पूर्वी हिंदी की बोलियाँ और उनकी विशेषताएं | Purvi Hindi ki Boliyan aur Unki Visheshtaen

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purvi hindi ki boliyan aur unki visheshtaen

पूर्वी हिंदी का वही क्षेत्र है जो प्राचीन काल में उत्तर कोसल और दक्षिण कोसल था। उत्तर कोसल की बोली अवधी और दक्षिण कोसल की छत्तीसगढ़ी है। इन दो खण्डों के बीच में शताब्दियों तक बघेल राजपूतों का राज्य रहा है। बघेलखण्ड की एक राजनीतिक इकाई होने के कारण उसकी बोली बघेलखण्डी या बघेली को भी लोग अलग बोली मानते हैं। इस प्रकार पूर्वी हिंदी उपभाषा (बोली-वर्ग) के अंतर्गत आने वाली तीन प्रमुख बोलियां अवधी, बघेली और छत्तीसगढ़ी हैं ।

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नाथ-साहित्य की प्रमुख की विशेषताएँ | Nath Sahitya ki Pramukh Visheshtaen

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भारतेन्दु मण्डल के साहित्यकार | Bhartendu Mandal ke Sahityakar

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भारतेन्दु हरिश्चंद्र के प्रभाव से उनके इर्द-गिर्द साहित्यकारों का एक खासा मण्डल तैयार हो गया था जिन्हें ‘भारतेन्दु मण्डल’ कहा जाता है।

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आरम्भिक हिंदी की व्याकरणिक विशेषताएं | Arambhik Hindi ki Vyakaranik Visheshtaen

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अपभ्रंश की विशेषताएं | Apbhransh ki Visheshtaen

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अवहट्ट की व्याकरणिक विशेषताएँ | Avahatta ki Vyakaranik Visheshtaen

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Avahatta ki Vyakaranik Visheshtaen

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ब्रजभाषा का साहित्यिक भाषा के रूप में विकास|Brajbhasha ka Sahityik Bhasha ke Roop men Vikas

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खड़ी बोली का साहित्यिक भाषा के रूप में विकास | Khadi Boli ka Sahityik Bhasha ke Roop men Vikas

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Khadi Boli ka Sahityik Bhasha ke Roop men Vikas

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आरम्भिक हिंदी की प्रमुख विशेषताएँ | Arambhik Hindi ki Pramukh Visheshtaen

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arambhik hindi ki pramukh visheshtaen

आरम्भिक हिंदी को प्रारंभिक हिंदी, प्राचीन हिंदी अथवा पुरानी हिंदी के नाम से भी जाना जाता है। चंद्रधर शर्मा गुलेरीजी के शब्दों में “अपभ्रंश का परवर्ती रूप ही पुरानी हिंदी है।” आरम्भिक हिंदी, अपभ्रंश से विकसित अवहट्ट तथा आधुनिक भारतीय आर्यभाषाओं के बीच की कड़ी है । उत्तरकालीन अपभ्रंश पुरानी हिंदी से साम्य रखता था। यही स्थल पुरानी हिंदी  का उद्गम स्थल है। अपनी प्रौढ़ सामर्थ्य के कारण पुरानी हिंदी ने अनेकानेक कवियों को साहित्य-सृजन के लिए प्रेरित किया। इसके अंतर्गत आदिकालीन रासोकाव्य, रासकाव्य, परवर्ती सिद्ध काव्य, नाथ काव्य आदि को परिगणित किया जा सकता है। आरम्भिक हिंदी की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं- (arambhik hindi ki pramukh visheshtaen) 1. अवहट्ट में जिन दो स्वरों- ऐ, औ का प्रवेश हुआ, आरम्भिक हिंदी  में उसका प्रयोग बहुलता से हुआ। 2. अनुनासिक तथा अनुस्वार दोनों के लिए बिन्दु का प्रयोग किया गया। 3. सभी शब्द स्वरांत होते हैं, व्यंजनांत नहीं। इसे उकार बहुला भाषा कहा गया। जैसे- पापु, पिंडु, चलु आदि। 4. श, ष. स … Read more

देवनागरी लिपि में सुधार और संशोधन | Devnagari Lipi men Sudhar aur Sanshodhan

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देवनागरी लिपि में समय-समय पर अनेक सुधार एवं संशोधन होते रहे हैं, जिन्हें देवनागरी लिपि का विकासात्मक इतिहास कहा जा सकता है। तो आइए अब Devnagari Lipi men Sudhar aur Sanshodhan पर विस्तार से विचार-विमर्श करते हैं । ये सुधार इसके दोषों का निराकरण करने हेतु तथा इसे लेखन एवं टंकण आदि की दृष्टि से अधिक उपयोगी बनाने हेतु किये जाते रहे हैं। इन सुधारों एवं संशोधनों का क्रमबद्ध विवेचन निम्न प्रकार किया जा सकता है: 1. सर्वप्रथम बम्बई के महादेव गोविन्द रानाडे ने एक लिपि सुधार समिति का गठन किया। तदनन्तर महाराष्ट्र साहित्यपरिषद्, पुणे ने लिपि-सुधार योजना तैयार की। 2. सन् 1904 में बाल गंगाधर तिलक ने ‘केसरी’ नामक समाचार पत्र में देवनागरी लिपि के सुधार की चर्चा की और 1926 तक देवनागरी के टाइपों की छँटाई करते-करते 190 टाइपों का एक फॉन्ट बना लिया, जिसे ‘तिलक फॉन्ट’ या ‘तिलक टाइप’ कहते हैं। 3. तत्पश्चात् सावरकर बंधुओं, महात्मा गाँधी, विनोबा भावे और काका कालेलकर ने इस लिपि में सुधार का प्रयास करते हुए इसे सरल एवं … Read more

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