‘अंधेर नगरी’ का नाट्यशिल्प | Andher Nagari Ka Natya Shilp

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नाट्य शिल्प से तात्पर्य है किसी नाटक की कथावस्तु, पात्र एवं चरित्र चित्रण, संवाद, भाषाशैली, गीत या संगीत, बिम्ब एवं प्रतीक योजना तथा शीर्षक का सम्मिलित प्रभाव। आइए इन तत्वों के आधार पर अब andher nagari ka natya shilp का अध्ययन करते हैं ।  ‘अंधेर नगरी’ भारतेन्दु हरिश्चंद्र द्वारा लिखित एक प्रहसन है । यह सन् 1881 ई. में किसी जमींदार को लक्षित करके नेशनल-थिएटर के लिए एक ही बैठक में लिखा गया। एक ही रात में भारतेन्दु ने एक सामान्य लोकोक्ति ‘अंधेर नगरी चौपट राजा, टके सेर भाजी टेक सेर खाजा’ को इतना व्यंग्यात्मक, सार्वलौकिक और सृजनात्मक अर्थ दे दिया।    ‘अंधेर नगरी’ का नाट्यशिल्प अत्यंत लचीला, सरल, आकर्षक और गत्यात्मक है। भारतेन्दु  ने इसमें किसी एक प्रकार के परम्परागत अथवा आधुनिक शिल्प का प्रयोग नहीं किया है बल्कि नाटक को रूढ़ियों से, एक प्रचलित ढांचे से मुक्त किया है। यह भारतेन्दु  की निरंतर नवीन ग्रहण वृत्ति और रचना वृत्ति … Read more

शब्दकोश-निर्माण की प्रक्रिया | Shabdkosh Nirman Ki Prakriya

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शब्दकोश का निर्माण अपने आप में एक बहुत जटिल और लंबी प्रक्रिया है। शब्दकोश बनाने की प्रारंभिक योजना से लेकर उसके छप जाने तक की प्रक्रिया काफी श्रम और समय की माँग करती है । यह जानकार आश्चर्य होता है कि ‘ऑक्सफोर्ड अंग्रेजी कोश’ को बनने में चालीस वर्ष लगे थे। यह कार्य 1888 में शुरू हुआ था और 1928 में समाप्त हुआ। कई बड़े ऐतिहासिक कोशों के पूरे खंडों को छपने में तो 100-150 वर्ष भी लग जाते हैं। कोश-निर्माण का कार्य विभिन्न भाषा-समाजों में बहुत समय से होता आ रहा है। ज्ञान के क्षेत्र में जागरूक विद्वान इसे अपना दायित्व समझ कर निभाते रहे हैं।   उदाहरण के रूप में हम “निघंटु” का नाम ले सकते हैं जो वैदिक संस्कृत कोश है।     फालेन तथा जॉन शेक्सपियर द्वारा तैयार किए गए आरंभिक हिन्दी-अंग्रेजी कोश इसी कोटि में आते हैं। अंग्रेजी को भारत में व्यापार और प्रशासन के लिए भारतीय … Read more

गजानन माधव मुक्तिबोध का जीवन दर्शन और उनकी काव्य दृष्टि | Gajanan Madhav Muktibodh ka Jivan Darshan aur Unki Kavya Drishti

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 गजानन माधव मुक्तिबोध का जन्म श्यौपुर, ग्वालियर (मध्यप्रदेश) में 13 नवंबर, 1917 को हुआ । सन 1938 में इन्होंने होल्कर कॉलेज इंदौर से बी. ए. किया । सन 1954 में नागपुर विश्वविद्यालय एम.ए. से किया । उसके चार वर्ष बाद सन् 1958 में वे राजनांदगांव के दिग्विजय कॉलेज में अध्यापक हो गए और अंत तक वहीं रहे । 11 सितंबर, 1964 को इनकी मृत्यु हुई । मुक्तिबोध हिंदी साहित्य के प्रमुख कवि, आलोचक, निबंधकार, कहानीकार तथा उपन्यासकार थे। उन्हें प्रगतिशील कविता और नयी कविता के बीच का एक सेतु भी माना जाता है। आज हम muktibodh ka jivan darshan aur unki kavya d rishti का विस्तार से अध्ययन करेंगे ।  मुक्तिबोध की प्रमुख कृतियाँ  कामायनी : एक पुनर्विचार, नई कविता का आत्म-संघर्ष तथा अन्य निबंध, नए साहित्य का सौन्दर्यशास्त्र, समीक्षा की समस्याएँ, चाँद का मुँह टेढ़ा है, भूरी-भूरी खाक धूल, एक साहित्यिक की डायरी, काठ का सपना, विपात्र, सतह से … Read more

महादेवी वर्मा की प्रसिद्ध कविताएं और उनकी व्याख्या | Mahadevi Verma Ki Prasiddha Kavitaen aur Unki Vyakhya

