् > जग                  महान् > महा प्रातिपदिक के अन्त … Read more

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