प्रशासनिक कार्यों में अनुवाद की भूमिका | Prashasanik Karyon Men Anuvad Ki Bhumika

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 राजभाषा अधिनियम, 1963 (यथा संशोधित, 1967) के प्रावधानों के अनुसार संघ सरकार के राजकाज में द्विभाषिकता की स्थिति आ गई जिसके अनुसार सरकारी अधिकारियों और कर्मचारियों को अपने शासकीय कार्य हिंदी अथवा अँग्रेजी में करने की छूट दी गई तथा उक्त अधिनियम की धारा 3(3) के अंतर्गत आने वाले सभी कागजात हिंदी और अँग्रेजी में द्विभाषी रूप में प्रस्तुत करने की सांविधिक व्यवस्था की गई । आज हम prashasanik karyon men anuvad ki bhumika विषय का विस्तृत विवेचन करेंगे और इसे समझने का प्रयास करेंगे। राजभाषा नियम 1976 (यथा संशोधित 1987) के अंतर्गत विभिन्न राज्यों के साथ केंद्र सरकार द्वारा किए जाने वाले पत्राचार की भाषा निर्धारित की गई है जिसके अनुसार ‘क’ क्षेत्र तथा ‘ख’ क्षेत्र में स्थित राज्यों में हिंदी तथा ‘ग’ क्षेत्र में स्थित राज्यों में अँग्रेजी में पत्राचार करने का प्रावधान किया गया है । इसके फलस्वरूप अनुवाद anuvad सरकारी कामकाज का एक अनिवार्य अंग बन गया है । प्रशासनिक हिंदी के विकास में अनुवाद की भूमिका अहम … Read more

सुमित्रानन्दन पन्त (1900-1977 ई.) की काव्य यात्रा के विविध चरण | sumitranandan pant ki kavyayatra ke vividh charan

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कविवर सुमित्रानन्दन पन्त  (sumitranandan pant) हिन्दी के एक ऐसे कवि हैं जिनकी कविता का स्वरूप एवं स्वर समय के साथ बदलता रहा। उनकी प्रारम्भिक कविताएं छायावादी काल की हैं जिनमें प्रकृति सौन्दर्य की प्रधानता है किन्तु बाद में उनकी कविताओं ने प्रगतिवाद का रास्ता अपना लिया। शोषण का विरोध करने वाली पन्त की प्रगतिवादी रचनाओं में गरीबों के प्रति सहानुभूति व्यक्त की गई है। कालान्तर में पन्त की काव्य यात्रा का विकास अन्तश्चेतनावादी कविताओं के रूप में हुआ जहाँ  वे अरविन्द दर्शन से प्रभावित दिखाई पड़ते हैं। पन्त काव्य का चतुर्थ चरण नवमानवतावादी कविता का है, जहाँ  वे ‘नवमानवता’ का सन्देश सुनाते दिखते हैं। आइए अब sumitranandan pant ki kavyayatra ke vividh charan का विस्तार से विवेचन करते हैं ।पन्त काव्य के इस क्रमिक विकास को चार चरणों में निम्न प्रकार विभक्त किया जा सकता है:                                  … Read more

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