डॉ. नगेन्द्र की आलोचना दृष्टि | Dr Nagendra Ki Alochana Drishti

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Dr Nagendra ki Alochana Drishti

अलीगढ़ (उ.प्र.) जिले के ‘अतरौली’ नामक कस्बे में जन्मे, नागपुर और आगरा से पढ़े-लिखे तथा दिल्ली विश्वविद्यालय में शिक्षक रहे डॉ. नगेन्द्र (09.03.1915-27.10.1999) ने काव्यशास्त्र और आलोचना के क्षेत्र में अत्यंत महत्वपूर्ण और वृहद् कार्य किया है । आज हम Dr Nagendra ki Alochana Drishti को विस्तार से समझने का प्रयास करेंगे ।

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आलोचना का अर्थ, परिभाषा, स्वरूप और प्रकार | alochana ka arth, paribhasha, swarup aur prakar

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alochana ka arth, paribhasha, swarup aur prakar

आलोचना शब्द का प्रयोग किसी कृति के गुण-दोषों के विवेचन के लिए किया जाता है। सामान्यतः आलोचना का अर्थ लोग दोषदर्शन से ही लेते हैं, किन्तु आलोचना के व्युत्पत्तिपरक अर्थ पर विचार करने से यह स्पष्ट हो जाता है कि आलोचना का अभिप्राय गुण-दोष दोनों पर प्रकाश डालना है। आलोचना को समालोचना अथवा समीक्षा भी कहते हैं। आलोचना का व्युत्पत्तिपरक अर्थ आलोचना शब्द की व्युत्पत्ति ‘लोच’ धातु में ‘अन्’ प्रत्यय लगाकर और ‘आ’ उपसर्ग जोड़ने से होती है जिसे स्त्रीलिंग बनाने के लिए पुनः ‘आ’ प्रत्यय जोड़ दिया जाता है। इसकी व्युत्पत्ति निम्न प्रकार की हुई है : “आ समन्तात् लोचनम् अवलोकनम् इति आलोचनं स्त्रियां आलोचना।”  ‘आ’ का अर्थ है ‘चारों ओर’ और लोचन का अर्थ है ‘देखना’। अतः आलोचना का शाब्दिक अर्थ हुआ – सब ओर देखना।  दूसरे शब्दों में किसी साहित्यिक रचना की सम्यक् परीक्षा करना, उसके गुण-दोषों का उद्घाटन करना, आलोचना है। अंग्रेजी में आलोचना का पर्यायवाची … Read more

काव्य में लोक-मंगल की साधनावस्था – आचार्य रामचन्द्र शुक्ल | Kavya men Lokmangak ki Sadhnavastha – Acharya Ramchandra Shukla

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आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने ऐसे काव्यों को, जिनमें मंगल का विधान (कल्याण करने का उद्देश्य) करने वाला भाव ‘करुणा’ बीज रूप में विद्यमान रहता है, श्रेष्ठ घोषित करके ‘लोक मंगल की साधना’ को काव्य-प्रतिमान के रूप में प्रतिष्ठित किया है । उनका तर्क है कि लोक में मंगल का विधान करने वाले दो भाव हैं- ‘करुणा’ और ‘प्रेम’। ‘करुणा’ की गति लोक की रक्षा की ओर होती है और ‘प्रेम’ की गति लोक के रंजन की ओर । (लोकरंजन = लोगों को खुश करके उनका विश्वास प्राप्त करना)  ‘लोक-मंगल’ शब्द को विशिष्ट अर्थ देने का श्रेय आचार्य रामचंद्र शुक्ल को है। लोक-मंगल के दोनों अंशभूत शब्द ‘लोक’ और ‘मंगल’ आचार्य शुक्ल को भारतीय परंपरा के प्रवाह से प्राप्त हुए हैं। सामान्यतः ‘लोक’ शब्द से तात्पर्य है ‘सामान्य जन’ और ‘मंगल’ से तात्पर्य है ‘कल्याण’, किंतु यह शब्द आचार्य रामचंद्र शुक्ल के यहां नये अर्थ के साथ प्रयुक्त हुआ है।  आचार्य शुक्ल ने ‘लोक’ शब्द का … Read more

आचार्य रामचन्द्र शुक्ल की आलोचना दृष्टि | Acharya Ramchandra Shukla Ki Alochana Drishti

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‘हिंदी साहित्य का इतिहास’ में ‘गद्य साहित्य का प्रसार’ के द्वितीय उत्थान (संवत् 1950-1975) के अंतर्गत समालोचना पर विचार करते हुए शुक्लजी ने लिखा है, ‘पर यह सब आलोचना बहिरंग बातों तक ही रही। भाषा के गुण-दोष, रस, अलंकार आदि की समीचीनता इन्हीं सब परम्परागत विषयों तक पहुँची। स्थायी साहित्य में परिगणित होने वाली समालोचना जिसमें कवि की अंतर्वृत्ति का सूक्ष्म व्यवच्छेद होता है, उसकी मानसिक प्रवृत्ति की विशेषताएँ दिखाई जाती हैं, बहुत कम दिखाई पड़ी।’  आचार्य रामचन्द्र शुक्ल  Acharya Ramchandra Shukla हिंदी आलोचना के युग-पुरुष हैं। आइए अब हम acharya ramchandra shukla ki alochana drishti का विस्तृत विवेचन करें । आगे गद्य साहित्य के तृतीय उत्थान के अंतर्गत समालोचना के विकास पर लिखते हुए उन्होंने कवियों की ‘अंतःप्रवृत्ति की छानबीन’ की बात फिर की है। शिष्टता और विनम्रता के नाते उन्होंने यह नहीं लिखा कि ‘ऐसी आलोचना मैंने की है।’ उन्होंने उत्तम पुरुष का प्रयोग बचाते हुए अपने विषय … Read more

हिंदी आलोचना का उद्भव और विकास | Hindi Alochana ka Udbhav aur Vikas

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हिंदी में ‘आलोचना’ शब्द अंग्रेजी के ‘क्रिटिसिज़्म’ (Criticism) का पर्याय है जिसका अर्थ है ‘मूल्यांकन’ अथवा ‘निर्णय करना’। अर्थात् किसी वस्तु या कृति की सम्यक व्याख्या अथवा मूल्यांकन आदि करना ही आलोचना है । आलोचना को समीक्षा भी कहा जाता है। समीक्षा का अर्थ है ‘सम्यक निरीक्षण’। वस्तुत: पहले सर्जनात्मक साहित्य प्रकाश में आता है तत्पश्चात् उसकी आलोचना की आवश्यकता का अनुभव किया जाता है ।आज हिंदी आलोचना का क्षेत्र-विस्तार हो जाने के परिणामस्वरूप इसके लिए ‘समीक्षा’, ‘आलोचना’, ‘समालोचना’ जैसे शब्दों का भी प्रयोग किया जाता। बाबू गुलाबराय के अनुसार आलोचना का अर्थ है-  “आलोचना का मूल उद्देश्य कवि की कृति का सभी दृष्टिकोणों से आस्वादकर पाठकों को उस प्रकार के      आस्वाद में सहायता देना तथा उनकी रुचि को परिमार्जित करना एवं साहित्य की गति निर्धारित करने में योग देना है |” इस तरह आलोचना, साहित्य कीव्याख्या करती है, उसके गुण-दोष बताती है, उसके निर्माण की दिशा निर्धारित … Read more

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