मनोविश्लेषणवाद क्या है | Manovishleshanvad Kya Hai | मनोविश्लेषणवाद | Manovishleshanvad

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मनोविश्लेषण शब्द अंग्रेजी के ‘साइको-एनलसिस’ (Psycho-analysis) शब्द का हिंदी पर्याय है । 19 वीं सदी के उत्तरार्द्ध में सिगमंड फ्रायड (Sigmund Freud, 1856-1939) द्वारा मानसिक रोगियों का इलाज करते हुए स्नायविक व मानसिक विकारों के संबंध में सुझाया गया सिद्धांत व व्यवहार मनोविश्लेषण कहलाता है। चिकित्सा की यह विधि जिन मूल सिद्धांतों पर आधारित है उन सिद्धांतों के स्पष्टीकरण, समर्थन, विरोध आदि के कारण फ्रायड के समय से लेकर अब तक मनोविश्लेषण ने इतनी प्रगति कर ली है कि आधुनिक युग कि कोई भी विचारधारा इसके प्रभाव से अछूती नहीं रह सकी । आधुनिक युग में जिस प्रकार राजनीति और आर्थिक व्यवस्था पर मार्क्सवाद का प्रभाव पड़ा है, उसी प्रकार कला, साहित्य और समाज पर मनोवैज्ञानिक खोजों तथा नये-नये मनोविश्लेषण सिद्धांतों का बड़ी गहराई से प्रभाव पड़ा है । साहित्य का संबंध मानव-मन से है । साहित्य जो विभिन्न चरित्रों का चित्रण करता है, वह किसी न किसी मनोवैज्ञानिक आधार … Read more

विलियम वर्ड्सवर्थ का काव्य-भाषा सिद्धान्त | William Wordsworth ka Kavyabhasha Siddhant

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प्रसिद्ध अंग्रेजी कवि विलियम वर्ड्सवर्थ (1770-1850 ई.) एक कवि के रूप में सुविख्यात हैं। आधुनिक काल के छायावादी कवि सुमित्रानन्दन पन्त की भांति वईसवर्थ ने भी प्रकृति निरीक्षण से कविता की ओर अपने झुकाव को व्यक्त किया है। बीस वर्ष की अवस्था में वर्ड्सवर्थ ने पैदल ही फ्रान्स, इटली और आल्पस पर्वत श्रृंखला की प्राकृतिक सुषमा का अवलोकन किया और इस सौन्दर्य को अपनी काव्यवस्तु बनाया। विद्वानों का एक वर्ग यह भी मानता है कि फ्रान्स की राज्य क्रान्ति ने भी वर्ड्सवर्थ की आलोचना को प्रभावित किया।    सन् 1795 ई. में वर्ड्सवर्थ एक अन्य कवि ‘कॉलरिज’ के सम्पर्क में आए और दोनों ने मिलकर ऐसी नवीन रचनाएं प्रस्तुत की जो तत्कालीन युग की मांग थीं। इन दोनों की रचनाओं का संकलन ‘लिरिकल बैलड्स’ नामक संग्रह में 1798 ई. में प्रकाशित हुआ। इस संकलन की भूमिका ‘एडवरटिजमेन्ट’ नाम से वर्ड्सवर्थ ने लिखी, जिससे उस समय कॉलरिज पूर्ण रूप से सहमत … Read more