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 महादेवी वर्मा का जीवन परिचय  महादेवी वर्मा का जन्म 1907 में फर्रुखाबाद में हुआ था। इनकी पढ़ाई-लिखाई इंदौर और इलाहाबाद में हुई थी। इलाहाबाद में स्थित प्रयाग महिला विद्यापीठ में वे प्रधानाचार्या के पद पर कार्यरत रहीं। उनकी मृत्यु 1987 में हुई। महादेवी वर्मा ने कविता के अलावा सशक्त गद्य भी लिखा था। उनकी गद्य रचनाएँ भाषा और विचार की दृष्टि से अत्यंत परिपक्व मानी जाती हैं। ‘शृंखला की कड़ियाँ’  के लेखों में उन्होंने स्त्री-मुक्ति के प्रश्नों को जिस स्तर पर उठाया था वह आश्चर्यजनक है। मैनेजर पाण्डेय ने इस पुस्तक को रेखांकित करते हुए लिखा है कि सिमोन द बोउवार की पुस्तक ‘द सेकेण्ड सेक्स’ के प्रकाशन से भी पहले महादेवी की यह पुस्तक प्रकाशित हो चुकी थी और इसके लेख तो और भी पहले प्रकाशित हो चुके थे।   महादेवी वर्मा ने ‘चाँद’ पत्रिका के ‘विदुषी अंक’ का सम्पादन 1935 में किया था। यह अंक हिंदी में हुए स्त्री-विमर्श … Read more

अनुसंधान के मूल तत्व | Anusandhan ke Mool Tatva

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अनुसंधान के मूल तत्व का आधार उसकी प्रक्रिया में निहित वे सारे तत्व हैं जिनसे अनुसंधान आरंभ से अंत तक जुड़ा रहता है । शोध के लिए एक दृष्टिकोण के साथ ही वह प्रक्रिया भी जुड़ी रहती है जिससे गुजरना पड़ता है । अनुसंधान के लिए विश्वविद्यालयों में अनेक नियम निर्धारित किए गए हैं जो वस्तुतः शोध उपाधि के प्रयोजन से विशेष रूप से महत्वपूर्ण हैं । आज हम anusandhan ke mool tatva को समझने का प्रयास करेंगे ।  अनुसंधान के मूल तत्वों में सर्वप्रथम विषय का चयन आवश्यक है । उसके उपरांत रूपरेखा निर्माण, सामग्री संकलन, शोध प्रबंध लेखन और व्यवस्थापन इन सभी तत्वों से मिलकर अनुसंधान की रचना होती है । जिसके लिए अन्वेषक और निर्देशक आवश्यक हैं । इन सभी तत्वों को विशेष रूप से विश्लेषित किया जाएगा, किन्तु अनुसंधान के तत्वों को संक्षेप में इस प्रकार रखा जा सकता है : विषय चयन किसी भी शोध … Read more

अनुसंधान के प्रकार | Anusandhan ke Prakar

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अनुसंधान का क्षेत्र अत्यंत व्यापक है । साहित्य का अनुसंधान सामाजिक और वैज्ञानिक अनुसंधान से अलग ही होता है, क्योंकि उसके रचनात्मक परिवेश में केवल बिम्बात्मक भाषा का प्रयोग ही नहीं सृजनात्मक संवेदना की भी अभिव्यक्ति होती है । अतः अनुसंधान के विभिन्न आयामों से जुड़कर इसकी अनेक प्रणालियों का विकास होता है । इस आधार पर ही अनुसंधान के विभिन्न प्रकारों का विवेचन किया जाता है ।आज यहां हम anusandhan ke prakar का विस्तार से अध्ययन करेंगे ।  हिन्दी साहित्य में अनेक विधाओं को प्रयोग में लाया जाता है । साहित्य को विषयवस्तु, भाव, विचार, शिल्प और भाषा के आधार पर अन्वेषित किया जाता है । इस आधार पर अनुसंधान के भी अनेक प्रकार होते हैं, जिनका विवेचन इस प्रकार हो सकता है : वस्तु तथ्यात्मक अनुसंधान  किसी भी रचना विशेषकर गद्य रचना में, जिसका संबंध कथा साहित्य, नाटक महाकाव्य से है, वस्तु तत्व की प्रमुखता होती है । … Read more

मैथ्यू आर्नल्ड (1822-1888) की आलोचना दृष्टि | Matthew Arnold Ki Alochana Drishti

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आलोचना का स्वरूप और प्रकार्य मैथ्यू आर्नल्ड Matthew Arnold  अंग्रेजी के महान आलोचक हैं  ।  आज हम  matthew arnold ki alochana drishti का अध्ययन करेंगे ।  मैथ्यू आर्नल्ड Matthew Arnold डॉ. टॉमस आर्नल्ड के पुत्र थे। इनकी शिक्षा आक्सफोर्ड में हुई थी। 1849 में इनका पहला काव्य संग्रह प्रकाशित हुआ । इनके आलोचनात्मक निबंधों का संग्रह “एसेज इन क्रिटिसिज्म” (Essays in criticism) 1865 में प्रकाशित हुआ। सन् 1857 में ये आक्सफोर्ड युनिवर्सिटी में प्रोफेसर ऑफ पोइट्री के पद पर चुने गए। | ये बड़े शिष्ट, सुसंस्कृत व्यवहार वाले मृदुभाषी विद्वान थे। अपने प्रारंभिक जीवन में ये काव्य-रचना में प्रवृत्त रहे और बाद में आलोचना में संलग्न  रहे। ये पद्य और गद्य दोनो ही रचनाओं में जीवन के आलोचक रहे।   आधुनिक अंग्रेजी समीक्षा के क्षेत्र में आर्नल्ड का अत्यंत महत्त्वपूर्ण स्थान है। उन्हें 19 वीं शताब्दी का सबसे बड़ा समीक्षक घोषित करते हुए स्काट जेम्स ने लिखा है— “इस देश में आर्नल्ड की स्थिति … Read more

सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ की काव्यगत विशेषताएँ | Suryakant Tripathi ‘Nirala’ Ki Kavyagat Visheshtaen

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1918 से 1936 तक 18 वर्षों का समय छायावाद युग है । दो महायुद्धों के बीच की हिंदी कविता के रूप में छायावाद का अध्ययन किया जा सकता है । सूर्यकांत त्रिपाठी निराला भी छायावादी कवि हैं । उनकी काव्यगत विशेषताओं को उनकी कविताओं का अध्ययन करके ही समझा जा सकता है। आइये अब nirala ki kavyagay visheshata को विस्तार से समझने का प्रयास करते हैं ।    ‘राम की शक्ति पूजा’ और ‘सरोज स्मृति’ स्वभाव से भिन्न होते हुए भी छायावादी भावबोध की कविताएं थी । ‘कुकुरमुत्ता’ छायावाद की परिधि से बाहर की कविता है। यह भी कहा जा सकता है कि वह छायावाद से मोहभंग की कविता है। निराला Suryakant Tripathi ‘Nirala‘ छायावाद के कवि होते हुए भी उसकी सीमाओं का अतिक्रमण करते हैं। वे छायावाद के भीतर ही छायावाद के एक नए मिजाज का निर्माण करते हैं। निराला Suryakant Tripathi ‘Nirala’ की काव्य यात्रा अंतर्विरोधों से भरी हुई है। निराला की कविता … Read more

हिंदी निबंध का उद्भव और विकास | Hindi Nibandh ka Udbhav aur Vikas

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 डॉ.गुलाबराय ने निबंध को परिभाषित करते हुए कहा है – “निबंध उस गद्य रचना को कहते हैं जिसमें एक सीमित आकार के भीतर किसी विषय का वर्णन या प्रतिपादन एक विशेष निजीपन, स्वच्छंदता, सौष्ठव और सजीवता तथा आवश्यक संगति और संबद्धता के साथ किया गया हो ।” आइए अब हम hindi nibandh ka udbhav aur vikas विषय का विस्तार से अध्ययन करें ।  इस प्रकार निबंध उस गद्य रचना को कहते हैं, जिसमें लेखक अपने भावों और विचारों को आत्मपरक रूप में व्यक्त करने के लिए सजीव, लालित्यपूर्ण और मर्यादित भाषा-शैली का प्रयोग करता है । हिंदी में निबंध की परंपरा बहुत पुरानी नहीं है। हिंदी में पहला निबंध कब लिखा गया और किसने लिखा, इस पर कोई एक मत नहीं है। लेकिन कुछ ऐसे ऐतिहासिक तथ्य हैं जिन्हें निबंधों पर विचार करते हुए- अवश्य दृष्टि में रखना चाहिए। हिंदी में निबंधों की शुरुआत, गद्य की अन्य कई विधाओं की तरह भारतेंदु … Read more

रामायण के बहुभाषिक पाठ | Ramayan Ke Bahubhashik Path

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भारतीय संस्कृति मूलतः कृषि संस्कृति है। कृषि संस्कृति के जितने भी ऊंचे आदर्श हो सकते हैं। राम उनके प्रतीक हैं। वाल्मीकि ने उन्हें पूर्ण पुरुष के रूप मैं प्रस्तुत किया है। वे सुन्दर, धीर-वीर-गम्भीर हैं। राम की भक्ति के माध्यम से तुलसी ने चाहा था कि वे समस्त युगीन समस्याओं का समाधान प्रस्तुत कर सकें। उनके राम हैं भी कैसे ? वे एक और परब्रह्म हैं, राग-विराग से ऊपर उठे हुए, तो दूसरी ओर वे अत्यन्त सहृदय, सुशील मानव हैं। वे ब्रह्म हैं, सभी सद्गुणों से सम्पन्न हैं। अतः उनके सुख-दुःख, उनकी अनुभूति से पाठक मात्र समरस हो जाता है। ऐसे अखण्ड सत्ता सम्पन्न तथा समस्त मानवीय गुणों से युक्त प्रभु राम की गाथा लोककल्याणकारी है।  ‘रामकथा जग मंगल करनी’ है। लोकमंगल का यही दृष्टिकोण मन में रखकर तुलसी ने ‘रामचरितमानस’ की सम्पूर्ण कथा का ताना-बाना बुना। बहुभाषिक भारतीय समाज में रामचरितमानस का प्रचार भारत की सभी भाषाओं बोलियों, लोकगीतों और अधिकांश जनजातियों में रामकथा उपलब्ध … Read more

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