रामायण के बहुभाषिक पाठ | Ramayan Ke Bahubhashik Path
भारतीय संस्कृति मूलतः कृषि संस्कृति है। कृषि संस्कृति के जितने भी ऊंचे आदर्श हो सकते हैं। राम उनके प्रतीक हैं। वाल्मीकि ने उन्हें पूर्ण पुरुष के रूप मैं प्रस्तुत किया है। वे सुन्दर, धीर-वीर-गम्भीर हैं। राम की भक्ति के माध्यम से तुलसी ने चाहा था कि वे समस्त युगीन समस्याओं का समाधान प्रस्तुत कर सकें। उनके राम हैं भी कैसे ? वे एक और परब्रह्म हैं, राग-विराग से ऊपर उठे हुए, तो दूसरी ओर वे अत्यन्त सहृदय, सुशील मानव हैं। वे ब्रह्म हैं, सभी सद्गुणों से सम्पन्न हैं। अतः उनके सुख-दुःख, उनकी अनुभूति से पाठक मात्र समरस हो जाता है। ऐसे अखण्ड सत्ता सम्पन्न तथा समस्त मानवीय गुणों से युक्त प्रभु राम की गाथा लोककल्याणकारी है। ‘रामकथा जग मंगल करनी’ है। लोकमंगल का यही दृष्टिकोण मन में रखकर तुलसी ने ‘रामचरितमानस’ की सम्पूर्ण कथा का ताना-बाना बुना। बहुभाषिक भारतीय समाज में रामचरितमानस का प्रचार भारत की सभी भाषाओं बोलियों, लोकगीतों और अधिकांश जनजातियों में रामकथा उपलब्ध … Read more