मिथक क्या है | Mithak Kya Hai

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mithak kya hai

मिथक का अर्थ अर्थ – अंग्रेजी के मिथ (Myth) का समानार्थी शब्द ‘मिथक’ है, जो यूनानी शब्द ‘माइथोस’ से निष्पन्न है। इसका अर्थ है- अतर्क्य आख्यान। हम यह समझने का प्रयास करेंगे कि हिंदी साहित्य में मिथकों का प्रयोग किस प्रकार किया गया है । बच्चन सिंह इसकी परिभाषा देते हुए कहते हैं कि- “मिथक के अतिरिक्त इस शब्द के लिए दंतकथा, पुरावृत्त, धर्मगाथा, पुराकथा और पुराख्यान शब्दों का प्रयोग किया गया है। मिथक में तर्क की कोई संगति नहीं होती है। इसमें व्यक्त भावनाओं, विचारों और घटनाओं के संबंध सूत्र अत्यधिक उलझे हुए, तर्केतर और गड्डमड्ड होते हैं। मिथक आदिम मनुष्य की भाषा है, जिसके माध्यम से वह जीवन और प्रकृति के रहस्यों के प्रति अपनी प्रतिक्रियाओं को अलौकिक गाथाओं के रूप में व्यक्त करता था। यह आदिम यथार्थ के प्रति सामूहिक अचेतन मन का सहजस्फूर्त बिंबात्मक सृजन है।” रामपूजन तिवारी का मत है कि – “मिथक वृत्त अथवा … Read more

जॉन ड्राइडन : युग परिवेश और आलोचना सिद्धांत / John Dryden : Yug Parivesh aur Alochana Siddhant

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John Dryden ki alochana drishti

जॉन ड्राइडन (1631-1700) बहुमुखी प्रतिभा के धनी एक ऐसे लेखक थे, जिन्होंने साहित्य की किसी भी शाखा को अछूता नहीं छोड़ा और प्रत्येक क्षेत्र में उत्कृष्ट योग्यता के कार्य किए। वे एक महान कवि और महान नाटककार थे। वे एक महान गद्य-लेखक भी थे और उन्हें आधुनिक गद्य शैली का संस्थापक माना जाता है। वे एक मौलिक और विवेकशील आलोचक भी थे। डॉ. जॉनसन ने उन्हें “अंग्रेजी आलोचना का जनक” कहा और उनके बाद के आलोचक भी इस कथन से पूरी तरह से सहमत हैं। हालाँकि, आलोचना का एकमात्र औपचारिक ग्रंथ जो उन्होंने अपने पीछे छोड़ा है, वह है ‘ड्रामेटिक पोएसी पर उनका निबंध’ (Essay on Dramatic Poesy)। यह एक यह एक ऐसी कृति है जो उनके आलोचनात्मक दृष्टिकोण का अनौपचारिक घोषणापत्र है, और इंग्लैंड में साहित्यिक आलोचना के इतिहास में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है। जॉन ड्राइडन और उनका युग 17वीं शताब्दी के मध्य में इंग्लैण्ड में स्वतंत्र … Read more

टी एस इलियट का वस्तुनिष्ठ समीकरण का सिद्धान्त | t s eliot ka vastunishtha samikaran ka siddhant | eliot ka vastunishtha samikaran ka siddhant

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प्रसिद्ध कवि, नाटककार तथा आलोचक टॉमस स्टार्न्स इलियट (Thomas Stearns Eliot) का जन्म 26 सितंबर, 1888 को सेंट लुई अमेरिका के एक प्रतिष्ठित परिवार में हुआ। टी.एस.इलियट बीसवीं शताब्दी के सर्वाधिक प्रभावशाली समीक्षक हैं, इन्होंने पाश्चात्य समीक्षा को अत्यधिक गहराई से प्रभावित किया। उन्होंने हार्वर्ड विश्वविद्यालय से 1910 ई. में  एम.ए.किया । इसके बाद तर्कशास्त्र, तत्वज्ञान, संस्कृत और पालि चारों विषयों को मिलाकर दर्शनशास्त्र में पी.एच.डी. की उपाधि प्राप्त की । सन् 1948 ई. में उन्हें नोबल पुरस्कार प्राप्त हुआ और 1965 ई.में इनकी मृत्यु हो गई । इलियट के सिद्धांतों  (निर्वैयक्तिकता का सिद्धांत, परंपरा की परिकल्पना का सिद्धांत और वस्तुनिष्ठ समीकरण का सिद्धांत) में उनका ‘वस्तुनिष्ठ समीकरण का सिद्धांत’ (A theory of objective correlative) पाश्चात्य समीक्षा के क्षेत्र में एक महत्त्वपूर्ण देन है। इसे ‘वस्तुनिष्ठ सहसंबंधिता’ या ‘वस्तुनिष्ठ पारस्परिकता’  अथवा ‘वस्तुमूलक प्रतिरूपता’ या ‘मूर्त विधान का सिद्धांत’ इत्यादि विविध नामों से भी जाना जाता है। ‘वस्तुनिष्ठ समीकरण सिद्धांत’ इलियट … Read more

प्लेटो का आदर्शवाद | Plato ka Adarshvad

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 पाश्चात्य संस्कृति एवं सभ्यता का आदिस्रोत यूनान रहा है। यूनान के दार्शनिकों, विचारकों एवं काव्य-चिन्तकों ने जिन सिद्धान्तों का प्रतिपादन ईसा से चार-पाँच शताब्दियों पूर्व किया था, उन्हीं की अनुगूँज परवर्ती युग में यूरोप के विभिन्न विचारकों की शब्दावली में सुनाई देती है।   यूनान के गौरवशाली चिन्तकों एवं महान् दार्शनिकों में सुकरात के शिष्य प्लेटो (427 ई० प०-347 ई० पू०) का नाम सर्वोपरि है। प्लेटो मूलतः दार्शनिक एवं आचार्य थे। प्लेटो का दृष्टिकोण अपने पूर्ववर्ती दार्शनिकों से सर्वत्र स्वतन्त्र एवं मौलिक दिखाई पड़ता है जिसका प्रकटीकरण उनके द्वारा रचित विभिन्न दार्शनिक एवं राजनीतिक ग्रन्थों में हुआ। उनके द्वारा रचित ग्रन्थों में ‘दि रिपब्लिक‘ (गणराज्य), ‘दि स्टेट्समैन‘ (राजनेता), ‘दि लॉज‘ (विधि) आदि उल्लेखनीय हैं। प्लेटो के दार्शनिक विचार दर्शन का चरम लक्ष्य सत्य या अन्तिम सत्य की खोज करना होता है, पर अन्तिम सत्य के सम्बन्ध में भी दार्शनिकों के मुख्यतः दो वर्ग रहे हैं- एक, जो किसी सूक्ष्म सत्ता या परोक्ष … Read more

स्वच्छन्दतावाद क्या है | Swachchhandatavad kya hai | swachchhandatavad | Romanticism kya hai

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‘स्वच्छंदतावाद’ ‘रोमांटिसिज़्म’ का हिंदी अनुवाद है । हिंदी में इस शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग कदाचित् आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने अपने ग्रंथ ‘हिंदी साहित्य का इतिहास’ में पं. श्रीधर पाठक को ‘स्वच्छंदतावाद’ का प्रवर्तक मानते हुए किया है । ‘रोमांटिक’ शब्द को एक काव्य प्रवृत्ति अथवा ‘वाद’ के रूप में सर्वप्रथम प्रयुक्त करने वाले जर्मन आलोचक फ्रेड्रिक श्लेगल थे । इन्होंने 1798-1800 ई. के बीच इस शब्द का प्रयोग ‘क्लासिसिज़्म’ के विरोधी अर्थों में किया ।   इंग्लैंड में स्वच्छन्दतावादी काव्यान्दोलन का मार्ग प्रशस्त करने वाले दो कवि राबर्ट बर्न्स एवं विलियम ब्लेक थे। वस्तुतः अंग्रेजी कविता में स्वच्छन्दतावादी काव्य-आंदोलन का प्रारम्भ विलियम वर्ड्सवर्थ के ‘लिरिकल बैलेड्स’ से हुआ। अंग्रेजी में वर्ड्सवर्थ के बाद कॉलरिज़, शेली, बायरन, कीट्स, सर वाल्टर स्कॉट आदि अनेक स्वच्छन्दतावादी साहित्यकारों द्वारा इस काव्य-आंदोलन का पर्याप्त पल्लवन एवं विकास हुआ ।  विक्टर ह्यूगो ने स्वच्छन्दतावाद को पारिभाषित करते हुए इसे ‘साहित्यिक उदारवादिता’ कहा है। वाल्टर रेले ‘दूरी … Read more

कॉलरिज का काव्यचिंतन | Coleridge ka Kavyachintan

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 शाब्दिक अर्थ में काव्य चिंतन का संबंध कविता के विषय में चिंतन से है। कविता क्या है? रस, छंद अलंकार तथा काव्यभाषा का कविता की सृजन प्रक्रिया में क्या योगदान है? काव्य चिंतन के केंद्र मेंऐसे ही बिंदु रहते हैं। एक दृष्टि से काव्य चिंतन वस्तुतः कविता संबंधितसैद्धांतिक समीक्षा है। पश्चिम में काव्य चिंतन की एक समृद्ध परंपरा रही है। कॉलरिज ऐसी समृद्ध काव्य चिंतन की परंपरा में सार्थक हस्तक्षेप करने वाले चिंतक के रूप में ख्यात हैं।  कॉलरिज का पूरा नाम सैमुअल टेलर कॉलरिज (Samuel Taylor Coleridge) है। इनका जन्म 21 अक्टूबर 1772 में इंग्लैंड के सेंट मेरी नामक स्थल पर हुआ। कॉलरिज अंग्रेजी के ‘लेक कवियों‘ (Lake Poets) में से एक थे। उनकी कविताओं में ‘दि राइम ऑफ दि एंसीएंट मैरीनर’ तथा ‘कुबलाखान’ अत्यंत प्रसिद्ध है।   आलोचनात्मक कृतियों में ‘बायोग्राफीया लिटरेरिया’, ‘चर्च एण्ड स्टेट’ तथा ‘कनफेशन्स ऑफ एन इनक्वाइरिंग स्प्रिट’ का उल्लेख किया जा सकता है। कॉलरिज … Read more

मैथ्यू आर्नल्ड (1822-1888) की आलोचना दृष्टि | Matthew Arnold Ki Alochana Drishti

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आलोचना का स्वरूप और प्रकार्य मैथ्यू आर्नल्ड Matthew Arnold  अंग्रेजी के महान आलोचक हैं  ।  आज हम  matthew arnold ki alochana drishti का अध्ययन करेंगे ।  मैथ्यू आर्नल्ड Matthew Arnold डॉ. टॉमस आर्नल्ड के पुत्र थे। इनकी शिक्षा आक्सफोर्ड में हुई थी। 1849 में इनका पहला काव्य संग्रह प्रकाशित हुआ । इनके आलोचनात्मक निबंधों का संग्रह “एसेज इन क्रिटिसिज्म” (Essays in criticism) 1865 में प्रकाशित हुआ। सन् 1857 में ये आक्सफोर्ड युनिवर्सिटी में प्रोफेसर ऑफ पोइट्री के पद पर चुने गए। | ये बड़े शिष्ट, सुसंस्कृत व्यवहार वाले मृदुभाषी विद्वान थे। अपने प्रारंभिक जीवन में ये काव्य-रचना में प्रवृत्त रहे और बाद में आलोचना में संलग्न  रहे। ये पद्य और गद्य दोनो ही रचनाओं में जीवन के आलोचक रहे।   आधुनिक अंग्रेजी समीक्षा के क्षेत्र में आर्नल्ड का अत्यंत महत्त्वपूर्ण स्थान है। उन्हें 19 वीं शताब्दी का सबसे बड़ा समीक्षक घोषित करते हुए स्काट जेम्स ने लिखा है— “इस देश में आर्नल्ड की स्थिति … Read more

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